जब मैं चार साल का था, तब से उनकी स्मृति है।
इससे पहले की याद नहीं — पर उनके होने का एहसास इतना गहरा था कि चार साल की उम्र से लेकर आज तक, हर सुबह उठते ही पहला चेहरा उन्हीं का दिखता है।
यह कोई कविता नहीं है। यह एक बेटे का सच्चा बयान है।
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**जिस मिट्टी में जन्मे**
हमारा परिवार कोई साधारण परिवार नहीं था। दादाजी फकीर दास बैरागी की वंशावली आज ढाई सौ इंसानों तक फैल चुकी है। बड़े दादा बनवारी दास बैरागी, छोटे दादा जमुना दास बैरागी — सात बुआएँ, दो चाचा — सुरेश दास और रामफल दास बैरागी।
यह परिवार वैष्णव बैरागी परम्परा का वाहक था।
हमारे पूर्वजों की गद्दी दामोदरदास महाराज की थी — निमाना, तहसील झज्जर में। दस पीढ़ियों तक हमारे पूर्वज पीठाधीश्वर रहे। 1926 में वह गद्दी छोड़ दी गई — क्यों, यह पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं। पर वह मंदिर आज भी जीवित है। होली पर तीन दिन का मेला लगता है। कई राज्यों से श्रद्धालु आते हैं।
और 1926 के ठीक सौ वर्ष बाद — 2026 में — मुझे उस दामोदरदास मंदिर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह संयोग नहीं, यह पूर्वजों का आशीर्वाद था।
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**गरीबी का वह दौर**
रामनगर की मिट्टी में जब मैं खेलता था, बुआएँ मुझे उठा लेती थीं। लड़कियाँ बहुत थीं घर में — और गरीबी भी बहुत थी। पर बचपन? वह बहुत लाड-प्यार से गुज़रा।
चार बहनों के बाद पिताजी का जन्म हुआ था।
पिताजी गाँव रामनगर के पहले मैट्रिक पास थे। उस ज़माने में यह बड़ी बात थी। पर गरीबी ने उन्हें वह नहीं दिया जिसके वे हकदार थे। जो उनसे कक्षा में कमज़ोर थे, वे टीचर बन गए। सरकारी नौकरी में पैसे वालों का दबदबा था — और पिताजी के पास न पैसा था, न सिफारिश।
वे गाँव जांटी कलां — पंडित लख्मीचंद के गाँव — ईंट भट्टे पर मुनीम का काम करते थे। तनखा? बीस से तीस रुपए। और जब घर आते थे — कर्ज़ माँगने वालों का ताँता लग जाता था।
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**दो जून की रोटी**
दादाजी खेती-बाड़ी करते थे। सात-आठ भैंस थीं। पर दूध? वह भी पूरा घर में नहीं रहता था। दूधिया सुबह-सुबह दूध ले जाता था। खेत में गेहूँ निकलता था — बनिया वह ले जाता था। क्योंकि कर्ज़ था — और कर्ज़ हो तो आदमी क्या करे, दुकान उन्हीं की थी।
बस मंगलवार को थोड़ा दूध रख लिया जाता था — क्योंकि दादाजी हनुमानजी का व्रत रखते थे। उस दिन खीर बनती थी। घर में खुशी का माहौल होता था।
खेत में पानी की दिक्कत थी — इसलिए दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता था। यह मेरी आँखों के सामने का दृश्य है। और मैं आज भी सोचता हूँ — उस इंसान ने इतना सब सहते हुए कभी एक बार भी किसी से बुरा नहीं कहा।
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**1978 की बाढ़ और टूटे मकान**
1978 की वह बाढ़। सब मकान कच्चे थे — सब गिर गए।
उस वक्त सारे रिश्तेदार देखे गए, सारे दोस्त देखे गए। किसी ने एक रुपया भी देने की कोशिश नहीं की।
सरकार ने पाँच सौ रुपए प्रति एकड़ दिया। हमारे पास आठ एकड़ जमीन थी — चार हजार रुपए मिले। ढाई हजार रुपए कर्ज़ चुकाया। डेढ़ हजार रुपए में दो कमरे बनवाए। उस समय ईंट का रेट था — एक हजार ईंट पर एक सौ पच्चीस रुपए।
यह आँकड़े नहीं हैं। यह एक परिवार की जिजीविषा का लेखा-जोखा है।
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**1970 का वह दिन, जब नाम लिखा गया**
1970 में दादाजी मुझे रामनगर के सरकारी स्कूल में नाम लिखवाने ले गए। मास्टर साहब ने जन्मतिथि पूछी।
उस ज़माने में अजीब तरीका था — बच्चे से कहते थे: उल्टे हाथ से कान पकड़ो। जो पकड़ ले, वह सात साल का।
मैंने पकड़ लिया।
और इस तरह मेरी जन्मतिथि बन गई — 7 मई 1964। यह तारीख मेरी नहीं, उस मास्टर और उस परम्परा की देन है। पर यही मेरी पहचान बन गई।
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**फौज की राह**
मैट्रिक के बाद दिल्ली में मजदूरी करने गया। गरीबी पीछे नहीं छूटी थी।
1984 में भारतीय सेना में भर्ती हुआ। बेसिक वेतन — 170 रुपए। कुल तनखा — 325 रुपए।
वह पूरी तनखा घर भेजता था।
चौबीस साल तक — एक कुर्ता-पाजामा और एक पेंट-शर्ट में जिंदगी गुज़री। जब फट जाते थे, तो दूसरे सिला लिए जाते थे। दिन-रात सरकारी वर्दी में गुज़रते थे — इसलिए सिविल कपड़ों की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी।
यह त्याग था। यह देशसेवा थी। और यह पिता के लिए समर्पण भी था।
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**Sierra Leone और मंदिर**
वर्ष 2000 — संयुक्त राष्ट्र शांति सेना। मैं Sierra Leone, पश्चिम अफ्रीका गया।
वापस आया तो जो पैसा मिला था — वह रखा नहीं। गाँव में मंदिर बनवा दिया।
रहने को मकान नहीं था। चारों भाइयों के लिए चार कमरे थे — उन्हीं में गुज़ारा चल रहा था। पर मंदिर बना दिया।
कोई पूछे — ऐसा क्यों किया? तो मेरे पास जवाब नहीं। बस यही लगा कि पिताजी खुश होंगे। दादाजी की आत्मा को शांति मिलेगी।
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**प्रकाश अस्पताल की वह रात**
2012 में पिताजी को कैंसर हो गया। कई अस्पताल के चक्कर काटे। फिर उन्हें प्रकाश हॉस्पिटल, नोएडा लेकर गए।
एक रात की घटना है — जो मैं कभी नहीं भूलूँगा।
पिताजी के बेड के बगल में फ्लाइट लेफ्टिनेंट राजेंद्र जी थे — भारतीय वायु सेना के अधिकारी। उन्हें भी कैंसर था। उनके बच्चे कभी अंदर नहीं आते थे। दरवाज़े से ही कह देते थे — "फौजी भाई, हमारे पिताजी को भी देख लेना।"
रात का समय था। मेरा छोटा भाई नीचे जमीन पर लेटा था। विश्वास नंबरदार सोफे पर। दो और भाई गाड़ी में बाहर सो रहे थे।
राजेंद्र जी ने देखा — और बोले:
"आपके पिताजी बहुत किस्मत वाले हैं। दो बेटे अंदर लेटे हैं, दो बाहर गाड़ी में — चारों पिताजी के लिए यहाँ हैं।"
फिर एक पल रुके। आँखें भर आईं उनकी।
"काश मैंने भी अपने बच्चों को थोड़ा कम पढ़ाया होता — तो शायद आज वे भी मेरे पास होते। एक अमेरिका में है, एक इंग्लैंड में — पर यहाँ इस बिस्तर पर मैं अकेला हूँ।"
यह सुनकर मन भारी हो गया। शिक्षा दी — दुनिया मिली। पर पिता अकेले रह गए।
हम उस रात राजेंद्र जी के पिताजी का भी ध्यान रखते रहे — क्योंकि फौजी का दिल यही कहता है कि साथी को अकेला नहीं छोड़ते।
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**पिताजी का एक वाक्य**
पिताजी ने पूरी जिंदगी में एक बात कही —
"बेटे, किसी का भला नहीं कर सकते, तो बुरा भी मत करना।"
यह कोई दार्शनिक उपदेश नहीं था। यह उनकी जीवनशैली थी। उन्होंने कभी किसी से झगड़ा नहीं लिया। कभी किसी को धोखा नहीं दिया। कभी किसी का बुरा नहीं चाहा।
और इसीलिए — आज उनके जाने के बाद भी — उनकी मौजूदगी हर सुबह महसूस होती है।
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**आज का परिवार**
आज परिवार में चारों तरफ खुशी है। कब गरीब से सेठ हो गए — मालूम नहीं चला।
जिस रामनगर की मिट्टी में कभी भूखे पेट सोते थे — वही रामनगर गन्नौर आज औद्योगिक क्षेत्र बन चुका है। ज़्यादातर जमीनें बिक गईं। पर एक आदमी है जो अड़ा हुआ है — मैं, नरेश दास वैष्णव निम्बार्क।
मेरा संकल्प है — जब तक जिंदगी है, बाप-दादा की दी हुई जमीन को आगे बढ़ाऊँगा, कम नहीं करूँगा। बाकी सब सेठ बन गए — और यह देखकर मन को सुकून मिलता है। पर खेती? वह मेरी साधना है। वह पिताजी से मिली विरासत है।
मेरे पुत्र अमित और सुमित ने वह कर दिखाया जो पिताजी के ज़माने में सोचना भी मुश्किल था। आज उनके पास चार दुकानें हैं — बड़ा कपड़े का व्यवसाय है, मल्टीपरपज स्टोर है। दो दुकानों में भव्य शोरूम बना रखे हैं, दो दुकानें किराए पर हैं।
छोटे अनुज सुभाष नंबरदार के तीन बड़े प्रॉपर्टी डीलर ऑफिस हैं। अशोक स्वामी परचून की थोक दुकान चलाते हैं। विजेंद्र स्वामी के गाँव में बड़ी दुकान है। भतीजे सचिन स्वामी, तुषार स्वामी, दीपेंद्र स्वामी, दीपेश स्वामी — सब अपने-अपने काम में जुटे हैं।
जिस परिवार में कभी दो जून की रोटी मुश्किल से मिलती थी — उसी परिवार के ढाई सौ इंसान आज सम्मान से जी रहे हैं। यह पिताजी की शराफत का फल है।
और मेरी धर्मपत्नी निर्मला वैष्णव — 12 मई 1986 से आज तक। लगभग चालीस वर्ष। हर यात्रा में, हर सुख-दुख में, हर क्षण — साथ। इस परिवार की नींव में उनका त्याग भी उतना ही है।
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**पिताजी के जाने के बाद**
पिताजी जब तक रहे — दिल बहुत मज़बूत रहता था। उनके जाने के बाद — जैसे जिंदगी ही खत्म हो गई।
अब केवल लेखन है। शोध है। सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा की खोज है। www.nareshswaminimbark.in पर वह सब दर्ज होता जा रहा है जो इस परिवार ने जीया, भोगा, और झेला।
पर सच यह है —
हर शब्द जो लिखता हूँ, वह पिताजी के लिए है। हर शोध जो करता हूँ — वह उनकी स्मृति को अमर करने की कोशिश है। हर खेत की मेड़ जो सँभालता हूँ — वह उनके चरणों में अर्पण है।
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"पापा — आप नहीं रहे। पर आपकी शराफत, आपका धैर्य, आपकी चुप्पी — वह हमारे खून में है। हम आपकी औलाद हैं — यह हमारी सबसे बड़ी पहचान है।"
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नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी | इतिहासकार
सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा के शोधकर्ता
www.nareshswaminimbark.in
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