अयोध्या शोध-यात्रा — हनुमानगढ़ी की आरती से सरयू तट तक
9 सितंबर 2026 | अयोध्या धाम
आज का दिन अयोध्या की सनातन परंपरा, वैष्णव बैरागी अखाड़ों और ऐतिहासिक स्रोतों की खोज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।
प्रातः 8:00 बजे — हनुमानगढ़ी में आरती के दर्शन
प्रातः कमरे में तैयार होकर लगभग 8:00 बजे हम हनुमानगढ़ी मंदिर पहुँचे।
आज सौभाग्य से हनुमान जी की आरती में सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ। दर्शन भी बहुत खुले और अच्छे हुए।
हनुमानगढ़ी परिसर में लगे हुए विभिन्न ऐतिहासिक एवं धार्मिक चित्रों को हमने ध्यानपूर्वक देखा और उनमें से अनेक चित्रों के छायाचित्र अपने शोध के लिए सुरक्षित किए।
विशेष रूप से वहाँ प्रदर्शित वैष्णव बैरागी परंपरा से संबंधित चित्रों को भी हमने अपने मोबाइल में सुरक्षित किया, ताकि आगे अपने शोध-ग्रंथ में उनका अध्ययन और संदर्भ लिया जा सके।
मैंने अपने दोनों मोबाइल फोन से हनुमान जी के दर्शन का प्रत्यक्ष प्रसारण अपने फेसबुक पृष्ठ पर लाइव भी किया, ताकि जो श्रद्धालु अयोध्या नहीं आ सके, वे भी हनुमान जी के दर्शन का लाभ प्राप्त कर सकें।
जय श्रीराम। जय हनुमान। जय श्री रामानंदाचार्य। जय बालानंदाचार्य।
इसके बाद हम अपने होटल वापस आए और आगे की शोध-यात्रा के लिए तैयार हुए।
प्रातः 9:00 बजे — होटल से शोध-यात्रा प्रारंभ
लेखक नरेश दास वैष्णव निम्बार्क एवं मास्टर जगबीर वैष्णव जी प्रातः लगभग 9:00 बजे होटल से निकले।
हमारा उद्देश्य स्पष्ट था — अयोध्या की सनातन परंपरा, वैष्णव बैरागी अखाड़ों, संत-परंपरा तथा उनसे जुड़े ऐतिहासिक स्रोतों को प्रत्यक्ष रूप से समझना और शोध-सामग्री एकत्र करना।
प्रथम पड़ाव — अंतरराष्ट्रीय रामायण शोध संस्थान, तुलसी स्मारक
सबसे पहले हम अंतरराष्ट्रीय रामायण शोध संस्थान, तुलसी स्मारक पहुँचे।
प्रवेश द्वार पर हमने कुछ छायाचित्र लिए। इसके बाद द्वारपाल से संपर्क किया और उन्हें 5 सितंबर 2026 को भेजी गई अपनी ई-मेल दिखाई, जिसमें हमने शोधकार्य तथा आवश्यक छायाचित्र लेने के संबंध में निवेदन किया था।
द्वारपाल का व्यवहार अत्यंत आत्मीय रहा। उन्होंने हमारा पूरा सहयोग किया और हमें तुरंत पुस्तकालय की ओर भेज दिया।
पुस्तकालय में पहुँचने पर वहाँ के प्रभारी श्री विशाल उपाध्याय जी से भेंट हुई। उन्हें भी हमने अपनी ई-मेल दिखाई। उन्होंने हमारे शोधकार्य को समझा और आवश्यक पुस्तकों तथा सामग्री को देखने में हमारी सहायता की।
लगभग दो घंटे तक पुस्तकालय में शोधकार्य करने के बाद लगभग 11:00 बजे हम पुनः उनके कक्ष में पहुँचे।
वहाँ मैंने अपनी तीन पुस्तकें — महंत बने महाराजा, यात्रा : बंदूक से कलम तक, सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा — वेदों से आधुनिक भारत तक — पुस्तकालय में रखने के उद्देश्य से भेंट कीं।
श्री विशाल उपाध्याय जी ने पुस्तकों को गंभीरता से देखा और कॉपीराइट संबंधी विषय की भी जाँच की। इसके बाद उन्होंने आवश्यक प्रपत्र भरवाया, जिसमें पुस्तकों तथा शोध-विषय की जानकारी माँगी गई।
मैंने बताया कि मेरा मुख्य शोध-विषय “सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा” है।
प्रपत्र में मैंने अपनी अन्य पुस्तकों का भी उल्लेख किया — सनातन अयोध्या, सनातन कुरुक्षेत्र, रामनगर : 422 वर्षों का इतिहास, स्वर्णप्रस्थ की गाथा, Rosary and the Throne आदि।
प्रपत्र में मैंने अपना पता, ई-मेल, दूरभाष क्रमांक तथा वेबसाइट भी दर्ज की।
मैंने श्री विशाल उपाध्याय जी से कहा कि मेरी 696 पृष्ठों की पुस्तक “सनातन अयोध्या” प्रकाशित हो चुकी है और उसकी एक प्रति भी मैं खरीदकर शीघ्र ही कूरियर द्वारा पुस्तकालय को भेजूँगा। उन्होंने अपना दूरभाष क्रमांक भी उपलब्ध कराया।
वहाँ के पूरे स्टाफ ने जिस आत्मीयता और सहयोग के साथ हमारे शोधकार्य को स्वीकार किया, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम है।
इसके बाद हमारी भेंट आरती सिंह जी से भी हुई। हमने उनके स्टाफ के सहयोग की प्रशंसा की। उन्होंने हमारे प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि आज सनातन के प्रचार-प्रसार और शोध के लिए कौन इतनी दूर से परिश्रम करता है — आप हरियाणा से अयोध्या तक आए और अपनी पुस्तकें यहाँ पुस्तकालय के लिए लेकर आए।
उन्होंने विशेष रूप से “महंत बने महाराजा” तथा “सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा” जैसी पुस्तकों की उपयोगिता की प्रशंसा की।
द्वितीय पड़ाव — निर्मोही अखाड़ा
इसके बाद हम निर्मोही अखाड़े पहुँचे।
वहाँ हमारी भेंट महंत रामदास जी से हुई। उन्होंने हमारे लिए भोजन-प्रसाद की व्यवस्था की। हमने उनसे काफी देर तक बातचीत की और अपने शोधकार्य तथा पुस्तक लिखने के उद्देश्य के बारे में बताया।
जब हमने अखाड़े के पुराने इतिहास और अभिलेखों के संबंध में पूछा तो उन्होंने बताया कि 1982 में चोरी होने के कारण उनके पास पुराना ऐतिहासिक अभिलेख उपलब्ध नहीं है।
यह हमारे शोध के लिए एक महत्वपूर्ण सूचना है। इसे भी हम अभी उपलब्ध मौखिक सूचना के रूप में दर्ज करेंगे और आगे अन्य स्रोतों से इसकी पुष्टि का प्रयास करेंगे।
भोजन के बाद हमने लगभग दो घंटे वहीं विश्राम किया।
इसके बाद हमारी भेंट वहाँ के बड़े महाराज जी से हुई। उन्हें भी हमने पुस्तकें भेंट कीं।
निर्मोही अखाड़े में जिन-जिन संतों एवं लोगों से हमारी भेंट हुई, उन्हें हमने अपनी पुस्तकें — महंत बने महाराजा, यात्रा : बंदूक से कलम तक — भेंट कीं।
तृतीय पड़ाव — दिगंबर अखाड़ा
इसके बाद हम दिगंबर अखाड़े पहुँचे।
वहाँ दर्शन किए और अखाड़े के इतिहास के संबंध में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया।
स्थानीय रूप से हमें बताया गया कि यह अखाड़ा लगभग 700 वर्ष पुराना है।
शोध की दृष्टि से हमने इस जानकारी को तत्काल प्रमाणित इतिहास नहीं माना, बल्कि स्थानीय मौखिक परंपरा के रूप में सुरक्षित किया।
दिगंबर अखाड़े के सामने स्थित आचार्य मंदिर में भी हम पहुँचे।
वहाँ स्थानीय रूप से मंदिर को लगभग 1000 वर्ष पुराना बताया गया। साथ ही यह धार्मिक परंपरा बताई गई कि श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चारों भाई इस कुंड में स्नान करने आते थे।
इन दोनों बातों के लिखित अथवा अन्य ऐतिहासिक प्रमाणों की खोज आगे की जाएगी।
अंतिम पड़ाव — सरयू तट
दिनभर के शोध और भ्रमण के बाद हम सरयू नदी के पवित्र तट पर पहुँचे।
सरयू जी के दर्शन किए।
इसके बाद तुलसी घाट पर पहुँचे, जहाँ लगभग सायं 7:10 बजे आरती प्रारंभ हुई।
आरती के पश्चात हमने नया घाट, लक्ष्मण घाट और गुप्तार घाट के भी दर्शन किए।
गुप्तार घाट के संबंध में स्थानीय धार्मिक परंपरा भगवान श्रीराम के पृथ्वी-जीवन की पूर्णता और सरयू के माध्यम से देवलोक गमन से जुड़ी हुई है। वहाँ स्थानीय पुजारी से बातचीत में यह भी जानकारी मिली कि लक्ष्मण जी पहले सरयू गमन कर चुके थे।
इस जानकारी का भी आगे ग्रंथों और उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर परीक्षण किया जाएगा।
आज की शोध-यात्रा का सार
सुबह 8:00 बजे हनुमानगढ़ी की आरती से आरंभ हुआ दिन रात तक सरयू के पवित्र तट पर पहुँचकर पूर्ण हुआ।
एक ओर हनुमानगढ़ी में आरती और वैष्णव बैरागी परंपरा से जुड़े चित्रों का अध्ययन हुआ।
दूसरी ओर तुलसी स्मारक में पुस्तकालय का शोधकार्य और अपनी पुस्तकों को वहाँ पहुँचाने का अवसर मिला।
निर्मोही अखाड़े में संतों से बातचीत हुई।
दिगंबर अखाड़े में स्थानीय परंपराओं को समझा।
आचार्य मंदिर और कुंड के संबंध में जानकारी मिली।
और अंत में सरयू की धारा के सामने बैठकर आरती के दर्शन किए।
इतिहास लिखना केवल पुस्तकों में बैठकर संभव नहीं।
स्थान पर जाना पड़ता है। लोगों से मिलना पड़ता है। पुरानी स्मृतियाँ सुननी पड़ती हैं। दस्तावेज खोजने पड़ते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण — परंपरा और प्रमाण के बीच का अंतर समझना पड़ता है।
एक सैनिक जब रणभूमि में उतरता है तो उसका लक्ष्य स्पष्ट होता है।
आज उसी अनुशासन के साथ बंदूक से कलम तक की यात्रा में अयोध्या की धरती पर इतिहास के उन पन्नों को खोजने का प्रयास जारी है, जो समय की परतों में कहीं दब गए हैं।
यह यात्रा किसी व्यक्तिगत यश के लिए नहीं — सनातन की ऐतिहासिक स्मृति को सुरक्षित करने के लिए है।
लेखक एवं शोधकर्ता
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना
इतिहासकार | शोधकर्ता | लेखक
www.nareshswaminimbark.in
जय श्रीराम। जय हनुमान। जय सरयू मैया। जय सनातन। जय हिंद।
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