नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
Indian Army Veteran | Author | Sanatan Vaishnav Bairagi Historian
राष्ट्र सेवा से धर्म सेवा तक: सैन्य अनुशासन, शोधपरक इतिहास और सनातन संस्कारों का संगम।
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क — लेखक, शोधकर्ता और सनातन वैष्णव इतिहासकार।
भारतीय सेना में 24 वर्षों की सेवा के पश्चात् मानद नायब सूबेदार पद से सेवानिवृत्त होकर उन्होंने सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा के गुमनाम इतिहास को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया।
20+ पुस्तकें — Amazon, Flipkart, Notion Press | 190 देशों में उपलब्ध।
लेखक-नाम संबंधी स्पष्टीकरण: मेरा वैधानिक नाम (आधार कार्ड, भारतीय सेना व संयुक्त राष्ट्र दस्तावेज़ों अनुसार) नरेश कुमार है। साहित्यिक यात्रा के आरंभिक वर्षों में मैंने "नरेश कुमार स्वामी निम्बार्क" नाम से लेखन किया, जो कई समाचार-पत्रों व प्रारंभिक प्रकाशनों में दर्ज है। वर्तमान में मैं "नरेश दास वैष्णव निम्बार्क" नाम से लिखता हूँ। दोनों साहित्यिक नाम एक ही व्यक्ति — मुझ नरेश कुमार — के हैं।
मेरी जन्मभूमि — रामनगर, गन्नौर
हरियाणा के सोनीपत जिले में बसा एक छोटा-सा गाँव — रामनगर, गन्नौर। यही वह पवित्र मिट्टी है, जहाँ मैंने जन्म लिया, जहाँ मैं पला-बढ़ा, और जहाँ की धूल में खेलते हुए मैंने जीवन के पहले पाठ सीखे।
मेरा जन्म किसी संपन्न परिवार में नहीं हुआ। एक साधारण, गरीब किसान परिवार में जन्मे मेरे लिए बचपन आसान नहीं था। खेतों की मिट्टी, सीमित संसाधन, और संघर्ष से भरे दिन — यही मेरी शुरुआती पहचान थी। परंतु इसी संघर्ष ने मुझे अनुशासन, परिश्रम और सत्य के प्रति निष्ठा का पाठ पढ़ाया, जो आगे चलकर मेरे पूरे जीवन की नींव बना।
गाँव के स्कूल की सीमित सुविधाओं में पढ़ाई की, परिवार के साथ खेतों में हाथ बँटाया, और फिर एक दिन देश-सेवा का सपना लेकर भारतीय सेना में कदम रखा।
सेना से इतिहास तक की यात्रा
भारतीय सेना में वर्षों की सेवा के बाद मैं मानद नायब सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुआ। सेना ने मुझे जो अनुशासन, धैर्य और राष्ट्र के प्रति समर्पण सिखाया, वही आगे चलकर मेरे शोध-कार्य की आत्मा बना।
सन् 2000 में मुझे संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन (United Nations Mission) के अंतर्गत सिएरा लियोन (Sierra Leone) में सेवा करने का सौभाग्य मिला। वहाँ से लौटने के बाद जो धनराशि मुझे प्राप्त हुई, उसे मैंने अपने गाँव रामनगर में एक मंदिर के निर्माण में लगा दिया — यह मेरी उस मिट्टी के प्रति कृतज्ञता थी, जिसने मुझे गढ़ा।
गाँव की मिट्टी से विश्व तक
सेवानिवृत्ति के बाद मैंने स्वयं को इतिहास और सनातन परंपरा के अध्ययन में समर्पित कर दिया। विशेष रूप से सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा — जो सदियों से भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति की अमूल्य धरोहर रही है, परंतु जिसका व्यवस्थित इतिहास कहीं दर्ज नहीं था।
मैंने गाँव-गाँव, मंदिर-मंदिर, मठ-मठ जाकर प्रत्यक्ष शोध किया — प्राचीन ग्रंथों को खंगाला, न्यायालयीन अभिलेखों की छानबीन की, और स्थानीय परंपराओं को संजोया। यह यात्रा आज भी जारी है।
आज तक मैं 9 हिंदी और 11 अंग्रेज़ी पुस्तकें लिख चुका हूँ — कुल 20 शोधपरक ग्रंथ। इनमें से मेरी सबसे प्रिय व प्रसिद्ध कृति रही है — "रामनगर: 422 वर्षों का अनसुना इतिहास", जो आज लगभग 190 देशों में पाठकों तक पहुँच चुकी है। यह पुस्तक मेरे अपने गाँव रामनगर के गौरवशाली परंतु अनकहे इतिहास को समर्पित है — मानो मैंने अपनी जन्मभूमि का ऋण, उसी की कहानी विश्व तक पहुँचाकर चुकाया हो।
एक संदेश अपने गाँव के नाम
रामनगर, गन्नौर — तुम मेरी पहचान हो, मेरी जड़ें हो। तुम्हारी मिट्टी में जन्मा एक साधारण किसान-पुत्र आज इतिहास लिखने के काबिल बना, तो यह श्रेय तुम्हारा है।
जय श्री राम
जय श्री राधे-कृष्ण
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना | UN Veteran | इतिहासकार | शोधकर्ता | लेखक
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