सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा की जड़ें : हम्पी में शबरी ने राम को खिलाए थे जूठे बेर
सेवा-निवृत्ति के पश्चात भारतीय सेना के एक अनुशासित सैनिक के रूप में जब मुझे अपनी प्रथम नागरिक नियुक्ति प्राप्त हुई, तो वह स्थान था — हॉस्पेट (होसपेटे), कर्नाटक, तुंगभद्रा नदी के तट पर बसा वही ऐतिहासिक नगर, जिसे आज "कर्नाटक की इस्पात नगरी" कहा जाता है। यहीं समीप तोरणगल्लु में जिंदल स्टील (JSW) का विशाल विजयनगर संयंत्र स्थित है, जहाँ अमेरिकी कंपनी प्रैक्सेयर के साथ इस्पात-निर्माण हेतु आवश्यक ऑक्सीजन, नाइट्रोजन एवं आर्गन गैसों के उत्पादन हेतु 1995 में एक संयुक्त उद्यम — जिंदल प्रैक्सेयर ऑक्सीजन कंपनी (JPOCL) — स्थापित हुआ था। इसी संयंत्र से मेरी तथा मेरे अनुज श्री अशोक स्वामी जी की सेवा जुड़ी रही।
किंतु हॉस्पेट का महत्व केवल औद्योगिक नहीं, अपितु आध्यात्मिक एवं पौराणिक भी है — क्योंकि यह नगर उसी पावन भूमि का प्रवेश-द्वार है, जिसे त्रेता युग में किष्किंधा के नाम से जाना जाता था। हॉस्पेट से मात्र 13 किलोमीटर दूर स्थित हम्पी, जो कभी विजयनगर साम्राज्य की गौरवशाली राजधानी थी और आज UNESCO विश्व धरोहर घोषित है, वही भूमि है जहाँ रामायण के किष्किंधा-कांड की घटनाएँ घटित हुईं। यहीं कार्यरत रहते हुए मैं और मेरा अनुज दर्शनार्थ इस पावन क्षेत्र में गए — यह यात्रा 1 जनवरी 2009 को प्रथम बार सम्पन्न हुई, तथा दो-तीन बार दोहराई गई।
शबरी-मातंग प्रसंग : वैष्णव बैरागी परंपरा का आदि प्रतीक
मेरे शोध का केंद्र-बिंदु सदैव सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा तथा निम्बार्क सम्प्रदाय रहा है — और हम्पी-किष्किंधा की यह भूमि इस परंपरा के सबसे प्राचीन एवं मार्मिक उदाहरण को अपने में समेटे हुए है। ऋष्यमूक पर्वत (जिसे आज मातंग पर्वत भी कहा जाता है) के समीप महर्षि मातंग का आश्रम था। भील जनजाति की कन्या माता शबरी ने वर्षों तक निष्काम भाव से अपने गुरु मातंग ऋषि की सेवा की — बिना किसी प्रतिफल की आकांक्षा के, केवल गुरु-सेवा और भक्ति के बल पर। यही निष्काम सेवा-भाव आगे चलकर वैष्णव बैरागी परंपरा का मूल आधार बना, जिसमें साधक त्याग, वैराग्य और सेवा को ही सर्वोच्च साधना मानता है।
महासमाधि से पूर्व मातंग ऋषि ने शबरी को आशीर्वाद दिया कि स्वयं भगवान श्रीराम एक दिन उनकी कुटिया में पधारेंगे। वर्षों की अनवरत प्रतीक्षा के पश्चात जब प्रभु श्रीराम, वनवास-काल में सीता जी की खोज करते हुए इस क्षेत्र में पहुँचे, तो शबरी ने अपार श्रद्धा से चख-चखकर मीठे बेर उन्हें अर्पित किए। भगवान श्रीराम ने बिना किसी जाति-भेद के, केवल भक्ति के आधार पर वे जूठे बेर सहर्ष ग्रहण किए। सनातन धर्म में यह प्रसंग नवधा भक्ति का प्रत्यक्ष उदाहरण माना जाता है, तथा वैष्णव बैरागी परंपरा — जिसमें भक्त और भगवान के मध्य जाति, कुल अथवा सामाजिक स्थिति कोई बाधा नहीं बनती — की आधारशिला इसी प्रसंग में दृष्टिगोचर होती है।
समीप ही स्थित पंपा सरोवर पर ही राम-शबरी का यह ऐतिहासिक मिलन हुआ माना जाता है, जो हिंदू धर्म के पंच पवित्र सरोवरों में से एक है। यहीं से आगे बढ़कर कोदंडराम मंदिर पर सुग्रीव का किष्किंधा-राज्याभिषेक हुआ, तथा यंत्रोद्धारक हनुमान मंदिर — जिसे विजयनगर के राजगुरु श्री व्यासतीर्थ ने स्थापित किया था — वह स्थान है जहाँ राम-हनुमान का प्रथम मिलन माना जाता है।
विजयनगर के स्थापत्य रत्न
इसी क्षेत्र में विजयनगर साम्राज्य के गौरवशाली स्थापत्य के प्रमाण भी बिखरे पड़े हैं। विरूपाक्ष मंदिर — हम्पी का एकमात्र ऐसा मंदिर जो आज भी निरंतर पूजित है — भगवान शिव व देवी पंपा को समर्पित है, जिसका 50 मीटर ऊँचा नौ-मंज़िला पूर्वी गोपुरम आज भी दर्शकों को विस्मित करता है। विट्ठल मंदिर का प्रसिद्ध पाषाण रथ, जो भारत के तीन प्रसिद्ध पाषाण रथों में से एक है, इतना प्रतिष्ठित है कि यह भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी ₹50 के नोट पर भी अंकित है। हज़ारा राम मंदिर की दीवारों पर संपूर्ण रामायण उत्कीर्ण है, तथा बडवलिंग — हम्पी का सबसे बड़ा एकाश्म शिवलिंग — आज भी जल में डूबा हुआ श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। तुंगभद्रा के उस पार अनेगुंडी के निकट स्थित अंजनाद्रि पर्वत को हनुमान जी की जन्मस्थली माना जाता है, जहाँ लगभग 575 सीढ़ियाँ चढ़कर श्रद्धालु दर्शन करते हैं।
निष्कर्ष : एक सैनिक की दृष्टि से
मैं न तो इतिहासकार हूँ, न तीर्थ-विशेष का निर्णायक — मैं तो सनातन का एक छोटा-सा फौजी हूँ, जिसने इस भूमि को देखकर केवल इतना समझा कि जहाँ रामकथा है, वहाँ सनातन आज भी जीवित है। शबरी और मातंग ऋषि का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि वैष्णव बैरागी परंपरा — जिसकी एक कड़ी निम्बार्क सम्प्रदाय भी है — केवल कर्मकांड नहीं, अपितु निष्काम सेवा, गुरु-भक्ति और समर्पण का जीवंत आचरण है। यही भाव मेरे वंशजों की निमाना की गादी में भी सदियों से प्रवाहित होता रहा है।
पुस्तक : यात्रा — बन्दूक से कलम तक
अध्याय-30 : हम्पी–किष्किंधा की संक्षिप्त यात्रा (पृष्ठ 181)
लेखक : नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
प्रथम संस्करण : स्वाधीनता दिवस 2022, नीमच (म.प्र.) | पुनर्मुद्रण : करनाल (हरियाणा)
यह पुस्तक विक्रय हेतु नहीं थी; निजी भाव से निःशुल्क वितरित की गई।
www.nareshswaminimbark.in
"मैं तो सनातन का एक छोटा सा फौजी हूँ।"
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