"अयोध्या: पूर्व सैनिक अधिकारी नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की चौथी शोधयात्रा

पूर्व सैनिक अधिकारी व इतिहासकार नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की चौथी अयोध्या शोधयात्रा — हनुमानगढ़ी, श्रीराम जन्मभूमि व मणिराम दास छावनी में महंत नृत्यगोपाल दास जी से भेंट, वैष्णव बैरागी परंपरा पर शोध जारी।

Sanatan Vaishnav Bairagi Tradition7 min read

अयोध्या: पूर्व सैनिक अधिकारी नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की चौथी शोधयात्रा
हनुमानगढ़ी से श्रीराम जन्मभूमि और मणिराम दास छावनी तक — एक सैनिक की आस्था और शोधकर्ता की चतुर्थ अयोध्या शोधयात्रा
7 सितम्बर 2026, दिल्ली से प्रस्थान
जय सीताराम।
अयोध्या की यह मेरी चौथी यात्रा है, लेकिन इस बार उद्देश्य केवल दर्शन करना नहीं, बल्कि शोध करना, देखना, समझना और यथासंभव प्रमाण सुरक्षित करना है।
7 सितम्बर की शाम दिल्ली जंक्शन से अयोध्या एक्सप्रेस में मास्टर जगबीर वैष्णव जी के साथ यात्रा आरंभ हुई। मन में एक ही संकल्प था — अयोध्या की धरती पर बिखरे उन स्थलों, मठों, छावनियों, अखाड़ों, मंदिरों और परंपराओं को निकट से देखना, जिनका संबंध सनातन वैष्णव-बैरागी परंपरा से रहा है।
8 सितम्बर की सुबह — अयोध्या में प्रवेश
सुबह लगभग 6:30 बजे अयोध्या कैंट पहुँचे। वहाँ से रिक्शा लेकर हनुमानगढ़ी के निकट मिथिला रेस्टोरेंट पहुँचे। कमरा पहले से बुक था, इसलिए स्नान आदि से निवृत्त होकर यात्रा के प्रथम दर्शन के लिए निकल पड़े।
सड़क से ही हनुमानगढ़ी का प्रवेशद्वार दिखाई दे रहा था। मन में एक अलग ही भाव था — यह केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि अयोध्या की जीवंत धार्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
हम दोनों ने हनुमानगढ़ी में दर्शन किए। मैंने परिवार को भी दर्शन करवाए। जयेन्द्रभाई दलपतभाई निमावत (राजकोट-गुजरात), वैष्णव शालीग्राम यूट्यूब चैनल, को वीडियो कॉल के माध्यम से दर्शन करवाए, और मास्टर जगबीर जी ने भी अपने बच्चों को दर्शन करवाए।
दर्शन की पहली पंक्ति में हम अनजाने में पीछे की ओर पहुँच गए थे। मास्टर जगबीर जी ने कहा कि सही पंक्ति में चलना चाहिए। हम पुनः पंक्ति में लगे और व्यवस्थित रूप से दर्शन किए।
मैंने वहाँ महंत जी से भेंट का प्रयास किया, लेकिन भेंट संभव नहीं हो सकी।
इसी बीच एक नवदीक्षित साधु को दीक्षा के पश्चात माला प्रदान किए जाने का दृश्य देखने को मिला। मैं कुछ समय उनके पास खड़ा रहा और उस क्षण की तस्वीर भी ली।
मेरे लिए यह दृश्य अत्यंत महत्वपूर्ण था। परंपरा केवल पुस्तकों में नहीं होती — वह जब किसी नए साधु के जीवन में आगे बढ़ती दिखाई देती है, तब वह जीवंत परंपरा बन जाती है।
हनुमानगढ़ी से राम जन्मभूमि की ओर
इसके बाद हम श्रीराम जन्मभूमि की ओर पैदल चल पड़े। मार्ग में दिशा पूछते हुए जब जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य द्वार पहुँचे तो वहाँ रुककर तस्वीरें लीं।
उस द्वार को देखकर मन में विशेष शांति का अनुभव हुआ। वैष्णव-बैरागी परंपरा के अध्ययन से जुड़े व्यक्ति के लिए ऐसे स्थल केवल देखने की वस्तु नहीं होते — वे शोध के प्रश्न खड़े करते हैं।
आगे मंदिर परिसर में प्रवेश की प्रक्रिया हुई। जूते नंबर 54 पर जमा किए और मोबाइल तथा प्रसाद नंबर 8 पर जमा कराया।
धूप और गर्म फर्श के कारण पैरों में काफी तकलीफ हुई, पसीना भी आया, लेकिन मन में श्रीराम के दर्शन की भावना थी। इसलिए कठिनाई का अनुभव भी यात्रा का हिस्सा बन गया।
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में पहली बार
यह मेरे लिए विशेष क्षण था। मंदिर निर्माण के बाद पहली बार श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दर्शन करने का सौभाग्य मिला।
मंदिर की भव्यता देखकर मैं कुछ क्षणों के लिए भाव-विभोर हो गया। मेरे जीवन में देखे गए अत्यंत भव्य और सुंदर मंदिरों में यह मंदिर मेरे लिए विशेष स्थान रखता है।
स्वर्णाभूषित द्वारों की आभा, पत्थरों पर की गई बारीक कलाकारी और रामायण से संबंधित कलात्मक प्रस्तुतियाँ मन को आकर्षित कर रही थीं। और इसी परिसर में मुझे 24 वैष्णव अवतारों की सुंदर कलात्मक प्रस्तुतियों के दर्शन करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ।
एक शोधकर्ता के लिए ऐसे दृश्य केवल श्रद्धा का विषय नहीं होते। वे यह प्रश्न भी सामने रखते हैं कि इन प्रतीकों, परंपराओं और कलात्मक अभिव्यक्तियों का ऐतिहासिक एवं धार्मिक संदर्भ क्या है।
दर्शन के साथ सेवा का भाव
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दर्शन के बाद हम दोनों ने 1,100-1,100 रुपये का दान देने का संकल्प किया।
मेरे 1,100 रुपये के दान की यह मूल रसीद आज मेरे पास सुरक्षित है, जिसमें दिनांक 08-09-2026, दान का उद्देश्य General Donation, माध्यम Cash और दानराशि 1,100 रुपये अंकित है।
मेरे लिए यह केवल धनराशि नहीं है। यह उस यात्रा में अपनी सामर्थ्य के अनुसार सेवा और सहभागिता का एक छोटा-सा प्रयास है।
श्रीराम के परिसर में गिलहरी की स्मृति
मंदिर परिसर में विश्राम करते समय एक स्थान पर गिलहरी की प्रतिमा भी दिखाई दी। रामसेतु निर्माण में गिलहरी के सहयोग की प्रसिद्ध परंपरागत कथा भारतीय जनमानस में सेवा और समर्पण का सुंदर प्रतीक रही है।
छोटी-सी गिलहरी का योगदान हमें यही संदेश देता है — सेवा छोटी या बड़ी नहीं होती, भावना बड़ी होती है। हमने उस स्थान की तस्वीर भी ली।
शाम 4 बजे — श्री मणिराम दास छावनी
दिन का शोध और दर्शन यहीं समाप्त नहीं हुआ। लगभग शाम 4 बजे हम मिथिला रेस्टोरेंट से निकलकर श्री मणिराम दास छावनी पहुँचे।
यहाँ मुझे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास जी महाराज के दर्शन करने का सौभाग्य मिला और उनके साथ तस्वीर लेने का अवसर भी प्राप्त हुआ।
यह क्षण मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था। एक ओर अयोध्या के मंदिर और तीर्थों का वर्तमान स्वरूप सामने था, तो दूसरी ओर संत-परंपरा के प्रमुख संतों का सान्निध्य प्राप्त हो रहा था।
संत-समाज के बीच श्रद्धांजलि सभा
इसी अवसर पर वहाँ देवाचार्य पीठ के पूर्व पीठाधीश्वर महंत डॉ. राघवाचार्य महाराज की द्वितीय पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में भी उपस्थित होने का अवसर मिला।
अनेक संत-महात्मा उपस्थित थे। सामने संत-समाज, श्रद्धालुओं की उपस्थिति और धार्मिक वातावरण — इन सबको देखकर लगा कि अयोध्या का इतिहास केवल मंदिरों और भवनों में नहीं है।
अयोध्या का इतिहास उसके संतों, मठों, पीठों, अखाड़ों, साधु-परंपराओं और जनमानस में भी जीवित है। इसी जीवंत परंपरा को समझना हमारी इस शोधयात्रा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
मेरी चौथी अयोध्या यात्रा — इस बार उद्देश्य अलग है
मेरी अयोध्या से यह चौथी यात्रा है।
पहली यात्रा — 1988
भारतीय सेना में सेवा के दौरान सैनिक साथियों के साथ अयोध्या आया था। तब मुख्य उद्देश्य दर्शन था।
दूसरी यात्रा — 1990
एक सैनिक साथी के साथ अयोध्या आया। वह समय अयोध्या के इतिहास का अत्यंत संवेदनशील दौर था।
तीसरी यात्रा — 19-20 अक्टूबर 2021
पत्नी श्रीमती निर्मला वैष्णव के साथ अयोध्या आया। इस यात्रा का वर्णन मेरी आत्मकथा "बंदूक से कलम तक" में भी किया गया है।
चौथी यात्रा — सितम्बर 2026
इस बार मेरे साथ मास्टर जगबीर वैष्णव जी हैं और आगे चलकर श्री दीपक स्वामी जी, हरिद्वार, उत्तराखंड से हमारे साथ जुड़ेंगे।
इस यात्रा का असली उद्देश्य — शोध
हमारा उद्देश्य केवल तीर्थ-दर्शन नहीं है। हम अयोध्या में निम्नलिखित का अध्ययन करने का प्रयास कर रहे हैं:
प्राचीन मंदिर, घाट, मठ और छावनियाँ, वैष्णव-बैरागी परंपरा से जुड़े स्थल, अखाड़े, संत-परंपराएँ, अभिलेख, शिलालेख, उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज़, तथा पुरातात्त्विक एवं न्यायिक संदर्भ।
हमारा आगामी शोधग्रंथ है — "सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा"।
इस कार्य में हमारा प्रयास रहेगा कि भावनाओं और मान्यताओं का सम्मान करते हुए इतिहास को उपलब्ध प्रमाणों और दस्तावेज़ों के आधार पर समझा जाए। हमारा सिद्धांत स्पष्ट है —
"दावे नहीं, दस्तावेज़ बोलेंगे। श्रद्धा अपनी जगह है, शोध अपनी जगह। और इतिहास में अंतिम आधार — प्रमाण।"
अयोध्या में जो देख रहा हूँ, उसकी तस्वीरें ले रहा हूँ। जो सुन रहा हूँ, उसे नोट कर रहा हूँ। जो दस्तावेज़ मिल रहे हैं, उन्हें सुरक्षित कर रहा हूँ। और जहाँ किसी बात की पुष्टि आवश्यक है, वहाँ उसे शोध का विषय मान रहा हूँ।
क्योंकि इतिहास लिखना केवल भावनाओं को लिख देना नहीं है। इतिहास लिखना आने वाली पीढ़ियों के सामने अपने शब्दों की जिम्मेदारी लेना है।
एक सैनिक से शोधकर्ता तक
कभी हाथ में सेना की जिम्मेदारी थी। आज हाथ में कलम है।
कभी सीमाओं की रक्षा करना कर्तव्य था, आज अपनी सभ्यता, परंपरा और इतिहास से जुड़े प्रश्नों को ईमानदारी से दर्ज करना मेरा प्रयास है।
अयोध्या की यह यात्रा मेरे लिए केवल चौथी यात्रा नहीं — यह मेरी शोध-यात्रा का एक नया अध्याय है।
अभी यात्रा समाप्त नहीं हुई है। अभी अयोध्या की गलियों में बहुत कुछ देखना है, बहुत कुछ सुनना है, बहुत कुछ खोजना है, और सबसे महत्वपूर्ण — बहुत कुछ प्रमाणित करना है।
जय सीताराम। जय सियाराम। जय श्रीराम। राधे-राधे। जय हिन्द। जय भारत।
— नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी | इतिहासकार | शोधकर्ता | लेखक
www.nareshswaminimbark.in

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