हे परमात्मा, सब कुछ देना — पर गरीबी मत देना
रामनगर, सोनीपत की 1978 यमुना बाढ़ की सच्ची आपबीती
नरेश दास वैष्णव निंबार्क की कलम से
6 सितंबर 1978। यह तारीख मेरे गांव रामनगर, तहसील गन्नौर, जिला सोनीपत के इतिहास में एक ऐसा घाव है जो आज भी नहीं भरा। उस समय मैं नौवीं कक्षा का विद्यार्थी था। पीपली खेड़ा के मिडिल स्कूल से आठवीं पास करने के बाद, गांव से आठ किलोमीटर दूर लडसोली गांव के हाई स्कूल में दाखिला लिया था — रोज़ाना आना-जाना मिलाकर लगभग 16 किलोमीटर पैदल, फिर भी हंसते-खेलते चले जाते थे। आज सोचता हूं तो लगता है, वे दिन और वह सादगी कहां चली गई। आजकल तो कहीं पैदल जाने का मन ही नहीं करता।
4 सितंबर 1978 को स्कूल से लौटते ही बैग घर रखा और सीधा मिमारपुर घाट यमुना का बढ़ता पानी देखने पहुंच गया। घाट पर खड़े लोग कह रहे थे — दिल्ली डूबने वाली है, इसलिए हरियाणा में बांध तोड़ दिया जाएगा। उस समय ताजेवाला बैराज था, जिसे आज हथिनीकुंड बैराज कहते हैं। इस बाढ़ का कारण था — 58 घंटे की लगातार भारी वर्षा के परिणामस्वरूप बैराज से लगभग सात लाख क्यूसेक जल का अभूतपूर्व निस्तारण। दायां सीमांत बंधा तीन स्थानों पर संकट में था — पत्थरगढ़ गांव (जिला पानीपत), बेगा गांव (जिला सोनीपत), और दिल्ली सीमा पर पल्ला गांव व बवाना एस्केप आउट-फॉल के बीच — यहीं यह बंधा अंततः टूट गया।
5 सितंबर को पानी हमारे गांव में घुस आया। पूरा गांव मिट्टी के बंधे बनाने में जुट गया — कट्टों में मिट्टी भरकर गलियों में रोकने की व्यर्थ कोशिश होती रही। पर प्रकृति के प्रकोप के आगे किसी की नहीं चली। कच्चे मकान एक-एक कर गिरने लगे। लोग अपने-अपने छतों पर चढ़ गए। हमारा पुश्तैनी मकान गांव की सबसे ऊंची गली में स्थित था, इसलिए बच गया — पर जहां हमारे दादा-दादी और पशु रहते थे, वह पूरा मकान पानी में बह गया।
हेलीकॉप्टर से राहत सामग्री गिराई जा रही थी, पर वहां भी लूट मच जाती — किसी के हाथ कुछ लगता, किसी के कुछ नहीं। पीने के पानी की भारी किल्लत हो गई थी। मरे हुए पशु पानी में इधर-उधर बहते दिखाई देते। कुछ इंसानी लाशें भी हमने अपनी आंखों से देखीं — वह दृश्य आज भी मन में कहीं गड़ा हुआ है। जलाऊ लकड़ी नहीं मिलती थी, और जो लकड़ी मिल भी जाती, उसे जलाने के लिए सूखी जगह ढूंढना एक अलग संघर्ष था। कई लोग बीमार पड़ गए, और उनकी देखभाल के साधन भी नहीं थे।
उसी क्षण मेरे किशोर मन में एक विचार जड़ जमा बैठा, जो आज तक नहीं हिला — परमात्मा सब कुछ दे, पर गरीबी मत दे। क्योंकि गरीबी में कोई पूछने वाला नहीं होता।
पानी धीरे-धीरे उतरने लगा, और लगभग 15 दिन में हालात कुछ सामान्य हुए — पर गंदगी का अंबार हर गली में लगा था, जगह-जगह पानी भरा रह गया था, निकलने का कोई सीधा रास्ता नहीं बचा था। ठीक इसी समय हमारे घर दो शादियों का निमंत्रण आ गया — बुआ के बच्चों की, जहां भात देना अनिवार्य रीति थी। साथ ही, 1976 में लिए गए ट्यूबवेल की 815
रुपए की किस्त हर छह महीने में चुकानी थी। सब कुछ लुट चुका था, तो पैसा कहां से आता?
मैं और मेरी मां — जो आज इस संसार में नहीं हैं — कई रिश्तेदारों के पास दो हज़ार रुपए मांगने गए। साधारण दिनों में जो रिश्तेदार बड़े प्रेम से बात किया करते थे, इस संकट की घड़ी में उन्होंने भी मुंह फेर लिया। किसी ने सीधे मुंह जवाब तक नहीं दिया। कहा गया — "तुम तो बचपन से ही गरीब हो, हमारे पास क्या नोट रखे पड़े हैं, यूं ही मुंह उठाकर चले आए?" पिताजी भी कई घरों में गए, वहां से भी साफ इनकार मिला। एक वक्त की रोटी किसी तरह बन जाती थी, दूसरे वक्त की चिंता में रात कट जाती थी। अब क्या कहें, क्या न कहें — यह समझ ही नहीं आता था। खेतों में गर्दन-गर्दन तक पानी भरा था, पूरी फसल नष्ट हो चुकी थी। इसी विपत्ति के बीच मेरे पिताजी श्री नारायण दत्त और चाचा रामफल स्वामी अपने कंधों पर क्रम्पटन कंपनी की ट्यूबवेल मोटर उठाकर घर लाए थे — यह दृश्य आज भी मेरी आंखों के सामने ज्यों का त्यों जीवित है।
एक जगह तो और भी अजीब हुआ। पूरे दिन इधर-उधर भटकने के बाद जब मां वहां पहुंचीं, तो पूछा गया — "रोटी खाओगे क्या?" — मानो कोई बड़ा एहसान जताया जा रहा हो। यही तो मनुष्य का सबसे कठोर सत्य है — विपत्ति में कोई किसी की मजबूरी नहीं समझता, अपने भी पराए हो जाते हैं।
फिर एक दिन उस विनाश के बीच एक आशा की किरण आई। हरियाणा के मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल जी और हमारी क्षेत्रीय विधायक श्रीमती शांति राठी जी गांव के दौरे पर आए। विद्यालय में उनका कार्यक्रम रखा गया था। दोनों घुटनों तक भरे पानी में पैदल चलकर वहां पहुंचे — गाड़ी के लिए रास्ता तक नहीं था। ऐसे नेता आजकल कहां देखने को मिलते हैं, पता नहीं। गांव की हालत उस समय अत्यंत नाज़ुक बनी हुई थी। उन्होंने गांव के लिए सिरकी (झोपड़ी) भिजवाई और नष्ट हुई फसल का मुआवज़ा घोषित किया — 500 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से। हमारी आठ एकड़ ज़मीन के चार हज़ार रुपए मिले, जिससे ट्यूबवेल की किस्त भी चुकाई और बुआ के बच्चों की शादी में भात देने भी जा सके। उस समय गांव के सरपंच पंडित दयानंद शर्मा — जो स्वयं संपन्न परिवार से थे — ने कई निर्धन परिवारों को अपनी ओर से गेहूं वितरित किया, जो उस संकट में एक बड़ा सहारा साबित हुआ।
यह संस्मरण लिखने का मेरा एक ही उद्देश्य है — हे परमात्मा, सब कुछ देना, पर गरीबी कभी किसी को मत देना। क्योंकि गरीबी वह अभिशाप है जिसमें साधारण दिनों में प्रेम से बात करने वाले अपने भी मुंह मोड़ लेते हैं, और मनुष्य अपनी ही मिट्टी में अकेला रह जाता है।
— नरेश दास वैष्णव निंबार्क
अंतर्राष्ट्रीय लेखक, शोधकर्ता, इतिहासकार एवं भूतपूर्व सैनिक
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