"राम मंदिर आंदोलन का वह सच जो कोई नहीं बताता: वैष्णव बैरागी अखाड़ों की गुप्त भूमिका (दस्तावेजी प्रमाण 18)"
रामजन्मभूमि का इतिहास केवल कुछ घटनाओं या कुछ व्यक्तियों की कथा नहीं है। यह न्यायालयीन अभिलेखों, सरकारी दस्तावेजों, आयोग की रिपोर्टों, धार्मिक संस्थाओं, संत-परंपरा, आंदोलनों और प्रत्यक्षदर्शी तथा मौखिक साक्ष्यों से निर्मित एक जटिल ऐतिहासिक विषय है। इसी कारण इस शोध में वैष्णव बैरागी अखाड़ों की भूमिका को भावनात्मक दावों के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर समझने का प्रयास किया गया है।
1986 इस इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। 1 फरवरी 1986 को फैजाबाद के जिला न्यायाधीश ने विवादित परिसर के ताले खोलने और श्रद्धालुओं को दर्शन की अनुमति देने का आदेश दिया। इस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में रिट याचिकाएँ दायर हुईं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आधिकारिक अभिलेख में रिट याचिका संख्या 746/1986 तथा 3106/1986 का उल्लेख मिलता है।
1989 में रामजन्मभूमि से संबंधित न्यायिक प्रक्रिया और व्यापक आंदोलन ने नया चरण ग्रहण किया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आधिकारिक अभिलेखों में निर्मोही अखाड़ा बनाम बाबू प्रियदत्त राम आदि, वाद संख्या 3/1989, सहित संबंधित वादों का स्पष्ट विवरण उपलब्ध है।
1990 में कारसेवा का आंदोलन व्यापक रूप से सामने आया। गृह मंत्रालय की लिब्रहान आयोग संबंधी आधिकारिक सामग्री में उस समय की लामबंदी, कारसेवकों की अयोध्या की ओर गतिविधियों तथा प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी घटनाओं का क्रम दर्ज है। इसलिए इस कालखंड का अध्ययन राजनीतिक वक्तव्यों के बजाय सरकारी अभिलेखों और आयोग की सामग्री के साथ करना आवश्यक है।
6 दिसंबर 1992 रामजन्मभूमि विवाद के इतिहास की अत्यंत महत्वपूर्ण घटना बनी। इस घटना के संबंध में आयोग की रिपोर्ट, सरकारी अभिलेख, न्यायिक कार्यवाहियाँ और विभिन्न पक्षों के साक्ष्य उपलब्ध हैं। परंतु शोध की दृष्टि से घटना, प्रत्यक्षदर्शी कथन, आयोग के निष्कर्ष और न्यायालयीन निष्कर्ष—इन सभी को एक ही प्रमाण-स्तर पर रखना उचित नहीं है। गृह मंत्रालय आज भी लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में “घटनाओं का क्रम”, “कारसेवकों की लामबंदी”, “संगठनों के पारस्परिक संबंध” और “निष्कर्ष” जैसे अलग-अलग खंड उपलब्ध कराता है।
इस पूरे इतिहास में वैष्णव बैरागी अखाड़ों की भूमिका का प्रश्न विशेष महत्व रखता है। सर्वोच्च न्यायालय के 2019 के निर्णय में निर्मोही अखाड़े को रामानंदी बैरागी परंपरा से संबंधित एक धार्मिक संस्था के रूप में दर्ज किया गया है। इसलिए अखाड़ों की संस्थागत उपस्थिति, उनके महंतों की भूमिका, उनके न्यायिक दावों और उनके धार्मिक-सामाजिक कार्यों को अलग-अलग प्रमाणों के आधार पर देखना आवश्यक है।
2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की विशेष पूर्णपीठ ने अयोध्या से संबंधित प्रमुख वादों पर निर्णय दिया। आधिकारिक अभिलेख में वाद संख्या 1/1989, 3/1989, 4/1989 और 5/1989 तथा 1986 की दोनों रिट याचिकाएँ दर्ज हैं।
इसके बाद 9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने M. Siddiq (D) Thr. Lrs. v. Mahant Suresh Das & Ors. में अंतिम निर्णय दिया। इस निर्णय ने लंबे समय से चले आ रहे विवाद को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से एक निर्णायक चरण तक पहुँचाया।
इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यही है कि इतिहास को केवल स्मृतियों से नहीं, प्रमाणों से पढ़ा जाना चाहिए। जहाँ न्यायालयीन दस्तावेज उपलब्ध हों, वहाँ उनकी भाषा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। जहाँ सरकारी अभिलेख हों, वहाँ उनकी तिथि और संदर्भ सुरक्षित रहना चाहिए। जहाँ मौखिक इतिहास हो, वहाँ उसे उसी व्यक्ति की गवाही या परंपरागत स्मृति के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए—स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं।
रामजन्मभूमि आंदोलन में वैष्णव बैरागी अखाड़ों की भूमिका को समझने के लिए यही दस्तावेजी दृष्टि आवश्यक है। व्यक्ति से संस्था, संस्था से घटना और घटना से इतिहास तक—हर चरण में प्रमाण की अपनी भूमिका है।
इतिहास केवल घटनाओं से नहीं बनता; इतिहास उन घटनाओं के पीछे सुरक्षित दस्तावेजों से भी बनता है।
जय हिंद। जय भारत। जय श्रीराम।
— नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
लेखक | शोधकर्ता | इतिहासकार | UN Veteran
www.nareshswaminimbark.in
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