जय श्री राधे-राधे। जय सीताराम।
4 अक्टूबर 2026 का दिन मेरे जीवन की उन स्मृतियों में शामिल हो गया, जिसे मैं लंबे समय तक नहीं भूल पाऊँगा।
आज मुझे अपने पोते भावेश स्वामी, पोती दिव्यांशी स्वामी और भाई तुलसी बैरागी के साथ जामिया मिल्लिया इस्लामिया क्रिकेट ग्राउंड, ओखला, नई दिल्ली जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
हम जीएसटी जॉइंट कमिश्नर श्री ओमप्रकाश रतूड़ी (से. नि.) जी के आमंत्रण पर वहाँ पहुँचे थे।
कार्यक्रम देवभूमि स्पोर्ट्स महाकौथिग फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित 7वें टी-20 क्रिकेट टूर्नामेंट का उद्घाटन समारोह था, जिसमें 32 उत्तराखंडी क्रिकेट टीमें भाग ले रही थीं।
गेट नंबर 3 से शुरू हुई एक यादगार यात्रा
जब हम गेट नंबर 3 पर पहुँचे तो चारों तरफ क्रिकेट का उत्साह दिखाई दे रहा था। मैदान का वातावरण देखकर ऐसा लगा मानो पूरा परिसर उत्तराखंड की खेल भावना से जीवंत हो उठा हो।
हमने वहाँ बताया कि हम जीएसटी जॉइंट कमिश्नर श्री ओमप्रकाश रतूड़ी (से. नि.) जी के आमंत्रण पर आए हैं। तत्काल हमारे बैठने की व्यवस्था की गई। चाय-पानी और नाश्ता भी कराया गया।
कुछ ही समय बाद रतूड़ी जी स्वयं आए और हमें VIP पवेलियन में बैठाया।
उन्होंने बड़े आत्मीय भाव से वहाँ उपस्थित लोगों से हमारा परिचय कराया। सबसे पहले कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री अर्जुन कंडारी जी से मुलाकात हुई और फिर महासचिव श्री अनिल रौथाण जी से परिचय हुआ।
चारों तरफ मीडिया के कैमरे दिखाई दे रहे थे। चैनल वालों की भी अच्छी उपस्थिति थी।
दीप प्रज्वलन से राष्ट्रगान तक
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ।
इसके बाद बद्री विशाल की आरती की गई।
फिर राष्ट्रगान "जन गण मन" हुआ और तिरंगा ध्वज फहराया गया।
उस समय मन में एक अलग ही भाव था।
मैं हरियाणा से आया था, लेकिन वहाँ बैठकर ऐसा लग रहा था जैसे मैं उत्तराखंड के अपने ही परिवार के बीच हूँ।
इसके बाद रिबन कटिंग हुई, टॉस हुआ और दोनों टीमों के खिलाड़ियों से परिचय कराया गया।
सेना के दिनों की एक पुरानी स्मृति
उसी समय मुझे भारतीय सेना के दिनों की एक पुरानी स्मृति याद आ गई।
जब मेरी उम्र लगभग 38 वर्ष थी, तब मुझे कानपुर क्रिकेट ग्राउंड में क्रिकेट मैच देखने का अवसर मिला था।
और आज मेरे साथ मेरा 6 वर्ष का पोता भावेश स्वामी और 3 वर्ष की पोती दिव्यांशी स्वामी थे।
दोनों मेरे साथ ऐसे घूम रहे थे जैसे मेरे छोटे-छोटे कमांडो हों।
समय कितना बदल जाता है!
कभी मैं सेना की जिम्मेदारियों के बीच क्रिकेट मैदान देख रहा था और आज अपने पोते-पोती का हाथ थामकर उसी खेल की दुनिया में उपस्थित था।
मन में यही विचार आया—
सब परमात्मा की कृपा और किस्मत का खेल है।
वह क्षण जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी
कार्यक्रम के दौरान बड़े स्पीकर से मेरा परिचय कराया गया।
मंच से मेरा परिचय नरेश दास वैष्णव निम्बार्क, अंतरराष्ट्रीय लेखक, शोधकर्ता और इतिहासकार के रूप में कराया गया तथा मुझे विशिष्ट अतिथि के रूप में मंच पर आमंत्रित कर सम्मानित किया गया।
सच कहूँ तो उस क्षण मन भीतर तक प्रसन्न हो गया।
मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक किसान परिवार में जन्मा सामान्य सैनिक किसी दिन इतने बड़े खेल आयोजन में इस प्रकार सम्मान प्राप्त करेगा।
मैं इसे अपना अधिकार नहीं मानता।
मैं इसे परमात्मा की कृपा और लोगों के स्नेह के रूप में देखता हूँ।
मैदान में खेलते रहे भावेश और दिव्यांशी
कार्यक्रम चलता रहा और मेरा पोता भावेश तथा पोती दिव्यांशी विशाल क्रिकेट मैदान में खेलते रहे।
बातचीत और कार्यक्रम के बीच समय कब निकल गया, पता ही नहीं चला।
देखते-देखते दोपहर का एक बज गया।
इसके बाद रतूड़ी जी के साथ भोजन के लिए जाने का अवसर मिला। विशेष कक्ष में बैठाकर उन्होंने हम सभी को भोजन कराया।
भोजन इतना स्वादिष्ट था कि उसके लिए शब्द कम पड़ जाते हैं।
पद से बड़ी होती है आत्मीयता
भोजन-प्रसाद ग्रहण करने के बाद लौटने का समय आया तो जीएसटी जॉइंट कमिश्नर श्री ओमप्रकाश रतूड़ी (से. नि.) जी स्वयं हमें मेट्रो से कालकाजी तक छोड़ने आए।
उनका यह अपनापन मेरे हृदय को छू गया।
किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके पद से नहीं होती, बल्कि उसके व्यवहार, सरलता और आत्मीयता से होती है।
मैं एक किसान परिवार में जन्मा सामान्य सैनिक हूँ। जीवन में जो सम्मान और स्नेह मिला है, उसे परमात्मा की कृपा मानता हूँ।
आज का दिन मेरे लिए केवल क्रिकेट का दिन नहीं था।
यह खेल, संस्कृति, रिश्ते, सम्मान और आत्मीयता का दिन था।
देवभूमि स्पोर्ट्स महाकौथिग फाउंडेशन को इस शानदार आयोजन के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ।
अध्यक्ष श्री अर्जुन कंडारी जी, महासचिव श्री अनिल रौथाण जी और पूरी आयोजन समिति को साधुवाद।
32 उत्तराखंडी क्रिकेट टीमों के सभी खिलाड़ियों को हार्दिक शुभकामनाएँ।
और मेरे प्रिय मित्र जीएसटी जॉइंट कमिश्नर श्री ओमप्रकाश रतूड़ी (से. नि.) जी का विशेष आभार—
आपने बुलाया, अपनापन दिया, सम्मान दिया और विदाई तक साथ दिया।
यह मेरे जीवन की उन यात्राओं में से एक है, जहाँ मैंने फिर महसूस किया—
> "मनुष्य अपनी मंजिल तय करता है, लेकिन उसे वहाँ तक पहुँचाने वाला परमात्मा होता है।"
विशेष प्रकाशन
यह संस्मरण अक्टूबर 2026 की मासिक ई-पत्रिका "सनातन भारत — नया सवेरा" के विशेष अंक में प्रकाशित किया जाएगा।
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना | इतिहासकार | शोधकर्ता | लेखक
जन्मस्थान: ग्राम रामनगर, गन्नौर, सोनीपत, हरियाणा।
www.nareshswaminimbark.in
जय हिंद। जय भारत।
जय श्री राधे-राधे। जय सीताराम।
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