## चौदह ग्रंथ, अठारह वर्ष, एक प्रण — सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा का पुनर्जागरण
जिस हाथ ने कभी सिएरा लियोन की धरती पर मानवता की रक्षा की, वही हाथ आज कलम थामकर सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा को पुनर्जीवित कर रहा है — एक गौरवशाली राज-परंपरा, जिसे इतिहास ने विस्मृति की धूल में दबा दिया था।
आज सुबह छह बजकर तीस मिनट पर, परमात्मा की असीम कृपा से "श्रीमद्भगवद्गीता" की शाश्वत व्याख्या "यथार्थ गीता" का पाठ आरंभ करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पूज्य श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्द जी महाराज द्वारा रचित यह ग्रंथ केवल अनुवाद नहीं, बल्कि गीता के गूढ़ अर्थ की वह व्याख्या है, जिसे स्वयं लेखक अपनी अंतःप्रेरणा और गुरु-कृपा का फल मानते हैं।
इससे पूर्व साधना-पथ पर दो बार रामचरितमानस, एक बार विष्णु पुराण, एक बार शिवपुराण, तथा एक बार सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत का पाठ पूर्ण किया जा चुका है। यह यात्रा किसी उपलब्धि की सूची नहीं, बल्कि निरंतर साधना की वह गाथा है, जो एक सैनिक के अनुशासन और एक भक्त की श्रद्धा — दोनों को साथ लेकर चलती है। जिस प्रकार सीमा पर एक भी दिन का विश्राम शत्रु को अवसर देता है, उसी प्रकार साधना-पथ पर भी निरंतरता ही एकमात्र मार्ग है।
**महर्षि वेदव्यास की वाणी — गीता की सार्वभौमिकता**
महर्षि वेदव्यास जी का यह कथन विशेष रूप से हृदय को स्पर्श करता है — "गीता मानव मात्र का धर्मशास्त्र है।" महाभारत के भीष्मपर्व में वर्णित यह श्लोक स्पष्ट करता है कि गीता स्वयं भगवान पद्मनाभ के श्रीमुख से निःसृत वाणी है, अतः अन्य शास्त्रों के संग्रह की आवश्यकता ही नहीं। यद्यपि विश्व में सर्वत्र गीता का समादर है, फिर भी यह किसी एक मज़हब या सम्प्रदाय का साहित्य नहीं बन सकी — क्योंकि सम्प्रदाय सदैव किसी न किसी रूढ़ि से बंधे होते हैं, जबकि गीता सम्पूर्ण विश्व-मनीषा की साझी धरोहर है। यही भाव इस कार्य से भी जुड़ता है — सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा का प्रचार भी किसी एक वर्ग या कुल के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के हित में है।
**सिएरा लियोन से लेकर अठारह वर्षों के शोध तक**
वर्ष दो हजार में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के अंतर्गत सिएरा लियोन, पश्चिम अफ़्रीका में सेवा का अवसर मिला — यह सैन्य जीवन का वह अध्याय था, जिसने राष्ट्र-सेवा से परे, मानवता-सेवा की व्यापक दृष्टि प्रदान की। सेना से सेवानिवृत्ति के पश्चात्, पिछले अठारह वर्षों में सम्पूर्ण भारतवर्ष की तीन बड़ी शोध-यात्राएँ, निरंतर क्षेत्र-अनुसंधान, तीर्थ-भ्रमण, तथा निम्बार्क सम्प्रदाय के अनेक मूल ग्रंथों का गहन अध्ययन किया गया। यह सब आज छह हिंदी और आठ अंग्रेज़ी पुस्तकों, अर्थात् कुल चौदह ग्रंथों के रूप में साकार हुआ है।
यह अकेला परिश्रम नहीं रहा — इस यात्रा में अनेक हाथों का मौन सहयोग जुड़ा है, चाहे वे धर्मपत्नी श्रीमती निर्मला वैष्णव जी हों, जिन्होंने हर तीर्थ-यात्रा में साथ दिया, या वे विद्वान मित्र हों जिन्होंने भाषा-शुद्धिकरण में सहायता की। इसी क्रम में AI सहायता (Claude) का योगदान भी उल्लेखनीय रहा है, जिसने शोध-संकलन, भाषा-प्रवाह और अभिव्यक्ति में निरंतर साथ दिया।
**सनातन-प्रचार का सुअवसर**
सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा, जो कभी दिल्ली, पंजाब, छत्तीसगढ़ और सोनीपत जैसे क्षेत्रों में एक गौरवशाली राज-परंपरा रही, किंतु समय के साथ इतिहास के पन्नों में दबा दी गई — उसे पुनर्जीवित करने का यह प्रयास है। उद्देश्य कभी व्यापारिक लाभ नहीं रहा; जैसा गीता स्वयं सिखाती है — फल की चिंता किए बिना कर्म करते रहना ही धर्म है। सफलता मिले या न मिले, यह परमात्मा के अधीन विषय है; प्रयास करना ही कर्तव्य और फ़र्ज़ है।
**यथार्थ गीता का संदेश — जीवन का दर्पण**
ग्रंथ में एक अत्यंत सुंदर श्लोक है — "एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतम्, एको देवो देवकीपुत्र एव। एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि, कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा।।" अर्थात् एक ही शास्त्र है जो देवकीपुत्र भगवान ने गाया, एक ही देव पूजनीय है, एक ही मंत्र है उनका नाम, और एक ही कर्म है — उस देव की सेवा। यही भाव जीवन में भी प्रतिबिंबित होता है — पहले बंदूक लेकर, सिएरा लियोन तक, राष्ट्र और मानवता की सेवा की; अब कलम लेकर सनातन संस्कृति की सेवा की जा रही है। दोनों ही सेवाएँ, एक ही समर्पण की भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।
**आगामी ग्रंथ — एक नई भूमि का आह्वान**
शीघ्र ही एक नई पुस्तक भी प्रकाशित होने जा रही है — "सनातन कुरुक्षेत्र सृष्टि: सतलुज, श्रीकृष्ण भगवान की अमर भूमि" — जो एक और उपेक्षित पावन भूमि के गौरवशाली किंतु विस्मृत इतिहास को उजागर करेगी। यह ग्रंथ हृदय के अत्यंत निकट है, क्योंकि सनातन धर्म के सच्चे प्रचार-प्रसार के लिए केवल कथा सुनाना पर्याप्त नहीं — उन पावन भूमियों को पुनः प्रतिष्ठित करना भी उतना ही आवश्यक है, जहाँ स्वयं भगवान ने लीला रची। सतलुज तट की यह भूमि, जो कभी श्रीकृष्ण भगवान की लीला-स्थली रही, आज विस्मृति की उसी धूल तले दबी है, जिस धूल तले मूँगी ग्राम और रामनगर जैसे तीर्थ दबे मिले थे। यह ग्रंथ उसी अनवरत यात्रा की अगली कड़ी है — भूली हुई पावन भूमियों को उनका खोया हुआ सम्मान लौटाने की यात्रा, जो अठारह वर्ष पूर्व आरंभ हुई थी।
व्यक्तिगत साधना में रामायण को दो बार, महाभारत को एक बार, तथा अब यथार्थ गीता को पढ़ने का यह क्रम भी इसी विश्वास से जुड़ा है — कि शास्त्र-अध्ययन और भूमि-अनुसंधान, दोनों साथ-साथ चलने चाहिए। केवल ग्रंथ पढ़ना पर्याप्त नहीं; उन ग्रंथों में वर्णित पावन भूमियों को खोजना, दस्तावेज़ीकरण करना और समाज तक पहुँचाना भी उतना ही आवश्यक धर्म-कार्य है।
गीता कहती है — मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। इसी भावना के साथ, यह यात्रा निरंतर जारी रहेगी — जब तक शरीर में प्राण हैं, तब तक सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा की सेवा होती रहेगी।
जय श्री राधे। जय श्री कृष्ण। जय निम्बार्काचार्य।
- Link to Vaishnav Samaj — History for context
- Link to Books for deeper learning
- Link to related posts on values, seva and gratitude