नरेश दास वैष्णव निम्बार्क | सनातन वैष्णव बैरागी इतिहासकार | 16 पुस्तकें

नरेश दास वैष्णव निम्बार्क — पूर्व सैनिक, इतिहासकार एवं सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा शोधकर्ता। 24 वर्ष सैन्य सेवा, 18 वर्ष शोध, 16 पुस्तकें, 190+ देशों में उपलब्ध। वेदों से आधुनिक भारत तक का गुमनाम इतिहास।

Sanatan History & Heritage5 min read

न्यूज़ीलैंड तक पहुँची सोनीपत की गाथा — पूर्व फौजी नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की 16 पुस्तकें अब ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड दोनों में उपलब्ध
नरेश कुमार, सोनीपत, हरियाणा (HR)
रामनगर, गन्नौर, सोनीपत निवासी मानद नायब सूबेदार (से.नि.) नरेश दास वैष्णव 'निम्बार्क' की साहित्यिक यात्रा एक और मोर्चा पार कर गई है। ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े पुस्तक विक्रय मंच Booktopia पर पहले से सूचीबद्ध उनकी कृतियाँ — महंत बने महाराजा, Rosary and the Throne: The Vaishnav Bairagi Rulers तथा स्वर्णप्रस्थ की गाथा — अब इसी मंच के माध्यम से न्यूज़ीलैंड के पाठकों तक भी सीधे पहुँच रही हैं, क्योंकि Booktopia ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ न्यूज़ीलैंड में भी नियमित डिलीवरी सेवा प्रदान करता है।
इसके अतिरिक्त, Amazon.com.au — जो जुलाई से न्यूज़ीलैंड के ग्राहकों को सीधी शिपिंग सुविधा दे रहा है — पर भी लेखक की 16 पुस्तकों में से अनेक हार्डकवर, पेपरबैक तथा Kindle संस्करणों में उपलब्ध हैं। इस प्रकार एक ही डिजिटल-वाणिज्यिक सेतु से सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा का इतिहास अब ऑकलैंड, वेलिंगटन, हैमिल्टन जैसे न्यूज़ीलैंड के प्रमुख शहरों में बसे भारतीय समुदाय — जिनकी संख्या लगभग तीन लाख है — तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त कर चुका है।
न्यूज़ीलैंड में सनातन संस्कृति की उपस्थिति
गौरतलब है कि न्यूज़ीलैंड में भारतीय मूल के निवासी वहाँ का तीसरा सबसे बड़ा जातीय समूह हैं, तथा वहाँ हिन्दू धर्म देश का दूसरा सबसे बड़ा तथा सबसे तेज़ी से बढ़ता धर्म है। ऑकलैंड में स्थापित भारतीय मंदिर (Bharatiya Mandir), श्री स्वामीनारायण मंदिर तथा वेलिंगटन में BAPS हिन्दू मंदिर जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र वहाँ के भारतीय समुदाय की गहरी आध्यात्मिक जड़ों के प्रमाण हैं। ऐसे में नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की पुस्तकों का न्यूज़ीलैंड पहुँचना केवल एक व्यावसायिक उपलब्धि नहीं, अपितु उस समुदाय के लिए एक सांस्कृतिक उपहार भी है, जो अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहता है, परंतु विदेश में रहते हुए प्रामाणिक स्रोतों की कमी महसूस करता है।
24 वर्ष सैन्य सेवा से 18 वर्ष के शोध तक — एक अद्वितीय यात्रा
भारतीय सेना में 24 वर्षों तक राष्ट्र की सेवा करने वाले नरेश दास वैष्णव निम्बार्क का जीवन स्वयं में एक प्रेरक गाथा है। ऑपरेशन विजय (कारगिल युद्ध) में भाग लेने के पश्चात्, वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के अंतर्गत सिएरा लियोन (पश्चिम अफ्रीका) में सेवा के दौरान उग्रवादियों द्वारा बंदी बनाए जाने की घटना ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी। उसी क्षण उन्होंने बंदूक छोड़कर कलम उठाने का संकल्प लिया। सेवानिवृत्ति के पश्चात् पिछले 18 वर्षों में उन्होंने अथक शोध कर सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा के उन गुमनाम अध्यायों को उजागर किया है, जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास-लेखन में उचित स्थान नहीं मिल सका।
इसी शोध-यात्रा के फलस्वरूप अब तक 16 पुस्तकें (7 हिंदी, 9 अंग्रेज़ी) प्रकाशित हो चुकी हैं, जो वीर बंदा बैरागी, जगतगुरु निम्बार्काचार्य तथा वैष्णव बैरागी राजाओं के इतिहास को प्रकाश में लाती हैं। इनमें महंत बने महाराजा, यात्रा: बंदूक से कलम तक, निम्बार्क सम्प्रदाय: सनातन वैष्णव बैरागी, जगतगुरु निम्बार्काचार्य: सनातन के सूर्य, रामनगर: 422 वर्षों का अनसुना इतिहास, द वैष्णव बैरागी किंग्स ऑफ इंडिया, रणभूमि से तीर्थभूमि तक, स्वर्णप्रस्थ की गाथा तथा रोज़री एंड द थ्रोन जैसी कृतियाँ सम्मिलित हैं, जिन्हें Amazon, Flipkart, Notion Press तथा अब Booktopia (ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर व्यापक सराहना मिल चुकी है।
491 पृष्ठों का नवीनतम महाग्रंथ भी आज प्रकाशित
इसी क्रम में लेखक की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि आज सामने आई है — उनकी 16वीं तथा अब तक की सबसे विशाल कृति "सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा: वेदों से आधुनिक भारत तक" (Sanatan Vaishnav Bairagi Parampara: From the Vedic Age to Modern India) आज विधिवत प्रकाशित हो चुकी है। 491 पृष्ठों का यह महाग्रंथ हिंदी एवं अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में एक साथ उपलब्ध कराया गया है — जिससे यह न केवल भारत के हिंदीभाषी पाठकों तक, अपितु ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, अमेरिका जैसे देशों में बसे अंग्रेज़ीभाषी भारतीय प्रवासी समुदाय तक भी सीधे पहुँच रहा है।
इस ग्रंथ में वेद, उपनिषद्, पुराण, पांचरात्र साहित्य, शिलालेख तथा ताम्रपत्र जैसे प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर वैष्णव बैरागी समाज की वैदिक कालखण्ड से आधुनिक युग तक की अखंड ऐतिहासिक यात्रा प्रस्तुत की गई है। इसमें समाज की सामाजिक-प्रशासनिक संरचना, विभिन्न रियासतों (बंदा बैरागी, छुईखदान, राजनंदगाँव) के शासकीय अभिलेख, तथा भक्ति-त्याग-राष्ट्रसेवा की अनेक गाथाएँ समाहित हैं। "दावों से नहीं, दस्तावेज़ों से बोलेगा इतिहास" — यही इस कृति का मूल उद्घोष है, जो लेखक के अनुशासित तथा प्रमाण-आधारित शोध-दृष्टिकोण को दर्शाता है।
द्विभाषी प्रकाशन की रणनीतिक महत्ता
एक ही ग्रंथ को हिंदी एवं अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में साथ-साथ प्रकाशित करने का निर्णय लेखक की दूरदर्शी सोच का परिचायक है। जहाँ हिंदी संस्करण भारत के हिंदीभाषी पाठक-वर्ग तथा वैष्णव बैरागी समाज की जड़ों से सीधे जुड़े लोगों तक पहुँच रहा है, वहीं अंग्रेज़ी संस्करण विदेशों में बसे भारतीय प्रवासी समुदाय तक — विशेषकर उन युवा पीढ़ियों तक जो हिंदी में सहज नहीं हैं, परंतु अपनी सांस्कृतिक जड़ों को जानना चाहते हैं — इस गुमनाम इतिहास को सुलभ बना रहा है। इस प्रकार यह ग्रंथ भाषा की सीमाओं को लांघकर एक वैश्विक पाठक-वर्ग तक सनातन संस्कृति के इस महत्वपूर्ण अध्याय को पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन गया है।
लेखक का संदेश
लेखक का स्पष्ट मत है कि उनकी पुस्तकें केवल ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से नहीं, अपितु समाज में जागरूकता, आत्मगौरव तथा सनातन संस्कृति के प्रति श्रद्धा की भावना जागृत करने हेतु रची गई हैं। उनके शब्दों में — "जहाँ भी सनातन संस्कृति से जुड़ा भारतीय समाज बसा है, वहाँ तक यह गुमनाम इतिहास पहुँचाना ही मेरा एकमात्र लक्ष्य है। मेरा उद्देश्य उन गुमनाम योद्धाओं और संतों के इतिहास को पुनर्जीवित करना है, जो भारत माँ के लिए जिए और मरे।"
उपलब्धता
लेखक की सभी 16 पुस्तकें, जिनमें नवीनतम 491-पृष्ठीय महाग्रंथ भी सम्मिलित है, हार्डकवर, पेपरबैक तथा Kindle संस्करणों में Amazon (भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया) तथा Booktopia (ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड) पर उपलब्ध हैं। विशेष उल्लेखनीय है कि लेखक की अधिकांश अंग्रेज़ी पुस्तकें Kindle तथा Google Books पर नि:शुल्क (Free) उपलब्ध हैं, तथा हिंदी पुस्तकें भी अनेक मंचों पर बिना किसी मूल्य के पढ़ी जा सकती हैं। इच्छुक पाठक अधिक जानकारी हेतु लेखक की आधिकारिक वेबसाइट www.nareshswaminimbark.in पर भी जा सकते हैं, जहाँ नि:शुल्क मासिक ई-पत्रिका "सनातन भारत नया सवेरा" भी उपलब्ध है।
लेखक स्पष्ट करते हैं कि उनका उद्देश्य कभी भी धनोपार्जन नहीं रहा — उनके ही शब्दों में, "हमारा काम पैसे कमाने का नहीं है, केवल सनातन का प्रचार करना है। सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा को देश-विदेश में पहचान दिलाना है, और दबे हुए इतिहास को समाज के सामने लाना है।" यही निःस्वार्थ भावना उनकी अधिकांश पुस्तकों को नि:शुल्क उपलब्ध कराने के निर्णय के पीछे की मूल प्रेरणा है।

संपर्क: नरेश दास वैष्णव 'निम्बार्क' | www.nareshswaminimbark.in | रामनगर, गन्नौर, सोनीपत, हरियाणा
समाचार लिंक (AIMAMEDIA): https://aimamedia.org/newsdetails.aspx?type=Share&nid=706706

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