169 साल बाद भी गुमनाम: 1857 के शहीद रामप्रसाद बैरागी को अब मिली वैश्विक पहचान, सुबाथू में स्मारक अब भी अधूरा

1857 में सुबाथू के राधा-कृष्ण मंदिर के पुजारी रामप्रसाद बैरागी ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध क्रांतिकारियों के लिए गुप्त संदेश-तंत्र तैयार किया था, जिसकी कीमत उन्हें फाँसी देकर चुकानी पड़ी। 169 साल बाद भी उनका स्मारक अधूरा है — पर एक सेवानिवृत्त सैनिक की 18 साल की मुहिम से आज उनकी गाथा 190 देशों के पाठकों तक पहुँच चुकी है।

इतिहास (History)6 min read

169 वर्षों से गुमनाम रहा 1857 का यह वीर बलिदानी!
अब उसकी गाथा आयरलैंड तक पहुँच चुकी है — क्या आपने रामप्रसाद बैरागी का नाम सुना है?
भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, किंतु समय के प्रवाह में उन्हें इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिल सका जिसके वे सच्चे अधिकारी थे। रामप्रसाद बैरागी ऐसा ही एक नाम है — एक ऐसा नाम, जिसे स्मरण करना हम सभी का कर्तव्य है।
आज मेरे लिए अत्यंत गर्व का क्षण है कि मेरी पुस्तकें अब आयरलैंड में भी Amazon के माध्यम से पाठकों तक पहुँच रही हैं। दुबई, नेपाल, अमेरिका, कनाडा, जापान और ब्रिटेन के पश्चात अब आयरलैंड इस ऐतिहासिक यात्रा का सातवाँ देश बन गया है। यह केवल मेरी पुस्तकों की यात्रा नहीं, अपितु सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा के अनसुने इतिहास की वैश्विक यात्रा है।
1857 का गुमनाम क्रांतिकारी — रामप्रसाद बैरागी
सन् 1857 में हिमाचल प्रदेश के सुबाथू (कसौली) स्थित राधा-कृष्ण मंदिर के पुजारी रामप्रसाद बैरागी ने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संघर्षरत क्रांतिकारियों के लिए एक गुप्त संदेश-तंत्र तैयार किया था। मंदिर की पवित्र आड़ में वे विभिन्न क्रांतिकारी समूहों के बीच गोपनीय पत्र पहुँचाने का अत्यंत जोखिमपूर्ण कार्य करते थे — एक ऐसा कार्य, जिसमें प्राणों की आहुति सदैव संभावित थी।
12 जून 1857 को उनके कुछ गुप्त पत्र तत्कालीन अंबाला कमिश्नर जी. सी. बार्न्स (G. C. Barnes) के हाथ लग गए। इसके पश्चात उन्हें गिरफ्तार कर अंबाला ले जाया गया, और अंग्रेज़ों ने उन्हें फाँसी पर लटका दिया। इतिहासकार उन्हें 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के उन गुमनाम बलिदानियों में गिनते हैं, जिनके बलिदान का मूल्य उनकी प्रसिद्धि से कहीं अधिक था, किंतु जिन्हें आज भी बहुत कम लोग जानते हैं।
मेरी 18 वर्षों की खोज
सन् 2017 में जब यह समाचार मिला कि सुबाथू के तिरंगा चौक पर रामप्रसाद बैरागी जी का स्मारक बनाया जाएगा, तभी से मैंने इस विषय पर सतत् प्रयास आरंभ किए। यह यात्रा सरल नहीं रही:
• अनेक RTI आवेदन दायर किए गए।
• छावनी परिषद सुबाथू तथा हिमाचल प्रदेश सरकार को औपचारिक प्रार्थना-पत्र भेजे गए।
• स्वयं दो बार शिमला सचिवालय जाकर निवेदन प्रस्तुत किया।
• दो बार सुबाथू जाकर उस स्थान का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया, जहाँ स्मारक बनने की बात कही गई थी।
एक सैनिक के अनुशासन के साथ, बिना विश्राम के, यह अभियान वर्षों तक चलता रहा। आज भी मेरा उद्देश्य केवल एक है — देश इस भूले-बिसरे स्वतंत्रता सेनानी को उसका उचित सम्मान प्रदान करे।
मुख्यमंत्री से भेंट, फिर भी मौन
अपनी इन दो यात्राओं में से एक अवसर पर मुझे स्वयं हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री महोदय से भेंट करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। उन्होंने मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनी और स्वीकार किया कि यह कार्य वर्षों पूर्व ही हो जाना चाहिए था। किंतु आश्वासन के पश्चात भी आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई — मानो वह भेंट भी समय की धूल में कहीं खो गई हो।
जब मैं स्वयं उस चौराहे पर पहुँचा और स्थिति का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया, तो वहाँ न कोई स्मारक था, न कोई शिलापट्ट — केवल एक बिजली का खम्भा वहाँ खड़ा मिला। सन् 2017 से अब तक समाचार-पत्रों में भी यह समाचार बार-बार छपता रहा है कि रामप्रसाद बैरागी जी के नाम पर इस चौक का नामकरण किया जाएगा, किंतु धरातल पर आज तक कुछ भी साकार नहीं हुआ। कागज़ों पर बनी योजनाएँ और धरातल की वास्तविकता के बीच यह दूरी ही सबसे बड़ी पीड़ा है।
एक सैनिक के लिए यह सहन करना कठिन है कि जिस मिट्टी की रक्षा के लिए एक क्रांतिकारी ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, उसी मिट्टी पर आज तक उसका नाम तक अंकित नहीं हो सका। फिर भी मैं आशावादी हूँ — जब तक साँस है, यह संघर्ष जारी रहेगा।
मेरी कलम नहीं रुकी
जब सरकारी अभिलेखों और योजनाओं में यह इतिहास पीछे छूटता दिखाई दिया, तब मैंने इसे अपनी पुस्तकों में सदा के लिए सुरक्षित करने का निश्चय किया। जो कार्य राजकीय तंत्र नहीं कर सका, वह एक सैनिक की कलम ने करने का संकल्प लिया।
आज रामप्रसाद बैरागी जी का उल्लेख मेरी पुस्तकों में विस्तार से दर्ज है —
• यात्रा: बंदूक से कलम तक (2022 एवं 2026 संस्करण)
• Sanatan Vaishnav Bairagi: Warriors and Soldiers
ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस बलिदान को कभी विस्मृत न करें, और वैष्णव बैरागी परंपरा का यह गौरवशाली अध्याय सदैव जीवित रहे।
इसी यात्रा-काल में एक और पुस्तक भी जन्मी — अप्रत्याशित शिमला (यात्रा वृत्तांत)। इसकी कुछ प्रतियाँ मैंने स्थानीय प्रेस से छपवाकर सीमित रूप से वितरित कीं, किंतु इसे कभी किसी बड़े प्रकाशन-मंच पर प्रकाशित नहीं करवाया। मध्य प्रदेश की मेरी एक परिचित, वंदना नाटेश्वरी जी, ने जब यह इच्छा व्यक्त की कि वे मेरे इन लेखों को पुस्तक का रूप देकर वितरित करना चाहती हैं, तो मैंने सहर्ष उन्हें इस पुस्तक का सम्पादक नियुक्त कर दिया। श्रेय की कोई अपेक्षा नहीं — मैंने इस पुस्तक से अपना मोह उसी क्षण त्याग दिया।
बंदूक से कलम तक
24 वर्षों तक भारतीय सेना में सेवा देने के पश्चात मैंने बंदूक तो रख दी, किंतु इतिहास की रक्षा हेतु कलम उठा ली। एक सैनिक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता — केवल उसका मोर्चा बदल जाता है।
आज मेरी 14 पुस्तकें विश्व के 190 देशों में उपलब्ध हैं। यह कार्य किसी संस्था, ट्रस्ट अथवा चंदे से नहीं, अपितु मेरी सैन्य पेंशन और वर्षों के व्यक्तिगत, अथक शोध से आगे बढ़ रहा है।
यदि आज रामप्रसाद बैरागी जी का स्मारक अभी भी अधूरा है, तो कम-से-कम उनका नाम अब विश्व के अनेक देशों के पाठकों तक पहुँच चुका है। यही मेरी ओर से उस महान क्रांतिकारी को दी गई सच्ची श्रद्धांजलि है।
आइए, इस गाथा को आगे बढ़ाएँ
यह केवल एक पुस्तक अथवा एक स्मारक की बात नहीं है। यह हमारी सामूहिक स्मृति का प्रश्न है — क्या हम उन बलिदानियों को स्मरण रखेंगे, जिन्होंने बिना किसी अपेक्षा के अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया? यदि यह गाथा आपके हृदय को स्पर्श करे, तो इसे आगे बढ़ाइए, ताकि रामप्रसाद बैरागी जी का नाम अगली पीढ़ी तक अवश्य पहुँचे।
कसौली की वह भूमि, जहाँ संघर्ष का बीज बोया गया
इस खोज-यात्रा में मैं कसौली भी गया हूँ — वही भूमि, जहाँ रामप्रसाद बैरागी जी ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष की नींव तैयार की थी। उस पवित्र मिट्टी पर खड़े होकर यह अनुभव हुआ कि इतिहास केवल पुस्तकों में नहीं, अपितु उन स्थानों की चुप्पी में भी बोलता है, जहाँ बलिदान हुआ था।
सन् 2008 में जिस यात्रा का आरंभ हुआ था, आज भी मैं मानो उसी बिंदु पर खड़ा हूँ — स्मारक अब भी अधूरा है, चौराहा अब भी सूना है। किंतु इतना अवश्य हुआ है कि अनेक इतिहास की पुस्तकों में, आप सबके सहयोग से, यह गाथा अब सदा के लिए अंकित हो चुकी है। यही इस लंबे संघर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
जय हिन्द। जय सनातन। जय वैष्णव बैरागी परंपरा।

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नरेश दास वैष्णव 'निम्बार्क'
सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं इतिहासकार
अध्यक्ष, वैश्विक सनातन वैष्णव बैरागी सेवा संगठन
वेबसाइट: www.nareshswaminimbark.in

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