"सनातन अयोध्या खंड 2: राम जन्मभूमि में वैष्णव बैरागी अखाड़ों की भूमिका — चतुर्थ शोध-यात्रा का वृत्तांत"

7 से 11 सितंबर 2026 तक अयोध्या की चतुर्थ शोध-यात्रा में इतिहासकार नरेश दास वैष्णव निम्बार्क ने हनुमानगढ़ी, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर, मणिराम दास छावनी, निर्मोही व दिगंबर अखाड़ा, दशरथ महल और कनक भवन तक पहुँचकर वैष्णव बैरागी परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्यों का संकलन किया। महंत धर्मदास जी महाराज के साथ हुए विस्तृत साक्षात्कार में राम जन्मभूमि आंदोलन, FIR तथा न्यायालयीन दस्तावेजों से जुड़ी लगभग 300 पृष्ठों की सामग्री प्राप्त हुई। यह वृत्तांत आगामी पुस्तक "सनातन अयोध्या खंड 2" की शोध-यात्रा की पहली झलक प्रस्तुत करता है।

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सनातन अयोध्या खंड 2: राम जन्मभूमि में वैष्णव बैरागी अखाड़ों की भूमिका — चतुर्थ शोध-यात्रा का वृत्तांत
7 से 11 सितंबर 2026 — चतुर्थ अयोध्या शोध-यात्रा का पूर्ण वृत्तांत
अयोध्या की यह मेरी चौथी यात्रा रही, किंतु इस बार उद्देश्य केवल दर्शन नहीं, शोध था। श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े इतिहास तथा वैष्णव बैरागी संतों, अखाड़ों और छावनियों की भूमिका को प्रमाणों के साथ खोजकर सुरक्षित करना, यही इस यात्रा का संकल्प था। इस पूरे शोध-कार्य में मास्टर जगबीर वैष्णव जी सह-शोधयात्री के रूप में उपस्थित रहे।
दिल्ली जंक्शन से अयोध्या एक्सप्रेस में यात्रा आरंभ हुई। मन में एक ही संकल्प था — अयोध्या की धरती पर बिखरे उन स्थलों, मठों, छावनियों, अखाड़ों, मंदिरों और परंपराओं को निकट से देखना, जिनका संबंध सनातन वैष्णव-बैरागी परंपरा से रहा है।
अयोध्या कैंट पहुँचने के पश्चात हनुमानगढ़ी के दर्शन किए गए। पंक्ति व्यवस्था में स्वयं को व्यवस्थित करते हुए विधिवत दर्शन हुए। इसी बीच एक नवदीक्षित साधु को दीक्षा-पश्चात माला अर्पण का दृश्य देखने का सौभाग्य मिला। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य द्वार से होते हुए मंदिर परिसर पहुँचा गया। मंदिर निर्माण के पश्चात प्रथम बार दर्शन का सौभाग्य मिला, जहाँ स्वर्णाभूषित द्वारों की आभा, बारीक शिल्पकारी और चौबीस वैष्णव अवतारों की कलात्मक प्रस्तुतियों के दर्शन हुए। तत्पश्चात मणिराम दास छावनी में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास जी महाराज के दर्शन का सौभाग्य मिला।
अगले दिन अन्तर्राष्ट्रीय रामायण एवं वैदिक शोध संस्थान, तुलसी स्मारक में पुस्तकालय-प्रभारी श्री विशाल उपाध्याय जी से भेंट हुई और लगभग दो घंटे शोधकार्य किया गया। पुस्तकालय हेतु तीन पुस्तकें भेंट की गईं तथा शोध-विषय का प्रपत्र भरा गया। निर्मोही अखाड़ा में महंत रामदास जी से भेंट हुई, जिन्होंने बताया कि सन उन्नीस सौ बयासी में चोरी के कारण अखाड़े के पुराने अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं, इसे मौखिक सूचना के रूप में दर्ज किया गया। दिगंबर अखाड़ा में स्थानीय रूप से अखाड़ा लगभग सात सौ वर्ष पुराना बताया गया, तथा समक्ष स्थित आचार्य जी मंदिर लगभग एक हजार वर्ष पुराना बताया गया, जहाँ श्रीराम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्न के स्नान की परंपरा-कथा प्रचलित है। इन तथ्यों को स्थानीय मौखिक परंपरा के रूप में दर्ज किया गया है, प्रमाण की खोज शेष है। सायं सरयू तट पर तुलसी घाट की आरती में सम्मिलित होने के पश्चात नया घाट, लक्ष्मण घाट और गुप्तार घाट के भी दर्शन किए गए।
तीसरे दिन हनुमानगढ़ी में दो पूज्य संतों से प्रत्यक्ष भेंट और महत्वपूर्ण संवाद का सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्री महंत धर्मदास जी महाराज ने शोध-कार्य के उद्देश्य को समझते हुए सहयोग व मार्गदर्शन का आश्वासन दिया तथा अयोध्या और श्रीराम जन्मभूमि से संबंधित महत्वपूर्ण ग्रंथ उपलब्ध कराए। श्री महंत राजू दास जी महाराज से हनुमानगढ़ी की परंपरा, वैष्णव बैरागी व्यवस्था तथा श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े विषयों पर महत्वपूर्ण संवाद हुआ। शोध का आधार यहाँ भी स्पष्ट रहा — जहाँ दस्तावेज मिलेंगे, वहाँ दस्तावेज प्रस्तुत होंगे; जहाँ मौखिक जानकारी मिलेगी, वह मौखिक परंपरा के रूप में ही दर्ज होगी।
यात्रा के अंतिम चरण में चक्रवर्ती सम्राट महाराजा दशरथ के महल में लगभग एक घंटा बिताया गया, जहाँ मुख्य उदारी जी ने पुष्टि की कि यह महल दिगंबर बैरागी अखाड़े के अधीन है। कनक भवन में मुख्य पुजारी जी ने बताया कि यह स्वर्णमय भवन देवाचार्य पीठ, रेवासा धाम से संबंधित है। भवन में लगे ऐतिहासिक शिलालेख, जिनमें त्रेता युग से महाराजा विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त और महारानी वृषभानु कुँवरी के पुनर्निर्माण तक का विवरण अंकित है, शोध हेतु छायाचित्रित किए गए।
इस यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि महंत धर्मदास जी महाराज से हुआ विस्तृत साक्षात्कार रहा। बाबा अभिराम दास बैरागी जी की गुरु-परंपरा से जुड़े महंत धर्मदास जी से रामजन्मभूमि, आंदोलन, प्रथम सूचना रिपोर्ट और न्यायालयीन मामलों पर उन्नीस मिनट चार सेकंड की विस्तृत बातचीत हुई। इस भेंट में लगभग तीन सौ पृष्ठों की पुरानी दस्तावेजी सामग्री देखने व प्रतिलिपि प्राप्त करने का अवसर मिला, जिसमें समाचार-पत्र कटिंग, प्रथम सूचना रिपोर्ट की प्रतियाँ तथा न्यायालयीन सामग्री सम्मिलित थी। बाईस-तेईस दिसंबर उन्नीस सौ उनचास की रात से जुड़ी गुरु-परंपरा की स्मृतियाँ भी साझा की गईं। प्रत्येक दस्तावेज़ का स्रोत, तिथि व प्रकृति पृथक रूप से जाँची जाएगी। इसके अतिरिक्त महंत अभिराम दास जी के नाम से संचालित गौशाला व वेद-वेदांत विद्यालय स्थल पर उनके शिष्य बालक दास जी महाराज से लगभग सात मिनट का साक्षात्कार भी लिया गया।
निर्मोही, निर्वाणी व दिगंबर अखाड़ों के संतों की मौखिक स्मृतियाँ, तीन सौ पृष्ठों के दस्तावेज़, पुराने चित्र, शिलालेख और अनेक संतों का स्नेह-सहयोग — यह सामग्री अब दूसरे चरण में प्रवेश करेगी: स्रोतों की जाँच, प्रमाणों का सत्यापन और उसके आधार पर लेखन। एक सैनिक जब रणभूमि में उतरता है तो उसका लक्ष्य स्पष्ट होता है। उसी सैन्य अनुशासन के साथ, बंदूक से कलम तक की यात्रा में, अयोध्या की धरती पर इतिहास के उन पन्नों को खोजने का प्रयास जारी है, जो समय की परतों में कहीं दब गए हैं।
दावे नहीं, दस्तावेज बोलेंगे। श्रद्धा अपनी जगह है, शोध अपनी जगह। और इतिहास में अंतिम आधार, प्रमाण है।
आगामी इक्कीसवीं पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य है: सनातन अयोध्या खंड 2 — रणभूमि से रामलला तक: वैष्णव बैरागी अखाड़ों की संघर्ष-गाथा।

नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना | इतिहासकार | शोधकर्ता | लेखक
सह-शोधयात्री: मास्टर जगबीर वैष्णव जी
www.nareshswaminimbark.in

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