सनातन अयोध्या — खण्ड 2: रणभूमि से रामलला तक (21वीं पुस्तक की घोषणा)

नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की 21वीं पुस्तक — वैष्णव बैरागी अखाड़ों की संघर्ष-गाथा, अयोध्या से।

इतिहास (History)3 min read

अयोध्या की पावन धरती से नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की 21वीं पुस्तक जल्द प्रकाशित होगी
जय श्रीराम • जय सीताराम • जय श्री राधे-राधे

सनातन अयोध्या — खण्ड 2
रणभूमि से रामलला तक: वैष्णव बैरागी अखाड़ों की संघर्ष-गाथा
लेखक नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की 21वीं पुस्तक शीघ्र प्रकाशित होगी।

अयोध्या की पावन भूमि पर मेरी चतुर्थ शोध-यात्रा निरंतर आगे बढ़ रही है। इस यात्रा का उद्देश्य केवल दर्शन करना नहीं, बल्कि श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े इतिहास तथा वैष्णव बैरागी संतों, अखाड़ों और छावनियों की भूमिका को प्रमाणों के साथ खोजकर सुरक्षित करना है।
इस शोध-कार्य में मेरे साथ मास्टर जगबीर वैष्णव जी सह-शोधयात्री के रूप में उपस्थित हैं।
इसी क्रम में हनुमानगढ़ी, अयोध्या में दो पूज्य संतों से प्रत्यक्ष भेंट और महत्वपूर्ण संवाद का सौभाग्य प्राप्त हुआ —
श्री महंत धर्मदास जी महाराज
श्री महंत राजू दास जी महाराज
श्री महंत धर्मदास जी महाराज से भेंट
श्री महंत धर्मदास जी महाराज से हुई भेंट हमारे शोध-कार्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
उन्होंने हमारे शोध-कार्य के उद्देश्य को समझते हुए सहयोग एवं मार्गदर्शन का आश्वासन दिया तथा अयोध्या और श्रीराम जन्मभूमि से संबंधित महत्वपूर्ण ग्रंथ उपलब्ध कराए।
विशेष रूप से उन्होंने आवश्यक ऐतिहासिक सामग्री एवं प्रमाण उपलब्ध कराने में सहयोग करने का आश्वासन दिया।
इस अवसर पर मैंने पूज्य धर्मदास जी महाराज को अपनी दो पुस्तकें सादर भेंट कीं —
यात्रा: बंदूक से कलम तक
महंत बने महाराजा
उन्होंने पुस्तक के लिए अपना शुभकामना संदेश एवं चित्र देने की भी सहमति प्रदान की।
हमारे लिए यह केवल व्यक्तिगत सहयोग नहीं, बल्कि शोध-कार्य को मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
श्री महंत राजू दास जी महाराज से भेंट
हनुमानगढ़ी के पूज्य श्री महंत राजू दास जी महाराज से भी प्रत्यक्ष भेंट हुई।
उनसे हनुमानगढ़ी की परंपरा, वैष्णव बैरागी व्यवस्था, अखाड़ों की भूमिका तथा श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े अनेक विषयों पर महत्वपूर्ण संवाद हुआ।
इस अवसर पर मैंने पूज्य राजू दास जी महाराज को अपनी पुस्तक — यात्रा: बंदूक से कलम तक — सादर भेंट की।
उनका स्नेह और मार्गदर्शन इस शोध-यात्रा के लिए हमारे लिए अत्यंत मूल्यवान है।
शोध का आधार — प्रमाण
हमारा प्रयास स्पष्ट है —
जहाँ दस्तावेज मिलेंगे, वहाँ दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएँगे।
जहाँ न्यायिक अभिलेख मिलेंगे, वहाँ अभिलेखों का अध्ययन किया जाएगा।
जहाँ ग्रंथ मिलेंगे, वहाँ उनके संदर्भ दिए जाएँगे।
और जहाँ संतों से मौखिक जानकारी प्राप्त होगी, उसे मौखिक परंपरा के रूप में ही दर्ज किया जाएगा।
क्योंकि — “आस्था हमारी शक्ति है, लेकिन इतिहास की रीढ़ प्रमाण है।”
हनुमानगढ़ी, निर्मोही अखाड़ा, दिगंबर अखाड़ा, निर्वाणी अखाड़ा, विभिन्न छावनियाँ, सरयू तट और अयोध्या के अन्य ऐतिहासिक स्थलों तक यह शोध-यात्रा आगे बढ़ रही है।
प्रत्येक स्थान पर उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री, ग्रंथ, दस्तावेज, परंपराएँ और प्रत्यक्ष जानकारी को व्यवस्थित रूप से संकलित करने का प्रयास किया जा रहा है।
यह पुस्तक किसी व्यक्ति, अखाड़े या परंपरा के विरुद्ध नहीं है।
यह अयोध्या के इतिहास को समझने और वैष्णव बैरागी परंपरा के योगदान को प्रमाणों के साथ सुरक्षित करने का एक विनम्र शोध-प्रयास है।
शोध-सेवा का संकल्प
मेरे लिए यह केवल लेखन नहीं है। यह प्रभु श्रीराम के चरणों में शोध-सेवा है।
न धन कमाना उद्देश्य है। न प्रसिद्धि प्राप्त करना उद्देश्य है। न किसी विवाद को जन्म देना उद्देश्य है।
केवल एक संकल्प —
सनातन इतिहास सुरक्षित रहे।
वैष्णव बैरागी परंपरा का इतिहास सुरक्षित रहे।
अयोध्या के संतों और अखाड़ों की ऐतिहासिक स्मृतियाँ सुरक्षित रहें।
और आने वाली पीढ़ियाँ अपने इतिहास को प्रमाणों के साथ जान सकें।

21वीं पुस्तक — शीघ्र प्रकाश्य
सनातन अयोध्या — खण्ड 2
रणभूमि से रामलला तक: वैष्णव बैरागी अखाड़ों की संघर्ष-गाथा
लेखक:
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना | इतिहासकार | शोधकर्ता | लेखक
सह-शोधयात्री:
मास्टर जगबीर वैष्णव जी

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श्री महंत धर्मदास जी महाराज एवं श्री महंत राजू दास जी महाराज को सादर प्रणाम एवं हृदय से धन्यवाद।
आपका स्नेह, आशीर्वाद और शोध-सहयोग इस ऐतिहासिक यात्रा की अमूल्य धरोहर है।
अयोध्या की पावन धरती से — इतिहास की खोज जारी है…

जय श्रीराम । जय सीताराम । जय श्री राधे-राधे । जय हिंद । जय भारत ।

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