गृहस्थ वैष्णव बैरागी समाज का इतिहास: करनाल गजेटियर 1892 से जनगणना तक के प्रमाण
प्रमाण संख्या–60 | कृषि, भूमि, परिवार और सरकारी अभिलेखों में ऐतिहासिक उपस्थिति
हरियाणा, दिल्ली और उत्तर भारत के ऐतिहासिक दस्तावेजों पर आधारित शोध
लेखक एवं शोधकर्ता: नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
प्रस्तावना
वैष्णव बैरागी परंपरा का इतिहास सामान्यतः मठों, मंदिरों, अखाड़ों और साधु-संतों की परंपराओं के संदर्भ में लिखा जाता रहा है। लेकिन इस इतिहास का एक महत्वपूर्ण पक्ष गृहस्थ वैष्णव बैरागी परिवारों का भी है। ऐसे परिवार, जिन्होंने विवाह किया, संतान उत्पन्न की, खेती-बाड़ी की, भूमि पर अधिकार रखा और पीढ़ियों तक गाँवों में सामाजिक जीवन व्यतीत किया।
क्या इन गृहस्थ परिवारों का उल्लेख पुराने सरकारी दस्तावेजों में मिलता है? क्या ऐतिहासिक गजेटियर और जनगणना रिपोर्टें उनकी उपस्थिति की पुष्टि करती हैं? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए इस शोध में उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रमुख दस्तावेजों का अध्ययन किया गया है।
1. करनाल जिला गजेटियर 1892: गृहस्थ बैरागियों का स्पष्ट प्रमाण
मूल दस्तावेज: Gazetteer of the Karnal District, 1892
अध्याय: Chapter III – The People
प्रविष्टि: Bairagia
मुद्रित पृष्ठ: 123
करनाल गजेटियर में निमावत बैरागियों का गोली, वैसरी और हरसिंहपुर; रामानंदी बैरागियों का सीतामाई और भंडारी; तथा राधाबल्लभी बैरागियों का बराना और मतनौली गाँवों में उल्लेख मिलता है।
दस्तावेज में इन बैरागियों के बारे में लिखा है:
“...own a good deal of land.”
अर्थात उनके पास पर्याप्त भूमि थी।
इसी पृष्ठ पर आगे बताया गया है कि मठों में रहने वाले साधुओं की संपत्ति उनके शिष्यों के पास जाती थी, जबकि अनेक बैरागियों ने विवाह करके गृहस्थ जीवन अपनाया था। उनकी संतानों और वंशजों का भी उल्लेख किया गया है। गृहस्थों के लिए Ghristi और संतान के लिए bindi children शब्दों का प्रयोग मिलता है।
यह विवरण इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष प्रमाण है। इससे स्पष्ट होता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में करनाल क्षेत्र में ऐसे बैरागी परिवार मौजूद थे, जो विवाह करते थे, संतान उत्पन्न करते थे और कृषि तथा भूमि से जुड़े थे।
मूल दस्तावेज:
https://www.nidanaheights.com/images/Library/books/karnal-gazeetter-1892.pdf
2. डीग गाँव, कैथल: वर्ष 1911 में गृहस्थ बैरागियों का उल्लेख
मूल दस्तावेज: H. A. Rose, A Glossary of the Tribes and Castes of the Punjab and North-West Frontier Province, Volume II, 1911।
H. A. Rose की इस ऐतिहासिक पुस्तक में Bairagi प्रविष्टि के अंतर्गत कैथल क्षेत्र के डीग (Dig/Deeg) गाँव के बैरागियों का उल्लेख मिलता है। संबंधित विवरण पृष्ठ 36 से 37 के आसपास है।
इसमें डीग के बैरागियों को कृषि और भूमि से जुड़े गृहस्थ वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके लिए purely secular शब्दावली का प्रयोग भी मिलता है। यह विवरण बताता है कि बैरागी नाम से पहचाने जाने वाले सभी लोग मठों में रहने वाले साधु नहीं थे; कुछ परिवार सामान्य गृहस्थ जीवन और कृषि से जुड़े थे।
मूल पुस्तक:
https://ignca.gov.in/Asi_data/13438.pdf
इस विषय पर विस्तृत अध्ययन प्रमाण संख्या–47 में भी प्रकाशित है:
https://www.nareshswaminimbark.in/blogs/pramaan-47-deeg-kaithal-bairagi-1911
3. वर्ष 2015 का न्यायालयीन अभिलेख
मामला: Deepika Rani and Another v. State of Haryana and Others
मामला संख्या: CRM-M-20365 of 2015 (O&M)
निर्णय: 24 जून 2015
न्यायालय: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय।
इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से डीग गाँव, तहसील पुंडरी, जिला कैथल के संदर्भ में Bairagi Caste का उल्लेख किया गया है।
यह अभिलेख डीग गाँव में बैरागी पहचान के आधुनिक न्यायालयीन रिकॉर्ड में दर्ज होने का प्रमाण है। हालाँकि, इसे बैरागी समाज की उत्पत्ति या संपूर्ण जातिगत इतिहास पर न्यायालय का अंतिम निर्णय नहीं समझना चाहिए।
न्यायालयीन अभिलेख:
https://indiankanoon.org/doc/161549519/
4. वर्ष 1872 का बंगाल विवरण और वैष्णव-बैरागी शब्द का प्रयोग
A Statistical Account of Bengal, Volume I में 24 परगना क्षेत्र के वैष्णवों का विवरण मिलता है। इसमें ऐसे वैष्णवों का उल्लेख है जो व्यापार करते थे और पत्नी तथा परिवार के साथ गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थे। दूसरी ओर कुछ वर्ग संन्यासी और धार्मिक भिक्षु के रूप में वर्णित हैं।
इस पुस्तक में W. H. Verner की वर्ष 1872 की जनगणना रिपोर्ट, पृष्ठ 189 का यह कथन उद्धृत है:
“When used to designate a caste, the words Vaishnav and Bairagi have come to have the same meaning.”
यह कथन बंगाल के विशिष्ट सामाजिक संदर्भ में वैष्णव और बैरागी शब्दों के जातिगत प्रयोग को दर्शाता है। इसे पूरे भारत के सभी वैष्णव समुदायों पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।
मूल स्रोत:
https://en.wikisource.org/wiki/Page:A_Statistical_Account_of_Bengal_Vol_1_GoogleBooksID_9WEOAAAAQAAJ.pdf/80
5. वर्ष 1891 की पंजाब जनगणना
E. D. Maclagan की Census of India, 1891: The Punjab and its Feudatories, Volume XIX, Part I, प्रकाशित 1892, में वैष्णवों से संबंधित चर्चा पृष्ठ 118 पर सूचीबद्ध है।
यह रिपोर्ट पंजाब क्षेत्र की वैष्णव धार्मिक परंपराओं और उनके प्रशासनिक वर्गीकरण के अध्ययन के लिए उपयोगी प्राथमिक स्रोत है। धार्मिक संप्रदाय और सामाजिक जातिगत पहचान के अंतर को ध्यान में रखकर इसका अध्ययन किया जाना चाहिए।
मूल पुस्तक:
https://books.google.com/books/about/Census_of_India_1891.html?id=Jg3beLL34YkC
6. वर्ष 2001 और 2011 की सरकारी जनगणना
भारत सरकार की C-01 Annexure तालिकाओं में Bairagi और Baishnav/Vaishnav अलग-अलग प्रविष्टियों के रूप में दर्ज हैं। उपलब्ध तालिकाओं के अनुसार:
क्षेत्र
2001 बैरागी
2001 वैष्णव
2011 बैरागी
2011 वैष्णव
भारत
557
36,655
496
11,173
हरियाणा
42
364
2
12
दिल्ली
अलग प्रविष्टि में संख्या दर्ज नहीं
32
1
10
ये आँकड़े धार्मिक संप्रदायों की जनगणना तालिका से संबंधित हैं, न कि पूरे बैरागी समाज की कुल जातिगत जनसंख्या से। इसलिए दोनों प्रविष्टियों को जोड़कर समुदाय की कुल आबादी घोषित करना उचित नहीं होगा।
सरकारी स्रोत:
https://censusindia.mha.gov.in/nada/index.php/catalog/21527
https://censusindia.mha.gov.in/nada/index.php/catalog/21533
https://censusindia.mha.gov.in/nada/index.php/catalog/11397
(क्रमशः: जनगणना 2001, हरियाणा 2001 तथा जनगणना 2011 की सूची।)
7. हिसार, दिल्ली और अन्य क्षेत्रों के ऐतिहासिक अभिलेख
इस शोध में हिसार, दिल्ली और रोहतक के पुराने जिला गजेटियर तथा भूमि-बंदोबस्त रिपोर्टों को भी महत्वपूर्ण अनुसंधान स्रोत के रूप में शामिल किया गया है। इनमें Gazetteer of the Hissar District, 1892, Delhi District Gazetteer, 1883–84 तथा वर्ष 1872–79 के भूमि-बंदोबस्त संबंधी दस्तावेज उल्लेखनीय हैं।
इन अभिलेखों में भूमि व्यवस्था, कृषि, राजस्व और गाँवों की सामाजिक संरचना के अध्ययन की सामग्री उपलब्ध है। किसी विशेष बैरागी परिवार के संबंध में निष्कर्ष निकालने के लिए संबंधित मूल पृष्ठ की पुष्टि आवश्यक है। इसलिए इन्हें आगे के अभिलेखीय अनुसंधान का आधार माना गया है।
8. ग्राम रामनगर: 422 वर्षों का अनसुना इतिहास
ग्राम रामनगर, गन्नौर, जिला सोनीपत, हरियाणा के इतिहास पर मेरी प्रकाशित पुस्तक “रामनगर : 422 वर्षों का अनसुना इतिहास” (English: Ramnagar: 422 Years of Untold History) इस शोध का महत्वपूर्ण स्थानीय संदर्भ है।
इस पुस्तक में रामनगर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, पुराने गृहस्थ वैष्णव बैरागी परिवारों, कृषि-भूमि, पारिवारिक परंपराओं, घमंडी गोत्र और निम्बार्क संप्रदाय से संबंधित दस्तावेजी सामग्री का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
करनाल गजेटियर और Rose की पुस्तक जहाँ अन्य क्षेत्रों में गृहस्थ बैरागियों की ऐतिहासिक उपस्थिति बताती हैं, वहीं रामनगर की पुस्तक स्थानीय परिवारों और उनके इतिहास का स्वतंत्र अध्ययन प्रस्तुत करती है।
निष्कर्ष
उपलब्ध दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि वैष्णव बैरागी परंपरा का इतिहास केवल मठों, अखाड़ों और संन्यासी जीवन तक सीमित नहीं है। इसमें गृहस्थ परिवारों, विवाह, वंश, कृषि, भूमि-अधिकार और ग्रामीण सामाजिक जीवन का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
वर्ष 1892 का करनाल गजेटियर गृहस्थ और भूमिधारी बैरागियों का स्पष्ट प्रमाण देता है। वर्ष 1911 की Rose की पुस्तक कैथल के डीग गाँव के बैरागियों का उल्लेख करती है। वर्ष 1872 के बंगाल संबंधी विवरण में गृहस्थ वैष्णवों और बैरागी शब्द के सामाजिक प्रयोग का संदर्भ मिलता है। जनगणना के अभिलेख इस विषय के प्रशासनिक अध्ययन का आधार प्रदान करते हैं।
इन स्रोतों को साथ रखकर देखने से गृहस्थ वैष्णव बैरागी समाज के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। आगे का शोध भी पुराने गजेटियरों, भूमि-अभिलेखों, वंशावलियों, दानपत्रों और मंदिर-मठ के मूल दस्तावेजों के आधार पर जारी रहना चाहिए।
हमारा शोध-सिद्धांत है:
“दस्तावेज पहले बोलेंगे, उसके बाद हम लिखेंगे। झूठ को कभी सच नहीं बनाएँगे।”
लेखक एवं शोधकर्ता:
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना
लेखक | शोधकर्ता | इतिहासकार
जन्मस्थान: ग्राम रामनगर, गन्नौर, सोनीपत, हरियाणा
वेबसाइट: https://www.nareshswaminimbark.in
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