वह धाम जिसके सामने मुगल सम्राट जहाँगीर को घुटने टेकने पड़े —
पाण्डोरी धाम का अनसुना इतिहास
३१ मई, २०२६
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा
॥ श्री राघवाय नमः ॥
फोटो १ — यहाँ लगाएँ
पाण्डोरी धाम का मुख्य द्वार अथवा भवन का बाहरी दृश्य
(२००५ की शोध-यात्रा का फोटो)
ठाकुरद्वारा भगवान नारायणजी, पाण्डोरी धाम, गुरदासपुर, पंजाब — लेखक की शोध-यात्रा, २००५
भारत की सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा अनन्त और अपरिमेय है। जब-जब इस परंपरा के ५२ द्वारों की चर्चा होती है, तब-तब पंजाब के गुरदासपुर जनपद में स्थित पाण्डोरी धाम का नाम अनिवार्य रूप से सामने आता है। यह केवल एक मन्दिर नहीं — यह एक जीवन्त इतिहास है, एक अखण्ड परंपरा है और रामानन्दी सम्प्रदाय की उस अदम्य शक्ति का प्रतीक है जिसने मुगलों की चुनौती भी स्वीकार की और सिख साम्राज्य का सम्मान भी अर्जित किया।
सन् १४९३ में स्थापित यह धाम रामानन्दी सम्प्रदाय का वह केन्द्र है जिसके सामने मुगल सम्राट जहाँगीर नतमस्तक हुआ, महाराजा रणजीत सिंह ने शीश नवाया और पहाड़ी राजपूत राज्यों ने अपनी आस्था समर्पित की।
प्रथम दर्शन — एक सैनिक की प्रारम्भिक प्रेरणा (१९८५)
वर्ष १९८५ में जब मेरी पोस्टिंग तिब्बड़ी छावनी, गुरदासपुर में थी, तब पहली बार इस धाम के भव्य द्वार पर माथा टेकने का सौभाग्य मिला। उस समय यह नहीं जानता था कि यही क्षण भविष्य में एक इतिहासकार के रूप में मेरी शोध-यात्रा का बीज बनेगा। फौज की वर्दी में उस द्वारे पर खड़े होना — वह अनुभव आज भी हृदय में उतना ही ताज़ा है।
द्वितीय शोध-यात्रा — धर्मपत्नी निर्मला वैष्णव जी के साथ (२००५)
शोध-यात्रा का विवरण
प्रस्थान स्थान : ग्राम रामनगर, गन्नौर, सोनीपत, हरियाणा
वाहन : मारुति वैगन-आर
सहयात्री : श्रीमती निर्मला वैष्णव जी (धर्मपत्नी)
कुल दूरी — रामनगर, गन्नौर (सोनीपत) से पाण्डोरी धाम : लगभग ४२० किलोमीटर
सेवानिवृत्ति के पश्चात् जब शोध-कार्य प्रारम्भ हुआ तो पाण्डोरी धाम को पुनः देखने की इच्छा बलवती हो उठी। इस बार यात्रा केवल दर्शन के लिए नहीं, अपितु एक इतिहासकार की दृष्टि से इस धाम के गौरव को लिपिबद्ध करने के संकल्प के साथ थी। इस सम्पूर्ण शोध-यात्रा में मेरी धर्मपत्नी श्रीमती निर्मला वैष्णव जी का सहयोग और साहचर्य अमूल्य रहा। उनकी वैष्णव निष्ठा और धार्मिक जिज्ञासा ने इस कार्य को एक नई ऊर्जा प्रदान की।
फोटो २ — यहाँ लगाएँ
धाम परिसर में आपका एवं श्रीमती निर्मला वैष्णव जी का व्यक्तिगत चित्र
अथवा धाम के भित्ति-चित्रों का दृश्य
लेखक श्री नरेश दास वैष्णव निम्बार्क एवं श्रीमती निर्मला वैष्णव जी — पाण्डोरी धाम, शोध-यात्रा २००५
धाम की स्थापना एवं रामानन्दी परंपरा
पाण्डोरी धाम के प्रणेता श्री भगवानजी थे, जिनका जन्म सन् १४४९ में गुरदासपुर के काहनुवाँ नगर में एक डोगरा खाजुरिया ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अपनी युवावस्था में उन्होंने राजस्थान के गलता धाम की तीर्थ यात्रा की जहाँ उनका सम्पर्क रामानन्दी सन्त श्री कृष्णदास पयहारी से हुआ। इस भेंट ने भगवानजी के जीवन की दिशा बदल दी और वे पंजाब की धरती पर भक्ति का दीप जलाने का संकल्प लेकर लौटे।
जहाँगीर की परीक्षा और सन्त नारायणजी की विजय
पाण्डोरी धाम के इतिहास का सबसे नाटकीय प्रसंग द्वितीय महन्त श्री नारायणजी से सम्बन्धित है। मुगल सम्राट जहाँगीर ने उनकी आध्यात्मिक शक्ति की परीक्षा लेने हेतु उन्हें विष दिया। परन्तु सन्त-बल के प्रताप से श्री नारायणजी विष पीकर भी जीवित रहे — अचल, अविचल और प्रसन्नमुख। यह दृश्य देखकर जहाँगीर लज्जित हो गया और उसे इस धाम की दिव्य सत्ता स्वीकार करनी पड़ी।
धाम की दीवारों पर अंकित डोगरा शैली के भित्ति-चित्र आज भी इस ऐतिहासिक प्रसंग की मूक किन्तु सशक्त गवाही देते हैं।
महाराजा रणजीत सिंह और पहाड़ी राजपूत राज्यों की श्रद्धा
पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह स्वयं इस धाम में यात्रा करते थे। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार यह धाम सिख-काल में पहले से कहीं अधिक समृद्ध हो गया था। पहाड़ी राजपूत राज्य — नूरपुर, जम्मू, मंकोट, गुलेर, बसोहली, चम्बा, बन्द्राल्टा और जसरोटा — सभी इस धाम के परम भक्त रहे। उनके दरबार में पाण्डोरी के महन्त का वही स्थान था जो किसी राज-पुरोहित का होता है।
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पन्द्रह पीढ़ियों की महन्त परंपरा
किसी भी धार्मिक संस्था की निरन्तरता उसकी गुरु-शिष्य परंपरा में होती है। पाण्डोरी धाम की यह परंपरा सन् १४९३ से आज तक अटूट रही है —
क्र. महन्त का नाम कार्यकाल
१ श्री भगवानजी (संस्थापक) १४९३ – १६२२
२ श्री नारायणजी १६२१ – १६५९
३ श्री आनन्दघन १६५९ – १६७६
४ श्री हरि राम १६७६ – १७०८
५ श्री सुखनिधान १७०८ – १७२७
६ श्री राम दास १७२७ – १७६१
७ श्री राम कृष्ण दास १७६१ – १७७८
८ श्री केशव दास १७७८ – १८०७
९ श्री नरोत्तम दास १८०७ – १८४३
१० श्री गंगा दास १८४३ – १८६१
११ श्री राधिका दास १८६१ – १८८७
१२ श्री ब्रह्म दास १८८७ – १९०८
१३ श्री राम दास (पंजाब उप-मुख्यमन्त्री, १९६७) १९०८ – १९८०
१४ श्री गोबिन्द दास १९८० – २००४
१५ श्री रघुबीर दास २००४ – अद्यतन
अखिल भारतीय विस्तार — ३९ शाखा-मठ
इस एक धाम से निकलीं ३९ मठ-शाखाएँ भारत के कोने-कोने में फैली हैं। उत्तर में जम्मू से दक्षिण में चेन्नापट्टन (चेन्नई) तक, पश्चिम में गिरनार (गुजरात) से पूर्व में अयोध्या और काशी तक — यह विस्तार बिना किसी आधुनिक संचार-साधन के, केवल गुरु-शिष्य परंपरा और भक्ति की शक्ति से सम्भव हुआ। होशियारपुर में ७, अयोध्या में ५, अम्बाला में २ और काँगड़ा में २ मठ प्रमुख हैं।
यह परंपरा हमारी सांस्कृतिक रीढ़ है। इसे जानें, समझें और आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाएँ — क्योंकि जो अपनी जड़ों को नहीं पहचानता, वह वृक्ष नहीं रह सकता।
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नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं इतिहासकार
सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा के शोधकर्ता
ग्राम रामनगर, गन्नौर, सोनीपत (हरियाणा)
पूरी जानकारी के लिए वेबसाइट पर जाएँ
www.nareshswaminimbark.in
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