दिल्ली का भूला हुआ वैष्णव बैरागी राजवंश

भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे अध्याय हैं जो समय, राजनीतिक परिवर्तनों और वैचारिक संघर्षों के कारण धीरे-धीरे विस्मृत होते चले गए। वैष्णव बैरागी परम्परा का इतिहास भी उन्हीं में से एक है। सामान्यतः बैरागियों को केवल साधु-संत परम्परा से जोड़ा जाता है, किन्तु प्राचीन ग्रन्थों, वंशावलियों और उन्नीसवीं शताब्दी के दुर्लभ प्रकाशनों के अध्ययन से एक अलग चित्र उभरता है। कुछ ऐतिहासिक स्रोत संकेत करते हैं कि इन्द्रप्रस्थ (वर्तमान दिल्ली) में एक समय वैष्णव बैरागी राजवंश का प्रभाव था। विशेष रूप से “हरिप्रेम बैरागी” नाम का उल्लेख इस विषय को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बना देता है। यह लेख उपलब्ध स्रोतों के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित एक शोधपरक प्रस्तुति है।

सनातन वैष्णव बैरागी 6 min read


दिल्ली का भूला हुआ वैष्णव बैरागी राजवंश

— नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं इतिहासकार
www.nareshswaminimbark.in

भूमिका

भारतीय इतिहास में ऐसे अनगिनत तथ्य हैं जो कालकवलित हो गये, जिन्हें न तो ब्रिटिश इतिहासकारों ने स्थान दिया और न ही परवर्ती भारतीय पाठ्यक्रमों ने। ऐसा ही एक तथ्य है — इन्द्रप्रस्थ अर्थात् आज की दिल्ली के सिंहासन पर एक वैष्णव बैरागी राजवंश का शासन। यह कोई कपोल-कल्पित आख्यान नहीं, अपितु तीन स्वतन्त्र ऐतिहासिक स्रोतों द्वारा प्रमाणित तथ्य है।

यह लेख उसी भूले हुए अध्याय को प्रकाश में लाने का एक विनम्र प्रयास है।

इन्द्रप्रस्थ — पाण्डवों की राजधानी से दिल्ली तक

महाभारत के अनुसार इन्द्रप्रस्थ की स्थापना युधिष्ठिर ने की थी। यह नगर यमुना के तट पर स्थित था और इसकी पहचान आज के पुराना किला क्षेत्र, दिल्ली से की जाती है। महाभारत के पश्चात् इस नगर पर १२४ पीढ़ियों के भारतीय राजाओं ने शासन किया। इस सुदीर्घ शासन-श्रृंखला में एक ऐसा क्षण आया जो सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा के लिए अत्यन्त गौरव का विषय है।

राज्यारोहण का असाधारण प्रसंग

राजा गोविन्दचन्द्र इन्द्रप्रस्थ के शासक थे। उनकी पत्नी रानी पद्मावती निःसन्तान थीं। गोविन्दचन्द्र की मृत्यु के पश्चात् राजवंश उत्तराधिकारी-विहीन हो गया। ऐसे संकटकाल में राज्य के मुत्सद्दियों — मन्त्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों — ने मिलकर एक ऐतिहासिक निर्णय लिया।

उन्होंने हरिप्रेम वैष्णव बैरागी को इन्द्रप्रस्थ के सिंहासन पर आसीन किया।

यह घटना कई दृष्टियों से अभूतपूर्व है। प्रथम — एक वैराग्य-पथ के साधु को राजसत्ता सौंपना। द्वितीय — यह विश्वास कि जो व्यक्ति संसार के प्रति निर्लोभ है, वही सर्वोत्तम राजा हो सकता है। तृतीय — यह प्रमाण कि उस काल में वैष्णव बैरागी परम्परा की सामाजिक प्रतिष्ठा इतनी उच्च थी कि राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए उसे उपयुक्त माना गया।

वंशावली — चार पीढ़ियाँ, पचास वर्ष का शासन

हरिप्रेम वैष्णव बैरागी के वंश की चार पीढ़ियों ने इन्द्रप्रस्थ पर लगभग पचास वर्षों तक शासन किया।

१. हरिप्रेम वैष्णव बैरागी — ७ वर्ष ५ मास १६ दिन — वंश-संस्थापक
२. गोविन्दप्रेम — २० वर्ष २ मास ५ दिन — दीर्घतम शासनकाल
३. गोपालप्रेम — १५ वर्ष ७ मास २५ दिन
४. महाबाहु — ६ वर्ष ५ मास २६ दिन — वैराग्य-गमन

नाम-परम्परा का महत्त्व

इस वंश की नाम-परम्परा अत्यन्त विचारणीय है। हरिप्रेम, गोविन्दप्रेम, गोपालप्रेम — इन तीनों नामों में हरि, गोविन्द और गोपाल क्रमशः भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के दिव्य नाम हैं। इनके साथ प्रेम प्रत्यय जुड़ा है जो वैष्णव भक्ति-परम्परा की आत्मा है। निम्बार्क सम्प्रदाय में राधा-कृष्ण के प्रति प्रेम-भक्ति को ही मोक्ष का मार्ग माना गया है। इन नामों में वही भाव-परम्परा प्रतिबिम्बित होती है।

महाबाहु का वैराग्य-गमन

इस वंश का अन्त भी उतना ही प्रेरणाप्रद है जितना आरम्भ। चतुर्थ पीढ़ी के राजा महाबाहु ने राज्य त्याग कर वन में तपस्या का मार्ग चुना। यह वैष्णव परम्परा की राजर्षि-भावना का जीवन्त उदाहरण है — जैसे प्राचीन काल में राजा जनक, राजा भरत और अनेक राजर्षि राज्य का कर्तव्य निभाते हुए अन्तिम समय में संन्यास को श्रेष्ठ मानते थे।

महाबाहु के वनगमन का समाचार सुनते ही बंगाल के राजा आधीसेन ने इन्द्रप्रस्थ पर आक्रमण कर दिया और राज्य पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार वैष्णव बैरागी वंश का शासन समाप्त हुआ।

तीन स्रोत, एक सत्य — और एक महत्त्वपूर्ण अन्तर

इस वंश का उल्लेख तीन स्वतन्त्र स्रोतों में मिलता है। परन्तु इनमें एक ऐसा अन्तर है जो स्वयं एक ऐतिहासिक साक्ष्य है।

प्राचीन ग्रन्थ एवं नाथद्वारा पत्रिका (१८८२) में वंश का नाम भार्यराजा और संस्थापक का नाम हरिप्रेम बैरागी स्पष्ट रूप से अंकित है।

सत्यार्थ प्रकाश (महर्षि दयानन्द सरस्वती, १८८२) में वंश का नाम आर्यराजा और संस्थापक का नाम केवल हरिप्रेम लिखा है — बैरागी शब्द जानबूझकर हटा दिया गया।

यह एक महत्त्वपूर्ण सम्पादकीय परिवर्तन है। सत्यार्थ प्रकाश के एकादश समुल्लास में महर्षि दयानन्द ने वैष्णव मत की आलोचना की है। अतः उन्होंने इतिहास को अपनी विचारधारा के अनुकूल प्रस्तुत करने के लिए बैरागी शब्द को हटाया। यह तथ्य स्वयं सिद्ध करता है कि मूल स्रोतों में यह वंश स्पष्टतः वैष्णव बैरागी परम्परा का था।

नाथद्वारा पत्रिका — दुर्लभ मूल स्रोत

इस वंशावली का सर्वप्रमुख मूल स्रोत राजस्थान के नाथद्वारा से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका हरिश्चन्द्र चन्द्रिका एवं मोहन चन्द्रिका है। सन् १८७२ में इस पत्रिका के प्रकाशकों को एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ प्राप्त हुआ। इस ग्रन्थ में युधिष्ठिर से लेकर विक्रमादित्य तक के इन्द्रप्रस्थ के समस्त राजाओं की वर्ष, मास और दिन सहित विस्तृत वंशावली अंकित थी।

पत्रिका के किरण १९ एवं किरण २०, सन् १८८२ में इस सम्पूर्ण वंशावली को प्रकाशित किया गया। यह ग्रन्थ सौभाग्यवश ब्रिटिश शासन के हाथों में नहीं पड़ा — अन्यथा यह भी उन अनगिनत भारतीय इतिहास-ग्रन्थों की भाँति नष्ट कर दिया जाता जिन्हें औपनिवेशिक सत्ता ने जानबूझकर विनष्ट किया।

नाथद्वारा का श्रीनाथजी मन्दिर स्वयं वैष्णव परम्परा का महान केन्द्र है। यहाँ से इस वंशावली का प्रकाशन इस बात का भी प्रमाण है कि वैष्णव परम्परा ने अपने इतिहास को सुरक्षित रखने का सचेत प्रयास किया।

वैष्णव बैरागी परम्परा — पहले वैष्णव, फिर बैरागी

यहाँ एक आवश्यक ऐतिहासिक स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना उचित है। वैष्णव बैरागी का अर्थ है — जो पहले वैष्णव है, भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का भक्त है और उसी भक्ति के फलस्वरूप संसार से वैराग्य को प्राप्त हुआ। वैराग्य यहाँ साध्य नहीं, साधन है। भगवत्-प्रेम की परिपक्वता ही वैराग्य के रूप में प्रकट होती है।

इसीलिए हरिप्रेम, गोविन्दप्रेम, गोपालप्रेम — इन नामों में प्रेम शब्द आगे है। भक्ति प्रधान है, वैराग्य उसका स्वाभाविक परिणाम। यही सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा का मूल भाव है।

इन्द्रप्रस्थ का सम्पूर्ण कालखण्ड

महाभारत से लेकर सन् ११९३ ई. में मुहम्मद गौरी के आक्रमण तक इन्द्रप्रस्थ पर १२४ पीढ़ियों के भारतीय राजाओं ने ४,१५७ वर्ष, ९ मास और १४ दिन शासन किया। इस विशाल कालखण्ड में हरिप्रेम वैष्णव बैरागी वंश का शासन एक अनन्य और गौरवशाली अध्याय है।

शोध का महत्त्व

यह शोध सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा के लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह सिद्ध करता है कि यह परम्परा केवल मन्दिरों और आश्रमों तक सीमित नहीं थी। इसके अनुयायी राज्य का नेतृत्व करने में भी सक्षम थे और समाज में उनकी प्रतिष्ठा इतनी थी कि संकटकाल में उन्हें राजसत्ता सौंपी गई।

उपसंहार

इन्द्रप्रस्थ के सिंहासन पर हरिप्रेम वैष्णव बैरागी का राज्यारोहण भारतीय इतिहास में सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा की राजनीतिक प्रतिष्ठा का एकमात्र ज्ञात और प्रमाणित उदाहरण है। तीन स्वतन्त्र स्रोतों द्वारा पुष्टि, सत्यार्थ प्रकाश में बैरागी शब्द का सम्पादन और नाथद्वारा पत्रिका में मूल पाठ का संरक्षण — ये तीनों मिलकर इस तथ्य को अकाट्य बनाते हैं।

यह केवल एक वंश का इतिहास नहीं — यह उस परम्परा की विजय का प्रमाण है जो त्याग को सबसे बड़ी योग्यता मानती है।

शोधपरक इतिहास लेख
दिल्ली का भूला हुआ वैष्णव बैरागी राजवंश
नाथद्वारा पत्रिका, प्राचीन वंशावलियों और सत्यार्थ प्रकाश के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित एक शोधपरक विश्लेषण

नरेश दास वैष्णव निम्बार्क | सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं इतिहासकार | www.nareshswaminimbark.in

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