उस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने माता कुन्ती से कहा — "बुआ, आज जो चाहो माँग लो।" और जो माँगा गया — वह सुनकर देवता भी स्तब्ध रह गए...

महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण ने माता कुन्ती से कहा — "बुआ, आज जो चाहो माँग लो।" संसार की हर माँ सुख माँगती है। पुत्रों की दीर्घायु माँगती है। राज्य और वैभव माँगती है। किन्तु माता कुन्ती ने माँगा — दुःख। क्योंकि उन्हें पता था — सुख में प्रभु भूल जाते हैं, दुःख में प्रभु याद आते हैं। विपदः सन्तु ताः शश्वत् तत्र तत्र जगद्गुरो। भवतो दर्शनं यत्स्याद् अपुनर्भवदर्शनम्॥ — श्रीमद्भागवत १.८.२५ यही है सनातन भक्ति का सर्वोच्च रहस्य।

वैष्णव बैरागी परंपरा2 min read

www.nareshswaminimbark.in
कुन्ती की अनुपम भक्ति
वह माँगना जो कोई न माँगे
लेखक: नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
श्रेणी: भागवत कथा प्रसंग | उपश्रेणी: कुन्ती स्तुति

उस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने माता कुन्ती से कहा —
“बुआ, आज जो चाहो माँग लो।”
और जो माँगा गया — वह सुनकर देवता भी स्तब्ध रह गए।

प्रसंग की पृष्ठभूमि

महाभारत के महासमर की लपटें शान्त हो चुकी थीं। हस्तिनापुर में विजय का उल्लास था, किन्तु हर ओर श्मशान की गन्ध भी थी। लाखों वीरों का रक्त कुरुक्षेत्र की धरती में समा चुका था।

ऐसे ही एक क्षण में भगवान श्रीकृष्ण द्वारका प्रस्थान करने से पूर्व माता कुन्ती के पास गए। स्नेह से बोले — बुआ! आज जो चाहो माँग लो।

कुन्ती स्तुति — मूल श्लोक

विपदः सन्तु ताः शश्वत् तत्र तत्र जगद्गुरो।
भवतो दर्शनं यत्स्याद् अपुनर्भवदर्शनम्।।

— श्रीमद्भागवतपुराण, प्रथम स्कन्ध, अध्याय १, श्लोक २३

भावार्थ

हे जगद्गुरु! मुझे बारम्बार विपदाएं मिलती रहें — क्योंकि उन्हीं संकटों में आपके दर्शन होते हैं, और आपके दर्शन ही पुनर्जन्म के बन्धन को काटते हैं।


यह प्रसंग क्यों अद्वितीय है?

संसार में करोड़ों माताएं हैं। सभी अपने पुत्रों के लिए सुख, सम्पदा और दीर्घायु माँगती हैं। किन्तु कुन्ती ने इस क्षण में समस्त सांसारिक कामनाओं को तिलांजलि देकर केवल ईश्वर-सान्निध्य माँगा।

उनका तर्क अकाट्य था —

सुख में मनुष्य ईश्वर को भूल जाता है।
दुःख में वह उसकी शरण जाता है।
अतः दुःख ही सच्चा कल्याण है — यदि उससे प्रभु-स्मरण होता हो।

यह भक्ति का निर्गुण-निराकार स्वरूप नहीं, यह सगुण प्रेमभक्ति का चरमोत्कर्ष है — जहाँ भक्त कहता है: मुझे मोक्ष नहीं चाहिए, मुझे केवल तुम्हारी याद चाहिए।


सनातन वैष्णव परंपरा और कुन्ती-स्तुति

हमारी सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा में इसी भाव को दुःखे भजन, सुखे विस्मरण के सिद्धान्त से समझाया जाता है। भगवान से सुख नहीं, सम्पर्क माँगना — यही परा-भक्ति है।

आचार्य निम्बार्क के युगल-उपासना दर्शन में भी भक्त की यही स्थिति आदर्श मानी गई है — जहाँ भक्त की समस्त इच्छाएं प्रभु में विलीन हो जाएं। कुन्ती-स्तुति इसी सिद्धान्त का जीवन्त प्रमाण है।


उपसंहार

माता कुन्ती की यह स्तुति केवल एक श्लोक नहीं —
यह जीवन जीने का दर्शन है।
यह सनातन धर्म की आत्मा है।

नमो भगवते वासुदेवाय
जय सनातन | जय वैष्णव बैरागी परंपरा | जय निम्बार्क सम्प्रदाय
www.nareshswaminimbark.in

Internal linking suggestions
Related posts
वृंदावन के बैरागी कुंभ का पूरा इतिहास: 19 वर्षों का शोध, अब पुस्तक बनकर आ रहा है
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की 23वीं पुस्तक: 19 वर्षों के शोध पर आधारित वैष्णव बैरागी कुंभ, अखाड़ों और वृंदावन परंपरा का दस्तावेज़ी अध्ययन।
राजा मोहगाँव और नांदगाँव बैरागी रियासत: गजेटियर के प्रमाणों में सच
राजा मोहगाँव और नांदगाँव बैरागी रियासत पर गजेटियर व जनगणना के प्रमाण। लेखक: नरेश दास वैष्णव निम्बार्क, मानद नायब सूबेदार व इतिहासकार।
क्या वैष्णव बैरागी केवल साधु-संत थे? गृहस्थ और अखाड़ों का इतिहास
वैष्णव बैरागी परंपरा में गृहस्थ, गुरु-शिष्य, मठ और अखाड़ों की क्या भूमिका रही? Oxford और कुल्लू पर हुए शोध के आधार पर तथ्यों की पड़ताल।