बंदूक से कलम तक का सफर: प्रतिष्ठित 'वैष्णव सेवक' पत्रिका में छपी लेखक नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की गौरवगाथा
दिनांक: 29 अप्रैल, 2026
स्थान: रामनगर, सोनीपत (हरियाणा)
भारतीय सेना में 24 वर्षों तक राष्ट्र की सेवा करने वाले सैन्य दिग्गज नरेश दास वैष्णव निम्बार्क (सेवानिवृत्त नायब सूबेदार) के जीवन का एक नया और प्रेरणादायक अध्याय सामने आया है। उदयपुर, राजस्थान से दशकों से प्रकाशित होने वाली और RNI द्वारा पंजीकृत सुप्रसिद्ध पत्रिका 'वैष्णव सेवक' ने अपने अप्रैल 2026 अंक में उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और शोध कार्यों को विशेष स्थान दिया है।
राष्ट्र सेवा से धर्म सेवा तक का अटूट संकल्प
पत्रिका के पेज नंबर 8 पर प्रकाशित इस आलेख में नरेश दास जी के 'अनुशासन से अभिव्यक्ति' तक के सफर को रेखांकित किया गया है। उनके जीवन की प्रमुख उपलब्धियां जो इस प्रकाशन का मुख्य आधार बनीं:
सैन्य अनुशासन: भारतीय सेना के अंग के रूप में कारगिल जैसे महत्वपूर्ण अभियानों में सहभागिता और वर्ष 2000 में सिएरा लियोन (अफ्रीका) में संयुक्त राष्ट्र (UN) शांति मिशन के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का गौरव बढ़ाना।
ऐतिहासिक शोध: पिछले 18 वर्षों से स्वतंत्र शोधकर्ता के रूप में 'सनातन वैष्णव बैरागी' परंपरा और 'निम्बार्क संप्रदाय' के लुप्त होते इतिहास को संकलित करने का निरंतर प्रयास।
साहित्यिक योगदान: 'महंत बने महाराजा' और 'निम्बार्क संप्रदाय: सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा' जैसी शोधपरक पुस्तकों के माध्यम से समाज को अपनी जड़ों से जोड़ना।
सामाजिक जागरूकता: सड़क सुरक्षा (Road Safety) के क्षेत्र में चीफ इंस्ट्रक्टर के रूप में हजारों नागरिकों को प्रशिक्षित कर सड़क दुर्घटनाओं को कम करने का मिशन।
संपादक श्री रामदास बैरागी जी का विशेष आभार
'वैष्णव सेवक' पत्रिका के अनुभवी संपादक श्री रामदास बैरागी जी द्वारा समाज के गौरव को शब्दों में पिरोना, नरेश दास जी के शोध कार्यों की प्रमाणिकता और उनके प्रति समाज के विश्वास को दर्शाता है। यह केवल एक लेख नहीं, बल्कि उन सभी योद्धाओं और संतों को श्रद्धांजलि है जिनका इतिहास इस लेखनी के माध्यम से दुनिया के सामने आ रहा है।
"मेरा शोध और मेरा लेखन मेरे उन पूर्वजों के प्रति मेरा समर्पण है, जिन्होंने सनातन धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। 'वैष्णव सेवक' में स्थान मिलना मेरे इस संकल्प को और भी मजबूती देता है।" > — नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
निष्कर्ष
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की यह यात्रा सिद्ध करती है कि एक सैनिक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता; वह केवल अपनी सेवा का माध्यम बदलता है। आज वे कलम के माध्यम से समाज की वैचारिक रक्षा कर रहे हैं।
नोट: आप इस लेख की विस्तृत जानकारी और प्रकाशित पुस्तकों के बारे में अधिक जानने के लिए हमारी वेबसाइट के 'Books' सेक्शन पर जा सकते हैं।
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