48 कोस, 400 किलोमीटर, 17 पुस्तकें — एक सैनिक का सनातन को समर्पण
एक गरीब किसान परिवार में जन्म लेने वाला बालक, जिसने अपनी मातृभूमि रामनगर, गन्नौर की मिट्टी में बाल्यकाल की कठिनाइयों को अपनी नियति समझा था, आज सनातन संस्कृति के इतिहास-लेखन में अपना 17वाँ अध्याय पूर्ण कर चुका है। यह केवल एक पुस्तक का प्रकाशन नहीं, अपितु वर्षों की तपस्या, अनुशासन और अटूट संकल्प की परिणति है।
मेरी 17वीं पुस्तक — "सनातन कुरुक्षेत्र : सृष्टि, सरस्वती और भगवान श्रीकृष्ण की अमर भूमि" — अब Notion Press USA पर प्रकाशित हो चुकी है और शीघ्र ही Paperback एवं Hardcover संस्करणों में विश्वभर के पाठकों तक पहुँचेगी। 481 पृष्ठों का यह शोधग्रंथ सैनिक अनुशासन की उसी भावना से रचा गया है, जिसने मुझे सीमाओं की रक्षा करना सिखाया था — प्रतिदिन 10 से 12 घंटे का निरंतर परिश्रम, बिना विश्राम, बिना विचलन।
इस उपलब्धि पर All India Media Association द्वारा भी समाचार प्रकाशित किया गया है: https://aimamedia.org/newsdetails.aspx?type=Share&nid=717630
सर्वप्रथम परमात्मा को नमन
इस विशाल कार्य की पूर्णता का सर्वोच्च श्रेय परमात्मा को जाता है। उन्हीं की कृपा, प्रेरणा और आशीर्वाद के बिना यह संभव नहीं था। एक सैनिक जानता है कि अनुशासन और परिश्रम मार्ग प्रशस्त करते हैं, परंतु गंतव्य तक पहुँचाने वाली शक्ति सदैव ईश्वर की कृपा ही होती है।
रामनगर, गन्नौर — जिस मिट्टी ने मुझे गढ़ा
मेरी जड़ें मेरी प्रिय मातृभूमि रामनगर, गन्नौर से जुड़ी हैं। इसी धरती के संस्कारों, इसी माटी की सादगी और परिश्रम-शीलता ने मुझमें वह अनुशासन रोपा, जो आगे चलकर सेना में और परिपक्व हुआ। जब भी मैं किसी तीर्थ-स्थल पर खड़ा होकर इतिहास की खोज करता हूँ, तो कहीं न कहीं रामनगर, गन्नौर की वही मिट्टी मेरे भीतर बल भरती है। यह पुस्तक उस मातृभूमि को भी एक विनम्र समर्पण है, जिसने एक सामान्य किसान-पुत्र को यह यात्रा तय करने योग्य बनाया।
4 अगस्त 2026 — अंग्रेज़ी संस्करण, 190 देशों तक सनातन का यशोगान
4 अगस्त 2026 को यह शोधग्रंथ अपने अंग्रेज़ी संस्करण में विश्व के सबसे बड़े मंचों पर प्रकाशित होगा, जिससे यह ज्ञान लगभग 190 देशों तक पहुँच सके और अधिकाधिक लोग सनातन संस्कृति की ओर पुनः उन्मुख हों। यह अंग्रेज़ी संस्करण पूर्णतः निःशुल्क रहेगा, क्योंकि Notion Press के Paperback एवं Hardcover संस्करणों में मुद्रण-व्यय अधिक होने के कारण उन्हें निःशुल्क रखना संभव नहीं है। परंतु अंग्रेज़ी संस्करण के माध्यम से यह सुनिश्चित रहेगा कि सनातन का यह ज्ञान बिना किसी आर्थिक बाधा के प्रत्येक जिज्ञासु तक पहुँचे।
48 कोस की शोध यात्रा — तपस्या का प्रमाण
इस ग्रंथ की नींव लगभग 400 किलोमीटर की 48 कोस कुरुक्षेत्र परिक्रमा पर टिकी है। यह मात्र भौगोलिक यात्रा नहीं थी, अपितु सांस्कृतिक तीर्थाटन था — जहाँ प्रत्येक तीर्थ, प्रत्येक कुंड, प्रत्येक स्मृति-स्थल का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया गया। सैकड़ों घंटों के अध्ययन और स्थल-दर-स्थल प्रमाणीकरण ने इस शोध को प्रामाणिकता प्रदान की।
इस पुस्तक की लगभग 95% सामग्री प्रमाणिक एवं आधिकारिक स्रोतों — वेद, उपनिषद, महाभारत, भगवद्गीता, प्रमुख पुराण, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), हरियाणा सरकार एवं कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के प्रकाशनों, तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की शोध सामग्री — पर आधारित है। शेष 5% भाग मेरी प्रत्यक्ष शोध यात्राओं और व्यक्तिगत अनुभवों का सार है।
मार्गदर्शकों एवं सहयोगियों का ऋण
इस यात्रा में कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के मानद सचिव श्री उपेंद्र सिंघल जी, श्रीकृष्ण संग्रहालय के प्रभारी श्री बलवान जी, मास्टर ओमप्रकाश बैरागी जी (डींग वाले), तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. धर्मवीर जी का मार्गदर्शन अमूल्य रहा। मास्टर जगबीर वैष्णव, तुलसी बैरागी और दिनेश स्वामी के निरंतर सहयोग के प्रति भी मैं हृदय से आभारी हूँ।
दयालपुर के जयपाल बैरागी जी ने बाणगंगा, भीष्म कुंड तथा बैरागी महंत परंपरा की महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं। सीता माई मंदिर के महासचिव श्री ईशम सिंह बैरागी जी का योगदान भी उल्लेखनीय रहा। बैरागी धर्मशाला, कुरुक्षेत्र के प्रधान श्री ज्ञान सिंह बैरागी जी एवं समस्त कार्यकारिणी ने प्रवास के दौरान आवास एवं भोजन की उत्कृष्ट व्यवस्था कर सैनिक-अनुशासन को भी स्नेह से सींचा।
48 कोस यात्रा के दौरान जिन बुजुर्गों, संतों, विद्वानों, स्थानीय नागरिकों और तीर्थ पुरोहितों ने अपनी स्मृतियाँ और जनश्रुतियाँ साझा कीं, उन सभी के प्रति मैं आजीवन कृतज्ञ रहूँगा।
परिवार — मेरी वास्तविक शक्ति
इस संपूर्ण यात्रा की सच्ची सहभागी मेरी धर्मपत्नी श्रीमती निर्मला वैष्णव रहीं। 100 से अधिक शोध यात्राओं में उन्होंने हर परिस्थिति में साथ निभाया — यह पुस्तक जितनी मेरी है, उतनी ही उनकी भी है। मेरे पोते भावेश वैष्णव और पोती दिव्यांशी वैष्णव ने बाल्यावस्था से ही इस शोध-साधना को निकट से देखा है, और मुझे विश्वास है कि यही संस्कार आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों — रामनगर, गन्नौर की माटी — से जोड़े रखेंगे।
संकल्प ही विजय है
मैं स्वयं को कोई बड़ा लेखक, इतिहासकार या नेता नहीं मानता — मैं रामनगर, गन्नौर की धरती पर जन्मा एक साधारण किसान-पुत्र और पूर्व भारतीय सैनिक हूँ, जिसने यह सीखा है कि यदि संकल्प, परिश्रम और ईश्वर-कृपा साथ हों, तो असंभव भी संभव हो जाता है। सेना में सीखा अनुशासन ही आज मेरे शोध-कार्य की रीढ़ बना हुआ है।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि "सनातन कुरुक्षेत्र : सृष्टि, सरस्वती और भगवान श्रीकृष्ण की अमर भूमि" आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर सिद्ध होगी और सनातन संस्कृति, इतिहास एवं तीर्थ-परंपरा के संरक्षण में विनम्र योगदान देगी।
आप सभी का स्नेह, आशीर्वाद और सहयोग ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है। कृपया इस पोस्ट को अधिकाधिक साझा करें, ताकि यह शोध व्यापक जनसमुदाय तक पहुँच सके।
जय श्री कृष्ण
आपका अपना
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
अंतर्राष्ट्रीय लेखक | शोधकर्ता | इतिहासकार | UN Veteran
मातृभूमि: रामनगर, गन्नौर
वेबसाइट: www.nareshswaminimbark.in
ईमेल: nareshkumarswami741964@gmail.com
व्हाट्सऐप (केवल संदेश): 9013535190
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