"जब चार वर्षीय पुत्र को आँखों के सामने मारा गया — तब भी वीर बंदा बैरागी नहीं झुके — वो गाथा जो हर भारतीय को पढ़नी चाहिए"

महायोद्धा वीर बंदा बैरागी — वह वैष्णव सन्त जिन्होंने सरहिंद फ़तह किया, किसानों को भूमि दी और 9 जून 1716 को अमानवीय यातनाओं के बीच भी धर्म नहीं छोड़ा। जानिए उनकी अमर गाथा और 7 जून 2026 बागपत शहादत दिवस आयोजन की सम्पूर्ण जानकारी।

इतिहास (History)6 min read


## जब चार वर्षीय पुत्र को आँखों के सामने मारा गया — तब भी वीर बंदा बैरागी नहीं झुके

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*कुछ बलिदान इतिहास की स्याही से लिखे जाते हैं।*
*कुछ बलिदान इतिहास के रक्त से लिखे जाते हैं।*
*महायोद्धा वीर बंदा बैरागी का बलिदान दूसरी श्रेणी में है।*

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### प्रस्तावना

भारत के इतिहास में ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं जिन्होंने धर्म, समाज और राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया। परन्तु खेद का विषय यह है कि उनमें से अनेक को इतिहास की मुख्यधारा ने वह स्थान नहीं दिया जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे।

महायोद्धा वीर बंदा बैरागी उन्हीं में से एक हैं।

एक वैष्णव बैरागी सन्त — जो धर्मरक्षक योद्धा बने। एक साधु — जो किसानों का मसीहा बना। एक त्यागी — जो भारत का प्रथम भूमि सुधारक बना। और अन्ततः — एक अमर बलिदानी, जिसे मुग़लों ने तड़पा-तड़पाकर शहीद किया, परन्तु झुका नहीं सके।

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### जन्म और प्रारम्भिक जीवन

सन् 1670 में जम्मू के रजौरी क्षेत्र में जन्मे **लक्ष्मणदास** बचपन से ही वैरागी प्रवृत्ति के थे। युवावस्था में ही उन्होंने संसार का त्याग किया और वैष्णव बैरागी सन्त के रूप में दीक्षा ली। नान्देड़ में उनका आश्रम था — जहाँ साधना, सेवा और सत्संग उनका दिनचर्या था।

परन्तु 1708 में नान्देड़ में ही उनकी भेंट **दशम गुरु श्री गुरु गोविन्द सिंह जी** से हुई। गुरु जी ने उन्हें बताया कि पंजाब में किस प्रकार निर्दोष लोगों पर अत्याचार हो रहे हैं। साहिबज़ादों की शहादत की व्यथा सुनी। और गुरु जी ने उन्हें धर्म तथा न्याय की रक्षा का आदेश दिया।

उस दिन लक्ष्मणदास ने अपना कमण्डल रखा और तलवार उठाई।

**लक्ष्मणदास बन गए — बंदा बैरागी।**

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### सरहिंद विजय — 12 मई 1710

बंदा बैरागी ने पंजाब पहुँचकर मुग़ल अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँका। किसान, शिल्पकार, व्यापारी — सभी उनके साथ आते गए। उन्होंने समाना, सढौरा और अनेक मुग़ल चौकियों को ध्वस्त किया।

और फिर आया वह ऐतिहासिक दिन — **12 मई 1710।**

बंदा बैरागी ने **सरहिंद** फ़तह किया।

वही सरहिंद — जहाँ मुग़ल सूबेदार वज़ीर खाँ ने गुरु गोविन्द सिंह जी के दो छोटे पुत्रों — **साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह** (आयु 9 वर्ष) और **साहिबज़ादा फ़तेह सिंह** (आयु 7 वर्ष) — को इस्लाम न स्वीकारने पर **जीवित दीवार में चुनवा** दिया था।

जब बंदा बैरागी की सेना सरहिंद में प्रविष्ट हुई — यह केवल सैन्य विजय नहीं थी।

**यह इतिहास का न्याय था। यह एक माँ के आँसुओं का उत्तर था।**

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### भारत के प्रथम भूमि सुधारक

सरहिंद विजय के पश्चात् बंदा बैरागी ने वह कार्य किया जो भारतीय इतिहास में अभूतपूर्व था।

उन्होंने **शोषित किसानों को भूमि का स्वामित्व** प्रदान किया।

जो भूमि पीढ़ियों से मुग़ल ज़मींदारों के अधीन थी — वह उन किसानों को सौंप दी गई जो उसे जोतते थे। यह भारत के इतिहास में **प्रथम कृषि भूमि सुधार** था — आधुनिक स्वतन्त्र भारत की भूमि सुधार नीतियों से तीन शताब्दी पूर्व।

उनके शासन में जारी सिक्कों पर उत्कीर्ण था —

*"देगो तेगो फ़तह नुसरत बेदरंग"*

अर्थात् — दान की थाली और न्याय की तलवार से सदा और सम्पूर्ण विजय।

वे केवल योद्धा नहीं थे। वे एक दूरदर्शी शासक थे जिन्होंने समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा की।

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### 9 जून 1716 — वो दिन जिसे भारत को कभी नहीं भूलना चाहिए

मुग़ल साम्राज्य बंदा बैरागी की बढ़ती शक्ति से भयभीत था। अन्ततः गुरदास नांगल में दीर्घ घेराबन्दी के पश्चात् भूख और संसाधनों की कमी से जर्जर बंदा बैरागी और उनके साथियों को बन्दी बना लिया गया।

उन्हें और उनके **740 साथियों** को पिंजरों में बन्द करके दिल्ली लाया गया। मार्ग में जनता को दिखाने के लिए उनका जुलूस निकाला गया — मुग़ल साम्राज्य चाहता था कि यह दृश्य लोगों के मन में भय उत्पन्न करे।

परन्तु जो हुआ वह इसके विपरीत था — लोग इस निर्भीक सन्त-योद्धा को देखकर नतमस्तक हो गए।

दिल्ली में प्रतिदिन उनके सौ-सौ साथियों को उनके सामने शहीद किया जाता था — ताकि उनका मनोबल टूटे। सात माह तक यह क्रम चला।

**परन्तु 740 में से एक भी नहीं झुका। एक भी नहीं टूटा। एक ने भी धर्म नहीं छोड़ा।**

**9 जून 1716** को बंदा बैरागी की बारी आई।

मुग़लों ने उनके सामने उनके **चार वर्षीय पुत्र अजय सिंह** को काट डाला।
उसका हृदय निकालकर बंदा बैरागी के मुख में ठूँसने का प्रयास किया गया।
गर्म चिमटों से उनके शरीर का मांस नोचा गया।
उनकी आँखें निकाली गईं।
अंग-अंग काटकर उन्हें तड़पाया गया।

बस एक शर्त थी — **इस्लाम स्वीकार कर लो, जीवन मिल जाएगा।**

वीर बंदा बैरागी के मुख से एक भी शब्द न निकला।

न आह।
न याचना।
न समर्पण।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार — वे अन्त तक मुस्कुराते रहे।

**740 साथी। एक सेनापति। शून्य समर्पण।**

यह सामूहिक बलिदान विश्व इतिहास में अद्वितीय है — और फिर भी स्वतन्त्र भारत की किसी पाठ्यपुस्तक में इसे उचित स्थान नहीं मिला।

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### बलिदान का सन्देश — आज भी प्रासंगिक

वीर बंदा बैरागी का जीवन हमें तीन महान सन्देश देता है।

पहला — **वैराग्य और शौर्य साथ-साथ चल सकते हैं।** एक सन्त भी आवश्यकता पड़ने पर तलवार उठा सकता है — बिना अपना धर्म और विवेक खोए।

दूसरा — **न्याय के लिए संघर्ष सर्वोच्च धर्म है।** किसानों को भूमि देना, शोषितों के लिए लड़ना — यही सच्चा वैष्णव धर्म है।

तीसरा — **बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता।** आज तीन शताब्दी पश्चात् भी उनका नाम जीवित है — और यही उनकी वास्तविक विजय है।

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### 7 जून 2026 — बागपत में ऐतिहासिक आयोजन

इस अमर बलिदान को नमन करने हेतु **वैष्णव बैरागी (चतुः सम्प्रदाय) स्वामी समाज समिति, जिला बागपत** द्वारा भव्य शहादत दिवस समारोह का आयोजन किया जा रहा है।

दिनांक : 7 जून 2026, रविवार
समय : प्रातः 10:00 बजे
स्थान : बड़ा शिव मन्दिर, पट्टी खेलदार, ग्राम लूम्ब, तहसील बड़ौत, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश

इस कार्यक्रम में निम्नलिखित आयोजन सम्पन्न होंगे —

वीर बंदा बैरागी को भव्य श्रद्धांजलि सभा, वैष्णव बैरागी समाज के प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं का सम्मान जिन्होंने 80 प्रतिशत या उससे अधिक अंक प्राप्त किए हैं, अन्तर्राष्ट्रीय लेखक एवं शोधकर्ता **नरेश दास वैष्णव निम्बार्क** की **11 ऐतिहासिक पुस्तकों का भव्य विमोचन**, वीर बंदा बैरागी के जीवन एवं बलिदान पर **नवीन ऐतिहासिक ग्रन्थ** लिखने की औपचारिक घोषणा तथा **200 पुस्तकों का निःशुल्क वितरण।**

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### लेखक परिचय

**नरेश दास वैष्णव निम्बार्क** एक गरीब किसान परिवार में जन्मे, भारतीय सेना एवं संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सेवा करने वाले सेवानिवृत्त नायब सूबेदार हैं। सेवानिवृत्ति के पश्चात् उन्होंने कलम को अपना शस्त्र बनाया और पिछले 18 वर्षों से सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा के इतिहास को जन-जन तक पहुँचाने में संलग्न हैं।

*"यह पुस्तक समाज के प्यार और आशीर्वाद से लिखी जाएगी — मैं तो केवल निमित्त मात्र हूँ।"*

**www.nareshswaminimbark.in**

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### समाज से आह्वान

*"जिस समाज को अपने महायोद्धाओं का इतिहास याद नहीं रहता, उसके बच्चों को दूसरे लोग इतिहास पढ़ाते हैं।"*

— नरेश दास वैष्णव निम्बार्क

आइए — इस बलिदान को नमन करें। इस इतिहास को जीवित रखें। इस पोस्ट को अधिक से अधिक साझा करें — ताकि वीर बंदा बैरागी का नाम घर-घर पहुँचे।

जय श्रीराम | जय वीर बंदा बैरागी | जय वैष्णव बैरागी समाज | जय हिन्द

**www.nareshswaminimbark.in**

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