वैष्णव बैरागी राजाओं की अनसुनी गाथा: इंद्रप्रस्थ से छुईखदान-राजनांदगांव तक | नरेश दास वैष्णव निम्बार्क

इंद्रप्रस्थ के बैरागी राजा, वीर बंदा बैरागी, छुईखदान और राजनांदगांव रियासत का इतिहास। शोधग्रंथ की विषय-सूची। लेखक: नरेश दास वैष्णव निम्बार्क।

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॥ जय श्री सीताराम ॥
॥ जय श्री राधे-राधे ॥
Rosary and the Throne: भक्ति, वीरता और शासन की अनसुनी विरासत
क्या वैष्णव बैरागी परंपरा का इतिहास केवल भक्ति, साधना और वैराग्य तक सीमित है?
हाथ में माला और मन में राम-नाम, यही छवि हमारे सामने आती है, जब हम बैरागी का स्मरण करते हैं। परंतु इतिहास के कुछ पन्ने बताते हैं कि इस परंपरा के अनेक संतों ने साधना के साथ राजधर्म का दायित्व भी निभाया। इंद्रप्रस्थ से छत्तीसगढ़ तक फैले राजवंश, वीर बंदा बैरागी का संघर्ष और ऐतिहासिक रियासतों के प्रसंग इस परंपरा को व्यापक दृष्टि से समझने का अवसर देते हैं।
इसी दृष्टि से प्रस्तुत है शोधग्रंथ "Rosary and the Throne: The Vaishnav Bairagi Rulers"। आवरण की पंक्तियाँ इसका सार कह देती हैं: आस्था की विरासत, सत्ता का इतिहास और भविष्य के लिए संदेश।
इंद्रप्रस्थ के बैरागी राजा
पुस्तक के आरंभिक अध्याय दिल्ली के लगभग पचास वर्षों के कालखंड पर केंद्रित हैं। इनमें हरि प्रेम बैरागी, गोविंद प्रेम बैरागी, गोपाल प्रेम बैरागी और महाबाहु बैरागी जैसे व्यक्तित्वों के माध्यम से राजसत्ता, धार्मिक परंपरा और त्याग के विषय प्रस्तुत हैं।
इन व्यक्तित्वों से जुड़े ऐतिहासिक दावों को परखने के लिए मूल दस्तावेजों, अभिलेखों और उपलब्ध स्रोतों का अध्ययन आवश्यक है। ऐसा शोध पाठक को परंपरागत विवरणों और प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर समझने में सहायता करता है।
वीर बंदा बैरागी: साधना से संघर्ष तक
पुस्तक का एक प्रमुख खंड वीर बंदा बैरागी (1670 से 1716) के जीवन पर आधारित है। लछमन देव से माधो दास बैरागी बनने की यात्रा, गुरु गोबिंद सिंह जी से भेंट, सरहिंद विजय और गुरदास नंगल की घेराबंदी, ये सब प्रसंग इसमें सम्मिलित हैं।
12 मई 1710 की सरहिंद विजय सिख इतिहास का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। 1710 से 1716 का कालखंड विजय से लेकर बलिदान तक का वह दौर है, जिसका अध्ययन उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों तथा धार्मिक-सामाजिक इतिहास को समझने की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।
छुईखदान रियासत: राजवंश, प्रशासन और आध्यात्मिक पहचान
छत्तीसगढ़ की छुईखदान रियासत इस पुस्तक का एक केंद्रीय विषय है। यहाँ बैरागी राजाओं का शासन 1750 से 1 मार्च 1948 तक रहा, और रियासत के पहले शासक महंत राजा रूप दास बैरागी थे। राजपरिवार की वंशावली, प्रशासनिक व्यवस्था और रियासत की स्थापना के साथ राजा भूधर किशोर दास बैरागी तथा महंत राजा ऋतुपर्ण किशोर दास बैरागी पर भी अध्याय हैं। लेखक की रामनगर से राजनांदगांव तक की शोध-यात्रा इस खंड को और जीवंत बनाती है।
राजनांदगांव रियासत: शासकों की विरासत
राजनांदगांव में बैरागी राजाओं का शासन 1765 से 1 मार्च 1948 तक रहा, और पहले शासक महंत प्रह्लाद दास बैरागी थे। इस खंड में महंत हरि दास बैरागी, महंत राम दास, महंत रघुवर दास और महंत हिमांचल दास बैरागी का परिचय मिलता है। साथ ही महंत मौजी राम दास बैरागी, महंत घासी दास बैरागी, महंत राजा बलराम दास बैरागी, महंत राजा सर्वेश्वर दास और राजा दिग्विजय दास से जुड़े विषय भी विषय-सूची में हैं। रियासत का प्रशासन, आर्थिक विकास, शासकीय परंपराएँ और 1948 का विलय इस यात्रा को पूर्णता देते हैं।
वैष्णव बैरागी परंपरा: दर्शन, पहचान और शोध का महत्व
पुस्तक में वैष्णव बैरागी परंपरा के दर्शन और पहचान पर भी एक अध्याय है। धार्मिक परंपराओं का इतिहास केवल आस्था तक सीमित नहीं होता। उसके अध्ययन में सामाजिक संरचना, ऐतिहासिक परिस्थितियाँ और उपलब्ध दस्तावेज भी बराबर की भूमिका निभाते हैं। ऐसे शोधग्रंथ की उपयोगिता इसी में है कि वह पाठक को विषय से परिचित कराए और आगे के अध्ययन के लिए नए प्रश्न भी खड़े करे।
इतिहास को जानिए, प्रमाणों के आधार पर समझिए
इतिहास का सम्मान केवल गौरवगान से नहीं होता। वह तथ्यों की निष्पक्ष जाँच, स्रोतों के उचित उल्लेख और प्रमाणों के ईमानदार मूल्यांकन से होता है। इसीलिए हमारा संकल्प है कि दस्तावेज पहले बोलेंगे, उसके बाद हम लिखेंगे।
पुस्तक कहाँ उपलब्ध है
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यह प्रचार सनातन धर्म और वैष्णव बैरागी परंपरा के अध्ययन-प्रसार के उद्देश्य से किया जा रहा है।
लेखक परिचय
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क सेवानिवृत्त नायब सूबेदार (भारतीय सेना), इतिहासकार, शोधकर्ता और लेखक हैं। वे वैष्णव बैरागी परंपरा, सनातन धर्म, क्षेत्रीय रियासतों, राजवंशों और ऐतिहासिक दस्तावेजों पर लेखन एवं शोध करते हैं। उनका उद्देश्य प्रमाणों और उपलब्ध स्रोतों के आधार पर इतिहास तथा धार्मिक परंपराओं का अध्ययन पाठकों तक पहुँचाना है।
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
लेखक | शोधकर्ता | इतिहासकार
जन्मस्थान: ग्राम रामनगर, गन्नौर, सोनीपत, हरियाणा
वेबसाइट: www.nareshswaminimbark.in
॥ जय श्री सीताराम ॥
॥ जय श्री राधे-राधे ॥

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