जिस चक्की पर पिसा बलिदान, उसी देहरी पर उतरी विजय — छोटेलाल वैष्णव से उषा प्रियदर्शी तक की गौरव-गाथा
इतिहास कभी मौन नहीं रहता। वह प्रतीक्षा करता है — उस क्षण की, जब उसके पन्नों में दबा हुआ त्याग, किसी नई पीढ़ी की उपलब्धि बनकर पुनः जीवंत हो उठे। ऐसा ही एक क्षण आज हरियाणा ने देखा, जब गुरुग्राम-निवासी श्रीमती उषा प्रियदर्शी जी को हरियाणा राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन नियुक्त किया गया — और यह उपलब्धि उसी परिवार की देहरी पर आकर ठहरी, जिसके पितामह ने कभी अंग्रेज़ी हुकूमत और पटौदी रियासत, दोनों मोर्चों पर एक साथ संघर्ष करते हुए जेल की चक्की पीसी थी।
नियुक्ति का सरकारी विवरण
मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी जी के नेतृत्व वाली हरियाणा सरकार ने श्रीमती उषा प्रियदर्शी जी को हरियाणा राज्य महिला आयोग का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है। उनके साथ श्रीमती मीना परमार जी को उपाध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया है। यह नियुक्ति श्रीमती रेनू भाटिया जी के त्यागपत्र के उपरांत की गई, जिन्हें एक विवादित बयान के बाद पद छोड़ना पड़ा था। राज्यपाल के आदेशानुसार यह नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू हुई है और आयोग में पाँच अन्य सदस्य भी नियुक्त किए गए हैं।
राजस्थान में जन्मीं उषा जी विगत ढाई वर्षों से भाजपा हरियाणा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष रहीं तथा ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए 25 वर्षों से संगठन की निरंतर सेवा में समर्पित हैं। पदभार ग्रहण करते हुए उन्होंने कहा कि पीड़ित महिलाओं और बेटियों को त्वरित न्याय दिलाना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता होगी, और आयोग महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा तथा अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी आवश्यक कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा।
वह परिवार, जिसकी नींव में बलिदान है
परंतु इस समाचार की गहराई केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें उस मिट्टी में हैं, जहाँ आज़ादी की कीमत खून और यातना से चुकाई गई थी।
महान स्वतंत्रता सेनानी स्व. श्री छोटेलाल जी वैष्णव — गुरुग्राम जिले की पटौदी तहसील में 4 जून 1908 को जन्मे — वे इसलिए महान थे, क्योंकि उन्होंने अकेले नहीं, एक साथ दो शक्तिशाली शत्रुओं से लोहा लिया: अंग्रेज़ी साम्राज्य और पटौदी के नवाब की सत्ता। मात्र 21 वर्ष की आयु में उन्होंने पढ़ाई त्यागकर क्रांतिकारी गतिविधियों को अपना जीवन बना लिया। 1939 में उन्होंने पटौदी रियासत को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने हेतु 'प्रजामंडल' की स्थापना की। इससे भयभीत होकर नवाब ने उन्हें रियासत में प्रवेश से प्रतिबंधित कर जेल में डाल दिया, जहाँ उन्हें प्रतिदिन 18 सेर अनाज हाथ से पिसवाया जाता — घोर यातना का प्रतीक। 1940 में नवाब ने प्रतिशोधस्वरूप उनके घर का सामान, पशुधन और जमीन-जायदाद तक जब्त कर ली।
स्वतंत्रता के पश्चात भी छोटेलाल जी ने अपनी कुर्बानियों के बदले कोई व्यक्तिगत लाभ या राजनीतिक पद स्वीकार नहीं किया — यही उनकी निस्वार्थ सेवा की सच्ची पहचान थी। उनकी इसी निष्ठा के लिए 1972 में केंद्र सरकार ने उन्हें 'ताम्रपत्र' से सम्मानित किया। 19 जून 2004 को यह महान सपूत पंचतत्व में विलीन हो गया, परंतु उसकी विरासत आज भी जीवंत है।
आज उन्हीं के पुत्र, वरिष्ठ अधिवक्ता श्री रामकुमार वैष्णव जी, तथा उनकी पौत्री — IAS अधिकारी श्रीमती प्रेरणा वैष्णव जी — अपने पूर्वज के संस्कारों को सँजोए हुए हैं। प्रतिवर्ष रामनवमी के पावन अवसर पर वे अपने पैतृक गाँव में भव्य भंडारे का आयोजन करते हैं, जो क्षेत्र की सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बन चुका है।
लेखकीय आत्मकथ्य — नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
(सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी, इतिहासकार)
अपनी पुस्तक "यात्रा: बन्दूक से कलम तक" के अध्याय 12 में मैंने महान स्वतंत्रता सेनानी स्व. श्री छोटेलाल जी वैष्णव के संघर्षमय जीवन का शोध-आधारित वर्णन किया है। यह अध्याय किसी सरसरी जानकारी का संकलन नहीं, बल्कि उस यात्रा का परिणाम है, जब मैं देश के कोने-कोने में जाकर प्रत्येक स्वतंत्रता सेनानी के परिवार से प्रत्यक्ष मिला, उनके दस्तावेज़ देखे, उनकी पीड़ा सुनी।
इसी शोध-यात्रा के फलस्वरूप मुझे इस परिवार से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 2019 में, 28 अप्रैल को, मैंने अपने गाँव रामनगर में 'वैष्णव बैरागी अलंकार समारोह' आयोजित किया था, जिसमें पूरे भारतवर्ष से नवरत्न स्वयं चुनकर आमंत्रित किए। उस समारोह में श्री रामकुमार जी को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने पर उन्होंने मुझसे कार्यक्रम का उद्देश्य पूछा — और जब मैंने उन्हें बताया कि मैं अपने समाज को यह स्मरण कराना चाहता हूँ कि हमने इस राष्ट्र को कितना कुछ दिया है, तो उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दी।
रामनवमी के इसी पावन अवसर पर, मोजाबाद में आयोजित भंडारे में, स्वयं श्री रामकुमार वैष्णव जी तथा उनकी पौत्री, IAS अधिकारी श्रीमती प्रेरणा वैष्णव जी के हाथों मेरा सम्मान हुआ — सोल, श्रीफल, तुलसी माला और पुष्प-गुच्छ से। उस क्षण मेरे मन में एक ही विचार था: मैं एक सामान्य परिवार से उठकर सेना में गया, और आज दो-दो IAS अधिकारियों तथा अधिवक्ताओं के मध्य खड़ा हूँ। पर मैं यह स्पष्ट कर दूँ — सैनिक कभी निर्धन नहीं होता। वह तो भारत की आन, बान और शान होता है, जो चौबीसों घंटे अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर, दिन-रात देश की सेवा में समर्पित रहता है। यह मेरी नहीं, उसी सैनिक-धर्म और सत्य-शोध की तपस्या की विजय है, जिसे आज देश के गणमान्य परिवारों ने सम्मान देकर गौरवान्वित किया।
मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं स्वयं उन विरले व्यक्तित्वों में से हूँ, जो किसी के कहने मात्र से कुछ नहीं लिखता या बोलता — जो मेरे हृदय में आता है, वही करता हूँ। इस आयु में न मुझे प्रसिद्धि की इच्छा है, न मान-सम्मान की, न धन कमाने की।
एक परंपरा की पहचान
यह केवल एक परिवार की गाथा नहीं — यह उस सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा का प्रतिबिंब है, जिसने राष्ट्र-निर्माण में सदैव अग्रणी भूमिका निभाई है। रेलमंत्री श्री अश्विनी वैष्णव जी से लेकर बालकवि बैरागी जी और श्री रामकिशन बैरागी जी तक — इस परंपरा ने राष्ट्र को अनेक रत्न दिए हैं। उत्तराखंड के प्रथम मुख्यमंत्री स्व. श्री नित्यानंद स्वामी जी का उदाहरण भी इसी शृंखला की एक कड़ी है।
उषा प्रियदर्शी जी की यह यात्रा — एक सामान्य कार्यकर्ता से लेकर संवैधानिक पद तक — इसी परंपरा की जीवंत मिसाल है। भाजपा में महामंत्री, OBC मोर्चा जिलाध्यक्ष, प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष जैसे दायित्वों से गुज़रते हुए उन्होंने पंडिचेरी की चुनाव-प्रभारी के रूप में तथा बंगाल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश एवं राजस्थान के विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रचार-अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई।
समारोह का दृश्य — वीडियो में देखें
इस ऐतिहासिक सम्मान समारोह की झलक नीचे दिए गए वीडियो लिंक पर देखी जा सकती है:
https://drive.google.com/file/d/1i4RIpY0amignPJENdMyStVCWnt5_GmZ0/view?usp=drivesdk
समापन
मैं न किसी दल का प्रवक्ता हूँ, न कोई नेता, न अभिनेता — मैं तो एक निर्धन परिवार में जन्मा वह सैनिक-लेखक हूँ, जो अपने समाज की सेवा में सत्य को कलमबद्ध करने का व्रत लिए हुए है। इस पावन अवसर पर मैं हृदय की गहराइयों से श्रीमती उषा प्रियदर्शी जी को आशीर्वाद अर्पित करता हूँ, तथा माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी एवं मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी जी का आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने वैष्णव बैरागी समाज को यह गौरव प्रदान किया।
जय हिंद। जय सनातन।
- Link to Vaishnav Samaj — History for context
- Link to Books for deeper learning
- Link to related posts on values, seva and gratitude