"धर्मध्वजा से शस्त्र-प्रशिक्षण तक — वैष्णव बैरागी अखाड़ों का 1870 से 1949 तक का दस्तावेजी इतिहास (प्रमाण–24)"

वैष्णव बैरागी अखाड़ों की पहचान केवल धार्मिक साधना तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनकी अपनी धर्मध्वजा, संगठनात्मक संरचना और शस्त्र-प्रशिक्षण की भी एक सुव्यवस्थित परंपरा रही है। यह प्रमाण–24, निर्मोही, निर्वाणी और दिगंबर — तीनों अणियों की अलग-अलग धर्मध्वजाओं, उनके रंगों और उनके प्रमुख केंद्रों का विवरण प्रस्तुत करता है। साथ ही 1870 के कार्नेगी के अयोध्या-संबंधी अभिलेख, 1916 के Russell-Hira Lal के औपनिवेशिक शोध, 1925 के हनुमानगढ़ी के पंजीकृत विधान तथा 1949 के न्यायिक अभिलेख — इन सभी दस्तावेजों को एक साथ रखकर अखाड़ों के संगठन, पंचायत-व्यवस्था और शस्त्र-प्रशिक्षण की परंपरा को प्रमाण-आधारित ढंग से समझने का प्रयास किया गया है।

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प्रमाण नंबर 24: वैष्णव बैरागी अखाड़ों की धर्मध्वजा, संगठन और शस्त्र-प्रशिक्षण—1916 से 1949 तक के दस्तावेज और आधुनिक शोध

“सनातन अयोध्या खंड–2: रामजन्मभूमि की रक्षा में वैष्णव बैरागी अखाड़ों का योगदान” के शोध-क्रम में यह प्रमाण अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे वैष्णव बैरागी अखाड़ों की केवल धार्मिक पहचान ही नहीं, बल्कि उनकी संगठनात्मक व्यवस्था, अखाड़ागत संरचना, धर्मध्वजा और शस्त्र-प्रशिक्षण की परंपरा के संबंध में भी अनेक स्रोत सामने आते हैं।

सनातन धर्म में वैष्णव बैरागी परंपरा के तीन प्रमुख अखाड़ागत संगठन—श्री पंच निर्मोही अणी, श्री पंच निर्वाणी अणी और श्री पंच दिगंबर अणी—विशेष रूप से उल्लेखित मिलते हैं। इन तीनों अणियों की अपनी-अपनी अखाड़ागत पहचान और अपनी-अपनी धर्मध्वजा होती है। अर्थात तीनों अणियों की एक ही सामूहिक धर्मध्वजा नहीं है।

समकालीन प्रकाशित विवरणों में इनके प्रमुख केंद्रों के रूप में श्री पंच दिगंबर अणी अखाड़ा—श्यामलाजी खाकचौक मंदिर, साबरकांठा, गुजरात; श्री पंच निर्वाणी अणी अखाड़ा—हनुमानगढ़ी, अयोध्या, उत्तर प्रदेश; तथा श्री पंच निर्मोही अणी अखाड़ा—धीर समीर मंदिर, बंसीवट, वृंदावन, उत्तर प्रदेश का उल्लेख मिलता है। अखाड़ों के केंद्रों और संबद्ध संस्थानों का स्वरूप अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों में अलग रूप में मिलता है, इसलिए इस विषय में स्रोत-विशिष्ट विवरण को उसी रूप में देखना आवश्यक है।

धर्मध्वजा केवल धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि अखाड़े की पहचान और उसकी परंपरा से जुड़ी महत्वपूर्ण संस्था है। 2024 के प्रयाग महाकुंभ से संबंधित प्रकाशित विवरणों में भी तीनों वैष्णव अणियों—निर्मोही, निर्वाणी और दिगंबर—की अलग-अलग धर्मध्वजाएँ स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है। प्रकाशित विवरणों में निर्मोही की ध्वजा को सफेद, निर्वाणी की लाल तथा दिगंबर की बहुरंगी बताया गया है।

धर्मध्वजा के रंगों और उनके प्रतीकात्मक अर्थों के संबंध में अलग-अलग प्रकाशित एवं परंपरागत विवरण मिल सकते हैं। इसलिए इस विषय में वही अर्थ अंतिम रूप से नहीं दिया जाना चाहिए, जिसका स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध न हो। हमारे शोध का उद्देश्य परंपरा को नकारना नहीं, बल्कि उसके प्रत्येक विवरण को उसके स्रोत के साथ प्रस्तुत करना है।

हमारे 77-पृष्ठीय शोध-संग्रह के स्रोत आचार्य युगेश्वर (प्रधान संपादक), तीर्थराज प्रयाग और कुंभ महापर्व में भी धर्मध्वजा और अखाड़ागत परंपराओं के संबंध में विस्तृत विवरण उपलब्ध है। विशेष रूप से पृष्ठ 177 पर दिगंबर तथा निर्मोही परंपरा की धर्मध्वजा से संबंधित विवरण मिलता है। इस स्रोत में दिगंबर ध्वजा के आकार, वस्त्र-विन्यास, विभिन्न रंगों तथा हनुमान-चिह्न आदि का वर्णन मिलता है। इसे उसी स्रोत की ऐतिहासिक/परंपरागत प्रस्तुति के रूप में उद्धृत करना अधिक उचित है।

धर्मध्वजा की ऊँचाई के संबंध में प्रकाशित विवरणों में 52 हाथ का उल्लेख मिलता है। इसे आधुनिक फुट में निश्चित संख्या के रूप में बदलकर प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा, क्योंकि “हाथ” पारंपरिक माप है और उसका वास्तविक मान संदर्भानुसार अलग हो सकता है।

1916 का महत्वपूर्ण औपनिवेशिक स्रोत

वैष्णव बैरागी अखाड़ों के संगठनात्मक और सैन्य स्वरूप को समझने के लिए R. V. Russell तथा Rai Bahadur Hira Lal की 1916 में प्रकाशित पुस्तक The Tribes and Castes of the Central Provinces of India महत्वपूर्ण स्रोत है।

इसके “Bairāgi” संबंधी विवरण में सात अखाड़ों का उल्लेख मिलता है और अखाड़ों को बैरागियों की ऐसी संस्थागत इकाइयों के रूप में वर्णित किया गया है जिनका संबंध प्रशिक्षण और संगठन से था। स्रोत में इनके झंडों अथवा standards का भी उल्लेख मिलता है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि अखाड़े केवल साधुओं के निवास अथवा धार्मिक सभा के स्थान नहीं थे, बल्कि उनका अपना संगठनात्मक अनुशासन और पहचान-व्यवस्था भी थी।

1870 का अयोध्या संबंधी प्रमाण

पी. कार्नेगी की 1870 की पुस्तक A Historical Sketch of Tahsil Fyzabad, Zillah Fyzabad में अयोध्या के वैष्णव बैरागी अखाड़ों का विवरण मिलता है। बाद के न्यायिक दस्तावेजों में भी इस ऐतिहासिक स्रोत का संदर्भ आया है।

कार्नेगी के विवरण में अयोध्या से संबंधित सात वैष्णव बैरागी अखाड़ों के नामों का उल्लेख मिलता है। इनमें निर्वाणी, निर्मोही, दिगंबरी, खाकी, महानिर्वाणी, संतोषी और निरालंबी जैसे नाम सामने आते हैं।

यह स्रोत विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह 19वीं शताब्दी में अयोध्या में वैष्णव बैरागी अखाड़ों की संगठित उपस्थिति के संबंध में बाहरी प्रशासनिक-ऐतिहासिक विवरण प्रदान करता है।

1949 का पंजीकृत दस्तावेज

इस शोध का एक और महत्वपूर्ण आधार 26 मार्च 1949 के पंजीकृत दस्तावेज का वह विवरण है, जिसकी चर्चा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2003 के निर्णय में भी हुई है।

उस दस्तावेज में यह दर्ज है कि लगभग पाँच सौ वर्ष से अधिक समय पहले श्री रामानंदी वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत तीन अणियाँ—निर्मोही, दिगंबर और निर्वाणी—स्थापित की गई थीं तथा उनके अंतर्गत सात अखाड़ों की व्यवस्था थी।

यहाँ सावधानी आवश्यक है। इसे इस प्रकार नहीं लिखना चाहिए कि न्यायालय ने स्वयं पाँच सौ वर्ष पुरानी अखाड़ा-व्यवस्था को स्वतंत्र ऐतिहासिक जाँच द्वारा प्रमाणित कर दिया। अधिक सटीक भाषा यह है कि 1949 के पंजीकृत दस्तावेज में यह ऐतिहासिक परंपरा दर्ज/दावा की गई थी और बाद में न्यायिक कार्यवाही में उस दस्तावेज की चर्चा हुई।

इस दस्तावेज में अखाड़ों के संगठन और प्रशिक्षण संबंधी विवरण भी महत्वपूर्ण हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि वैष्णव बैरागी अखाड़ों की पहचान केवल धार्मिक साधना तक सीमित नहीं थी, बल्कि संगठनात्मक और शस्त्र-प्रशिक्षण की परंपरा से भी उसका संबंध था।

हनुमानगढ़ी के पंजीकृत नियम और संगठन

हमारे 77-पृष्ठीय शोध-संग्रह में हनुमानगढ़ी के पंजीकृत विधान और नियमों से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण पृष्ठ हैं।

पृष्ठ 184 में 19 जून 1925 के पंजीकृत समझौते का विवरण मिलता है, जिसमें 27 साधुओं के हस्ताक्षर बताए गए हैं। इसकी धारा 1 में तीन अणियों—निर्मोही, निर्वाणी और दिगंबर—का उल्लेख तथा उनके अंतर्गत अखाड़ों की व्यवस्था दर्ज है।

पृष्ठ 187 में गुरु की जिम्मेदारी, नागा संस्कार तथा स्थानीय प्रबंधन में श्री पंच, अखाड़ा प्रमुख और कार्यकारिणी पंचायत जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं का विवरण मिलता है।

पृष्ठ 189 में हनुमानगढ़ी के प्रशासन, महंत के चयन, पंच अखाड़ों और अधिकार-व्यवस्था से संबंधित नियम मिलते हैं। पृष्ठ 190 में महंत के चुनाव, कर्तव्यों, आय-व्यय, संपत्ति और प्रशासनिक उत्तरदायित्व से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख है।

पृष्ठ 194 में 1925 के समझौते के अंतर्गत नियमों के पालन, संपत्ति तथा आय-व्यय के लेखे से संबंधित व्यवस्थाएँ दिखाई देती हैं।

ये दस्तावेज इस बात के महत्वपूर्ण संस्थागत प्रमाण हैं कि वैष्णव बैरागी अखाड़ों के भीतर प्रशासन, उत्तराधिकार, महंत-पद, पंचायत और संपत्ति-व्यवस्था के लिए औपचारिक नियम मौजूद थे।

अखाड़ों में शस्त्र-प्रशिक्षण की परंपरा

अखाड़ों के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनका शस्त्र-प्रशिक्षण भी है। हमारे शोध-स्रोतों में अखाड़ों के प्रशिक्षण, नागा परंपरा, धर्मध्वजा, जुलूस, शाही स्नान और अखाड़ागत अनुशासन के बीच संबंध का उल्लेख मिलता है।

Russell के 1916 के विवरण में अखाड़ों को प्रशिक्षण से जुड़ी संस्थागत इकाइयों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। William R. Pinch की आधुनिक ऐतिहासिक शोध-कृति Peasants and Monks in British India भी वैष्णव/रामानंदी साधु-संगठनों के सशस्त्र और सामाजिक इतिहास पर महत्वपूर्ण सामग्री देती है।

इन स्रोतों को एक साथ देखने पर यह समझ आता है कि वैष्णव बैरागी अखाड़ों का इतिहास केवल आध्यात्मिक साधना का इतिहास नहीं है। इसमें संगठन, अनुशासन, यात्रा, ध्वजा, सामूहिक स्नान, मठ-संपत्ति, पंचायत और आवश्यकता पड़ने पर शस्त्र-प्रशिक्षण जैसे अनेक आयाम जुड़े रहे हैं।

हालाँकि प्राचीन काल से आधुनिक काल तक प्रत्येक घटना को एक ही निरंतर सैन्य संगठन के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। अलग-अलग काल और स्रोतों की परिस्थितियाँ अलग थीं। इसलिए इस पुस्तक में प्रत्येक दावे को उपलब्ध स्रोत के स्तर के अनुसार प्रस्तुत करना आवश्यक है।

तीन अणियाँ और उनके अंतर्गत अखाड़े

शोध-संग्रह के पृष्ठ 275 में तीनों अणियों के अंतर्गत विभिन्न अखाड़ों की विस्तृत सूची मिलती है।

निर्मोही अणी के अंतर्गत रामानंदीय और निंबार्क परंपरा से संबंधित अनेक अखाड़ों के नाम मिलते हैं, जिनमें निंबार्क संतोषी, निंबार्क निर्मोही, निंबार्क महानिर्वाणी, जड़िया, राधावल्लभी, सतनामी और विष्णुस्वामी आदि का उल्लेख है।

निर्वाणी अणी के अंतर्गत रामानंदीय निर्वाणी, रामानंदीय निरालंबी, निंबार्क निरालंबी, निंबार्क निर्वाणी, बालपंथिया, ततबंदी और खाकी आदि नाम मिलते हैं।

दिगंबर अणी के अंतर्गत रामानंदीय दिगंबर, निंबार्क दिगंबर और छुड़रिया दिगंबर जैसे नाम मिलते हैं।

उसी स्रोत में यह भी बताया गया है कि प्रत्येक अणी के अंतर्गत अखाड़ों के महंतों में से प्रधान महंत चुने जाते हैं, जिन्हें अणी के “श्री महंत” के रूप में जाना जाता है।

यह विवरण अखाड़ागत संरचना के भीतर एक स्पष्ट संगठनात्मक क्रम की ओर संकेत करता है।

2019 का मेरा प्रत्यक्ष शोध-अनुभव

वर्ष 2019 के प्रयाग महाकुंभ में मैं अपनी धर्मपत्नी श्रीमती निर्मला वैष्णव के साथ लगभग 15 दिनों तक प्रयाग में रहा। इस दौरान वैष्णव बैरागी अखाड़ों की व्यवस्था और परंपराओं को धरातल पर निकट से देखने-समझने का अवसर मिला। विशेष रूप से निर्मोही अखाड़े के साथ साधु-वेश में दो बार शाही स्नान में सम्मिलित होना मेरे जीवन के अत्यंत महत्वपूर्ण अनुभवों में से एक रहा। पुस्तकों में पढ़ी जाने वाली अखाड़ा-परंपरा को प्रत्यक्ष धरातल पर देखने का यह अनुभव मेरे आगे के शोध के लिए भी महत्वपूर्ण रहा।

निष्कर्ष

धर्मध्वजा, अणी-व्यवस्था, पंचायत, महंत-परंपरा, पंजीकृत विधान, शस्त्र-प्रशिक्षण और ऐतिहासिक दस्तावेज—इन सभी को एक साथ देखने पर वैष्णव बैरागी अखाड़ों की एक जटिल और अनुशासित संस्थागत संरचना सामने आती है।

1870 के कार्नेगी, 1916 के Russell-Hira Lal, 1925 के हनुमानगढ़ी संबंधी पंजीकृत दस्तावेजों, 1949 के पंजीकृत अभिलेख तथा बाद के न्यायिक और आधुनिक शोध-साहित्य को साथ रखकर इस विषय का अध्ययन किया जा सकता है।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इतिहास को केवल परंपरागत कथाओं के आधार पर नहीं, बल्कि दस्तावेज, पंजीकृत अभिलेख, ऐतिहासिक ग्रंथ, न्यायिक संदर्भ और प्रत्यक्ष क्षेत्रीय अध्ययन—इन सभी को मिलाकर समझा जाए।

इसी प्रमाण-आधारित दृष्टि से “सनातन अयोध्या खंड–2: रामजन्मभूमि की रक्षा में वैष्णव बैरागी अखाड़ों का योगदान” में वैष्णव बैरागी अखाड़ों की भूमिका का अध्ययन प्रस्तुत किया जा रहा है।

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स्रोत-संदर्भ

1. आचार्य युगेश्वर (प्रधान संपादक), तीर्थराज प्रयाग और कुंभ महापर्व, पृ. 177।

2. P. Carnegy, A Historical Sketch of Tahsil Fyzabad, Zillah Fyzabad, Oudh Government Press, Lucknow, 1870, pp. 19–20.

3. R. V. Russell and Rai Bahadur Hira Lal, The Tribes and Castes of the Central Provinces of India, Vol. II, 1916, “Bairāgi”.

4. William R. Pinch, Peasants and Monks in British India, University of California Press, 1996.

5. हनुमानगढ़ी संबंधी पंजीकृत विधान एवं 1925 के दस्तावेज—शोध-संग्रह में उपलब्ध संबंधित पृष्ठ।

6. 26 मार्च 1949 के पंजीकृत दस्तावेज का न्यायिक संदर्भ—इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2003 के निर्णय में चर्चित।

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लेखक परिचय

नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना | इतिहासकार | शोधकर्ता | लेखक

नरेश दास वैष्णव निम्बार्क पिछले 18 वर्षों से सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा, अयोध्या, निम्बार्क परंपरा तथा भारतीय इतिहास से जुड़े विषयों पर शोध एवं लेखन कर रहे हैं। उनका शोध-कार्य पुस्तकीय स्रोतों के साथ-साथ ऐतिहासिक अभिलेखों, पंजीकृत दस्तावेजों, न्यायालयीन अभिलेखों, शोधग्रंथों, क्षेत्रीय यात्राओं और प्रत्यक्ष शोध-अनुभवों पर आधारित है।

उन्होंने हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में शोधपरक पुस्तकों का लेखन किया है। वर्तमान में वे अपनी 21वीं पुस्तक “सनातन अयोध्या खंड–2: रामजन्मभूमि की रक्षा में वैष्णव बैरागी अखाड़ों का योगदान” पर विस्तृत शोध-लेखन कर रहे हैं।

उनका प्रयास है कि सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा और अयोध्या से जुड़े इतिहास को उपलब्ध दस्तावेजों, अभिलेखों और प्रमाणों के आधार पर व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जाए तथा परंपरागत कथाओं, मौखिक जानकारी और दस्तावेजी प्रमाणों के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाए।

अधिक जानकारी, शोध-लेख, पुस्तकें एवं अन्य प्रकाशनों के लिए आधिकारिक वेबसाइट पर जाएँ:

www.nareshswaminimbark.in
जय हिंद। जय भारत।
जय श्री राधे राधे।

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