"नाम हजारों हैं, आभार सबका है — एक सैनिक की कलम से बनी 20 पुस्तकों की अनकही यात्रा"

एक सामान्य किसान परिवार से भारतीय सेना तक, और फिर 18 वर्षों की शोध-यात्रा में 20 पुस्तकें — जानें उन सभी सहयोगियों की कहानी जिन्होंने इस सफर में साथ दिया।

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**नाम हजारों हैं, आभार सबका है — मेरी शोध-यात्रा के सभी सहयोगियों को हृदय से नमन**

परमपिता परमात्मा को सर्वप्रथम कोटि-कोटि नमन और हृदय से धन्यवाद।

आज जब मैं अपनी जीवन-यात्रा और पिछले लगभग 18 वर्षों की शोध एवं लेखन-यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मन में सबसे पहले किसी उपलब्धि का नहीं, बल्कि कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है।

एक सामान्य गरीब किसान परिवार में जन्मा एक सामान्य सैनिक, जिसे भारतीय सेना में सेवा करने का सौभाग्य मिला। लगभग 24 वर्ष 4 दिन की सैन्य सेवा के दौरान देश की सेवा का अवसर मिला और संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशन UNAMSIL, Sierra Leone में भी सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ। जीवन में नेपाल की यात्राएँ, भूटान, दुबई, केन्या, म्यांमार और सिएरा लियोन जैसे देशों तक जाने का अवसर मिला।

सेना ने मुझे अनुशासन दिया, कर्तव्य सिखाया और परिस्थितियों के बीच धैर्य रखना सिखाया।

सेवानिवृत्ति के बाद वही अनुशासन धीरे-धीरे बंदूक से कलम तक की यात्रा में बदल गया।

पिछले लगभग 18 वर्षों से सनातन, भारतीय इतिहास, हमारी सांस्कृतिक विरासत और वैष्णव बैरागी परंपरा से जुड़े विषयों पर अध्ययन, शोध, दस्तावेजों के संकलन और लेखन का कार्य निरंतर चलता रहा।

आज मेरी 9 हिंदी और 11 अंग्रेजी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं—कुल 20 पुस्तकें। और अब 21वीं पुस्तक पर कार्य चल रहा है—

"सनातन अयोध्या खंड–2: रामजन्मभूमि की रक्षा में वैष्णव बैरागी अखाड़ों का योगदान"।

लेकिन यह यात्रा केवल मेरी नहीं है।

मेरी कलम के पीछे अनेक हाथ हैं, अनेक विद्वानों का मार्गदर्शन है, अनेक संतों का आशीर्वाद है, अनेक मित्रों का सहयोग है और हजारों पाठकों एवं शुभचिंतकों का स्नेह है।

**मेरी लेखन-यात्रा की शुरुआत**

मेरी पहली दो पुस्तकों—
"यात्रा बंदूक से कलम तक" और
"महंत बने महाराजा"
के समय जिस व्यक्ति ने मेरे लेखन को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनका नाम मैं विशेष श्रद्धा से स्मरण करता हूँ—

राष्ट्रकवि, साहित्यकार एवं ग़ज़लकार श्री प्रमोद रामावत "प्रमोद" जी, नीमच, मध्य प्रदेश।

उन्होंने मेरी पहली दो पुस्तकों को पूरा कराने और संपादन में महत्वपूर्ण सहयोग दिया। सच कहूँ तो मेरी लेखन-यात्रा की पहली ठोस शुरुआत वहीं से हुई।

मैं उनके प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ।

**विद्वत एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शन**

महंत डॉ. राजपाल दास बैरागी जी—
एम.ए. संस्कृत एवं निम्बार्क वेदांत में पीएच.डी.—इनका विद्वत मार्गदर्शन आज भी मुझे निरंतर प्राप्त हो रहा है।

शोध के कठिन विषयों में मार्गदर्शन और आध्यात्मिक दृष्टि से मिलने वाला उनका सहयोग मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान है।

मैं उनका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।

**अयोध्या एवं वैष्णव बैरागी परंपरा के शोध में सहयोग**

मेरी वर्तमान शोध-यात्रा में अयोध्या और रामजन्मभूमि से जुड़े वैष्णव बैरागी अखाड़ों के इतिहास को समझने में अनेक संतों और विद्वानों से मिलने का अवसर मिला।

विशेष रूप से मैं श्रद्धापूर्वक स्मरण करता हूँ—

महंत धर्मदास जी बैरागी, हनुमानगढ़ी, निर्वाणी अखाड़ा।

महंत राजू दास जी महाराज, हनुमानगढ़ी।

महंत दिनेंद्र दास जी, रामजन्मभूमि ट्रस्ट एवं निर्मोही अखाड़ा।

मास्टर जगबीर वैष्णव जी।

इन सभी के सहयोग, समय और मार्गदर्शन ने मेरे शोधकार्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इसी क्रम में पूर्व न्यायाधीश श्री राजेंद्र दास वैष्णव जी, मुंबई का भी मैं हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।

और छोटे राजा लल्ला जितेंद्र किशोर दास बैरागी जी, रियासत छुईखदान के प्रति भी मैं अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ।

इन सभी का सहयोग मेरे लिए केवल जानकारी का स्रोत नहीं, बल्कि इतिहास को समझने की एक जिम्मेदारी का हिस्सा है।

**प्रचार एवं सनातन विचारों को आगे पहुँचाने में सहयोग**

Jayendra Nimavat, Rajkot — Shaligram Vaishnav TV

इनका भी मैं विशेष रूप से आभार व्यक्त करता हूँ।

सनातन, वैष्णव बैरागी परंपरा और इतिहास से जुड़े विषयों को समाज तक पहुँचाने में जो सहयोग और मंच मिला, उसके लिए मैं हृदय से धन्यवाद देता हूँ।

**निम्बार्क परंपरा से जुड़े सहयोगी**

मेरी शोध-यात्रा में निम्बार्क परंपरा से जुड़े सहयोगियों का भी विशेष स्थान है।

श्री बकुलेशचंद्र गोपालदास निम्बार्क जी, जामनगर, गुजरात
और
श्रीमती रामेश्वरी बेन निम्बार्क जी, गुजरात

इनका सहयोग और स्नेह मेरे लिए सदैव स्मरणीय रहेगा।

**पुस्तकें मेरा उद्देश्य नहीं, माध्यम हैं**

मैंने कभी पुस्तकों को केवल बेचने या व्यक्तिगत लाभ कमाने का माध्यम नहीं माना।

मेरे लिए पुस्तक का अर्थ है—
शोध को सुरक्षित रखना, इतिहास को दस्तावेजों के आधार पर सामने रखना और आने वाली पीढ़ी तक सही सामग्री पहुँचाना।

इसी भावना से "सनातन भारत नया सवेरा" नाम से मासिक ई-पत्रिका के माध्यम से भी सनातन, इतिहास, संस्कृति, शिक्षा, संस्कार और सामाजिक विषयों को समाज तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।

मेरा प्रयास है कि जहाँ तक संभव हो, यह सामग्री बिना किसी व्यावसायिक उद्देश्य के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे।

**जब शोध की पहुँच सीमाओं से आगे जाती है**

जब मुझे यह जानकारी मिलती है कि मेरी पुस्तकें, शोधकार्य और पत्रिका दुनिया के लगभग 190 देशों तक पहुँच रही हैं, तो मेरे मन में गर्व से अधिक विनम्रता और कृतज्ञता का भाव आता है।

मैं इसे अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं मानता।

इसके पीछे उन सभी पाठकों, शोधकर्ताओं, संतों, विद्वानों, मित्रों और शुभचिंतकों का योगदान है, जिन्होंने मेरी पुस्तकों को पढ़ा, साझा किया, सुझाव दिए और आगे पहुँचाया।

मेरी दृष्टि में कलम की सार्थकता तभी है, जब उससे किसी व्यक्ति को अपनी संस्कृति, अपने इतिहास और अपनी जड़ों को समझने में सहायता मिले।

**जिनका नाम नहीं लिख पाया, वे भी मेरे हृदय में हैं**

आज मैंने कुछ प्रमुख नाम लिखे हैं, लेकिन सच यह है कि नाम हजारों हैं और आभार सबका है।

हर संत का नाम लिखना संभव नहीं।

हर विद्वान का नाम लिखना संभव नहीं।

हर सहयोगी, मित्र, पाठक और शुभचिंतक का नाम लिखना भी संभव नहीं।

लेकिन मैं यह अवश्य कह सकता हूँ—

जिस किसी ने मेरी शोध-यात्रा में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक कदम भी साथ चलकर सहयोग किया है, मैं उसका हृदय से आभारी हूँ।

मैं सबका नाम नहीं लिख सकता,
लेकिन सबको प्रणाम अवश्य कर सकता हूँ।

परमपिता परमात्मा से मेरी यही प्रार्थना है कि जब तक शरीर में शक्ति और हाथ में कलम है, तब तक मैं अपने देश, अपनी संस्कृति, अपने इतिहास और सनातन की सेवा करता रहूँ।

मेरी यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है।

अभी बहुत कुछ पढ़ना है।
बहुत कुछ खोजना है।
बहुत कुछ प्रमाणित करना है।
और बहुत कुछ आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित करना है।

आप सभी का स्नेह मेरी शक्ति है।
आप सभी का आशीर्वाद मेरी पूँजी है।
और सनातन की सेवा मेरी जीवन-यात्रा है।

परमपिता परमात्मा सबको स्वस्थ, सुखी और प्रसन्न रखें।

जय हिंद
जय भारत
जय श्री राधे राधे
जय श्री कृष्णा
जय श्री सीताराम

— नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना | इतिहासकार | शोधकर्ता | लेखक

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