सृष्टि से सतलुज तक — 48 कोस कुरुक्षेत्र का लुप्त इतिहास अब उजागर होगा!

सनातन कुरुक्षेत्र के 48 कोस क्षेत्र में छिपे भीष्म कुंड, कर्ण का टीला, ब्रह्म तीर्थ जैसे 17 से अधिक लुप्त तीर्थों की सत्य खोज। नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की ऐतिहासिक शोध यात्रा — सृष्टि से सतलुज तक श्रीकृष्ण की अमर भूमि का प्रमाणिक इतिहास।

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सनातन कुरुक्षेत्र — सृष्टि से सतलुज तक, श्रीकृष्ण की अमर भूमि
एक शोध यात्रा • एक संकल्प • एक इतिहास

क्या आप जानते हैं कि जिस पावन भूमि पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का अमर उपदेश दिया था, उसी कुरुक्षेत्र में आज भी सत्रह से अधिक ऐसे तीर्थ विद्यमान हैं जिनका नाम अधिकांश सनातन प्रेमियों ने कभी सुना ही नहीं? यह केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, अपितु सृष्टि के आरंभ से लेकर महाभारत काल तक की जीवंत गाथा है — और समय के प्रवाह में इसका बहुत बड़ा भाग विस्मृति के अंधकार में खो चुका है।
15 जुलाई 2026 से मैं, नरेश दास वैष्णव निम्बार्क — एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी और सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा का शोधार्थी — अपने चार समर्पित साथियों के साथ इस ऐतिहासिक शोध यात्रा पर प्रस्थान कर रहा हूँ: मास्टर जगबीर वैष्णव, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री दिनेश स्वामी, तुलसी बैरागी, तथा समाज के प्रतिष्ठित भामाशाह श्री वेद प्रकाश डबकोली।
यह कोई साधारण तीर्थयात्रा नहीं है। बचपन से ही इन पावन स्थलों की अनेक बार परिक्रमा की, किंतु इस बार का उद्देश्य भिन्न और गंभीर है। इस बार का संकल्प है — हर तीर्थ, हर सरोवर, हर लोककथा और हर ऐतिहासिक प्रमाण को व्यवस्थित रूप से संकलित करना, ताकि वे मेरी आगामी पुस्तक "सनातन कुरुक्षेत्र — सृष्टि से सतलुज तक, श्रीकृष्ण की अमर भूमि" में सुरक्षित रह सकें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँच सकें।
शोध यात्रा — दिवस प्रथम
प्रातः 7:00 बजे रामनगर (गन्नौर) से प्रस्थान होगा। यात्रा का प्रथम पड़ाव रन्तुक यक्ष (बीड़ पीपली) होगा — महाभारतकालीन यक्ष उपासना परंपरा का प्राचीनतम केंद्र। इसके पश्चात भीष्म कुंड, बाणगंगा पहुँचेंगे, जहाँ पितामह भीष्म की तृषा शांत करने हेतु अर्जुन ने अपने बाण से पृथ्वी को भेदकर गंगा को प्रकट किया था — यह दृश्य आज भी हमारी सांस्कृतिक चेतना में अंकित है।
तत्पश्चात आपगा तीर्थ (दयालपुर) — जो वैदिक सरस्वती नदी की प्राचीन परंपरा से संबद्ध पवित्र स्थल है — और कर्ण का टीला, जहाँ महादानी कर्ण की तपस्या, दानशीलता तथा वीरता की स्मृतियाँ आज भी जीवंत हैं। इसके उपरांत ओजस तीर्थ (शमशीपुर), काम्यक वन — जहाँ पाण्डवों ने अपने वनवास का एक महत्वपूर्ण काल व्यतीत किया — लोमश ऋषि तीर्थ, तथा कुलोत्तारण तीर्थ (किर्मच) की यात्रा होगी, जहाँ मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक स्नान करने से समस्त कुल का उद्धार होता है। रात्रि विश्राम बैरागी धर्मशाला में होगा।
शोध यात्रा — दिवस द्वितीय
द्वितीय दिवस का आरंभ भूरिश्रवा तीर्थ से होगा — महाभारत के उस महान योद्धा की स्मृति में, जिसका बलिदान आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है। तदुपरांत शालिहोत्र तीर्थ — प्राचीन ऋषि परंपरा और आयुर्विज्ञान के मूल स्रोत से जुड़ा स्थल — तथा अरुणाय तीर्थ, जो सूर्योपासना और तपस्या की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है।
यात्रा आगे बढ़ेगी सोम तीर्थ (सैंसा) की ओर, जो चंद्रदेव की उपासना से संबंधित है, फिर माता रेणुका के पावन स्मरण स्थल रेणुका तीर्थ, तथा सोम तीर्थ (गुमथला गढ़ू) की ओर, जो वैदिक आस्था का एक अन्य महत्वपूर्ण केंद्र है। इसके पश्चात शुक्र तीर्थ — शुक्राचार्य की तपस्थली से जुड़ी मान्यताओं का स्थल — और सप्तसरस्वत तीर्थ, जहाँ माता सरस्वती की सात धाराओं के मिलन की गाथा वर्णित है, का भ्रमण होगा।
यात्रा का समापन ब्रह्म तीर्थ (थानेसर) में होगा — वह स्थल जहाँ ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी, और जो कुरुक्षेत्र की समस्त आध्यात्मिक महिमा का केंद्रबिंदु माना जाता है। यहीं गुलडेहरा तथा मुर्तजापुर के स्थानीय ऐतिहासिक संदर्भों की भी गहन खोज की जाएगी, जो अब तक इतिहास की मुख्यधारा से प्रायः उपेक्षित रहे हैं।
मेरा संकल्प
एक सैनिक के अनुशासन और एक शोधार्थी की निष्ठा के साथ मैंने यह प्रण लिया है कि सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार तथा अपनी पुस्तकों के प्रकाशन हेतु मैं कभी किसी से एक रुपया भी चंदा स्वीकार नहीं करूँगा। मुझे न धन की अभिलाषा है, न प्रसिद्धि की। मैं न कोई बड़ा लेखक हूँ, न प्रतिष्ठित इतिहासकार, न राजनेता और न अभिनेता — मैं तो केवल एक सैनिक हूँ, जिसने अब अपनी शेष सेवा प्रभु के चरणों और सनातन परंपरा के संरक्षण में समर्पित कर दी है।
यह कार्य केवल प्रभु की कृपा तथा आप सभी सनातन प्रेमियों के प्रेम, विश्वास और आशीर्वाद के बल पर आगे बढ़ रहा है। यदि मेरी इस लेखनी से आने वाली पीढ़ियाँ अपने भूले-बिसरे तीर्थों, महापुरुषों तथा गौरवशाली इतिहास को पुनः पहचान सकें, तो यही मेरे इस जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि और सार्थकता होगी।

सनातन है तो हम हैं।
सनातन बचेगा तो संस्कृति बचेगी।
संस्कृति बचेगी तो भारत विश्व का मार्गदर्शक बनेगा।
आप सभी से अत्यंत विनम्र निवेदन है कि इस शोध यात्रा तथा इस संदेश को अधिक से अधिक साझा करें, ताकि प्रत्येक सनातनी अपने गौरवशाली अतीत और भूली-बिसरी धरोहर की ओर पुनः लौट सके।
जय श्रीकृष्ण। जय श्रीराम। जय सनातन।

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