हृदय से आभार — एक ऐतिहासिक यात्रा में मिला अपार स्नेह
प्रिय समाजबंधुओं, विद्वजनों एवं शुभचिंतकों,
आज मेरा मन अत्यंत भावुक, कृतज्ञ और गौरवान्वित है।
जब मैंने "सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा — वेदों से आधुनिक काल तक" इस शोधग्रंथ की रचना प्रारंभ की थी, तब मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि यह कार्य इतनी शीघ्रता से देश-विदेश के पाठकों तक पहुँचेगा और इतने लोगों का स्नेह एवं आशीर्वाद प्राप्त होगा।
पिछले कुछ दिनों से मेरे मोबाइल पर लगातार फोन आ रहे हैं, ईमेल प्राप्त हो रहे हैं और व्हाट्सएप पर शुभकामना संदेशों की निरंतर बाढ़-सी आई हुई है। भारत के अनेक राज्यों—हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत के विभिन्न क्षेत्रों से समाजबंधुओं ने फोन कर बधाई एवं शुभकामनाएँ दी हैं।
विदेशों से मिला अपार स्नेह
यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष और गर्व का विषय है कि कनाडा, अमेरिका, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया, चेक गणराज्य, संयुक्त अरब अमीरात (दुबई) और यूनाइटेड किंगडम में रहने वाले समाजबंधुओं एवं शुभचिंतकों ने भी फोन, ईमेल और संदेशों के माध्यम से अपना स्नेह व्यक्त किया है।
यह देखकर मन प्रसन्न होता है कि हमारा समाज आज विश्वभर में अपनी सांस्कृतिक जड़ों और इतिहास के प्रति जागरूक एवं समर्पित है।
इसी क्रम में स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा से प्राप्त शुभकामना संदेश मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक रहा। यह अनुभव इस विश्वास को और मजबूत करता है कि प्रामाणिक इतिहास की आवाज़ सीमाओं में नहीं बंधती।
पूर्व राजदूत श्री पी.आर. स्वामी जी का स्नेह
मेरे लिए यह विशेष सम्मान का विषय रहा कि भारत सरकार के पूर्व राजदूत श्री पी.आर. स्वामी जी ने स्वयं फोन कर मुझे शुभकामनाएँ दीं।
एक वरिष्ठ राजनयिक का यह स्नेह और प्रोत्साहन मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक है। मैं उनके प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
समाज की सीमाओं से परे मिला सम्मान
मेरे लिए सबसे अधिक संतोष की बात यह है कि यह सराहना केवल सनातन वैष्णव बैरागी समाज तक सीमित नहीं रही।
अन्य बिरादरियों, विभिन्न समुदायों तथा अनेक विद्वानों ने भी फोन, ईमेल और संदेशों के माध्यम से इस शोधकार्य की प्रशंसा की है।
यही किसी भी निष्पक्ष और तथ्याधारित शोध की सबसे बड़ी सफलता होती है।
यह सम्मान वास्तव में किसका है?
मैं पूरे विनम्र भाव से कहना चाहता हूँ कि यह सम्मान किसी एक व्यक्ति नरेश दास वैष्णव 'निम्बार्क' का नहीं है।
यह सम्मान—
सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा का है।
हमारे पूर्वजों के त्याग और तपस्या का है।
उन विद्वानों का है जिनके ग्रंथों, अभिलेखों और शोधों ने इस पुस्तक की नींव रखी।
और उन सभी पाठकों का है जिन्होंने इस पुस्तक को पढ़ा, साझा किया और अपना स्नेह प्रदान किया।
सैनिक से शोधकर्ता तक की यात्रा
भारतीय सेना में वर्षों तक मातृभूमि की सेवा करने के बाद जब मैंने कलम उठाई, तब मेरा केवल एक ही संकल्प था—
"दावों से नहीं, दस्तावेज़ों से इतिहास बोलेगा।"
सेना से मिले अनुशासन, धैर्य और समर्पण ने ही मुझे वर्षों तक पुस्तकालयों, अभिलेखागारों, शिलालेखों, दुर्लभ ग्रंथों और ऐतिहासिक स्रोतों के गहन अध्ययन के लिए प्रेरित किया।
आज यदि इस शोधकार्य को समाज का स्नेह मिल रहा है, तो यह मेरे लिए ईश्वर का आशीर्वाद है।
पुस्तक निःशुल्क उपलब्ध है
Zenodo (DOI सहित): https://doi.org/10.5281/zenodo.21439166
Internet Archive: https://archive.org/details/2-english-sanatan-vaishnav-bairagi-tradition-complete-2
Scribd: https://www.scribd.com/document/1063708703/The-Sanatan-Vaishnav-Bairagi-Tradition
Google Play Books: https://play.google.com/store/search?q=Naresh+Das+Vaishnav+Nimbark&c=books
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आगे की यात्रा
यह यात्रा अभी प्रारंभ हुई है।
हिंदी संस्करण शीघ्र ही Notion Press के माध्यम से प्रकाशित होगा, ताकि मातृभाषा में पढ़ने वाले पाठक भी इस शोध से लाभान्वित हो सकें।
आप सभी से मेरा विनम्र आग्रह है कि इस पुस्तक को अधिक से अधिक साझा करें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपने इतिहास, संस्कृति और पूर्वजों के गौरव से परिचित हो सकें।
अंत में...
मैं हृदय की गहराइयों से उन सभी समाजबंधुओं, विद्वानों, मित्रों, शुभचिंतकों तथा विशेष रूप से पूर्व राजदूत श्री पी.आर. स्वामी जी का आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने अपने प्रेम, विश्वास और आशीर्वाद से मुझे निरंतर प्रेरित किया।
आप सभी का स्नेह ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है।
"दावों से नहीं, दस्तावेज़ों से इतिहास बोलेगा।"
जय श्री हरि।
— नरेश दास वैष्णव 'निम्बार्क'
सेवानिवृत्त नायब सूबेदार, भारतीय सेना
इतिहासकार एवं स्वतंत्र शोधकर्ता
वेबसाइट: www.nareshswaminimbark.in
ईमेल: nareshkumarswami731964@gmail.com
व्हाट्सएप: 90135 35190
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