सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा नीदरलैंड्स पहुँची — वेदों से ब्रिटिश अभिलेखों तक का सफर इसी महीने पूरा होगा

सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा जर्मनी के बाद अब नीदरलैंड्स पहुँची। पूर्व सैनिक नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की नई शोधकृति "वेदों से ब्रिटिश अभिलेखों तक" इसी महीने प्रकाशित होगी।

ऐतिहासिक शोध3 min read

सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा पर पूर्व सैनिक का शोध अब नीदरलैंड्स पहुँचा, इसी माह प्रकाशित होगी "वेदों से ब्रिटिश अभिलेखों तक"

एक सैनिक जब सेवानिवृत्त होता है, तो अस्त्र त्याग देता है, परंतु अनुशासन कभी नहीं त्यागता। मैंने भी 24 वर्षों तक मातृभूमि की सेवा के पश्चात कलम उठाई, और वही अनुशासन, वही निष्ठा आज भी मेरे शोध-कार्य में जीवंत है। आज मुझे अत्यंत हर्ष के साथ यह साझा करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा पर आधारित मेरी साहित्यिक यात्रा जर्मनी के पश्चात अब यूरोप के एक और देश — नीदरलैंड्स (हॉलैंड) — तक जा पहुँची है।

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मेरी पुस्तक "Ranbhoomi se Teerthbhoomi tak: Ek Sainik ki Amar Gatha" — स्वतंत्रता सेनानियों, धार्मिक यात्राओं और सैनिक कविताओं का संग्रह — अब Amazon.nl पर Kindle संस्करण में पाठकों के लिए उपलब्ध है।

आगामी पुस्तक — इसी महीने प्रकाशित होने जा रही है

इसके साथ ही मैं यह साझा करते हुए विशेष गर्व अनुभव कर रहा हूँ कि मेरी अब तक की सबसे बड़ी शोध-कृति "सनातन वैष्णव बैरागी: वेदों से ब्रिटिश अभिलेखों तक" इसी महीने हिंदी और इंग्लिश — दोनों भाषाओं में प्रकाशित होने जा रही है। यह ग्रंथ 100 से अधिक ऐतिहासिक प्रमाणों, मूल दस्तावेज़ों और प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित है — वेद, उपनिषद, पुराण, महाभारत से लेकर जगद्गुरु रामानुजाचार्य, निम्बार्काचार्य एवं रामानंदाचार्य की परंपराओं तक; तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के अभिलेखों, ब्रिटिश भारत के गजेटियरों और 1871 से 1931 तक की जनगणना रिपोर्टों तक — 18 वर्षों के गहन शोध का सार है।

वह कहानी, जिसने मुझे "Ranbhoomi se Teerthbhoomi tak" लिखने को प्रेरित किया

इसी पुस्तक में संकलित है शहीद सूबेदार किताब सिंह बैरागी की अमर कहानी। 5 दिसंबर 1955 को हरियाणा के जिला जींद स्थित गाँव पाथरी में जन्मे इस वीर ने 1974 में भारतीय सेना में भर्ती होकर 22 वर्षों तक देश की सेवा की। 22 अप्रैल 1996 को अपने फौजी साथियों की जान बचाने के लिए, बिना एक क्षण सोचे, उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया — गीता पर हाथ रखकर ली गई उस शपथ की सजीव मिसाल, जो हर भारतीय सैनिक लेता है।

उनके पीछे रह गए एक बेटा और दो बेटियाँ, जो आज स्वास्थ्य, बिजली व श्रम विभागों में सेवारत हैं और पिता के बलिदान को गर्व से जीते हैं।

"दावे नहीं, दस्तावेज़ बोलेंगे।"

यही वह सिद्धांत है जिसे लेकर मैंने अपनी संपूर्ण शोध-यात्रा तय की है — चाहे वह गंगादास की बड़ी शाला हो, अयोध्या-गोरखपुर-नेपाल की यात्रा हो, ब्रिटिशकालीन अभिलेखों का अध्ययन हो, छुईखदान-राजनांदगांव के बैरागी राजाओं का इतिहास हो, या अब आगामी ग्रंथ "वेदों से ब्रिटिश अभिलेखों तक" — हर तथ्य को प्रमाणों की कसौटी पर परखकर ही प्रस्तुत किया गया है।

मैं अपने समस्त पाठकों, शोधार्थियों और सनातन परंपरा से जुड़े सभी बंधुओं से अनुरोध करता हूँ कि इस यात्रा में मेरा साथ दें और आगामी ग्रंथ की प्रतीक्षा करें।

पुस्तक यहाँ उपलब्ध है (Amazon.nl): https://www.amazon.nl/-/en/Naresh-Das-Vaishnav-Nimbark-ebook/dp/B0GZL96PTJ

पूरी खबर Aima Media पर पढ़ें: https://aimamedia.org/newsdetails.aspx?type=Share&nid=700872

नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त नायब सूबेदार, भारतीय सेना | अंतर्राष्ट्रीय लेखक एवं इतिहासकार
कारगिल युद्ध 1999 | संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन UNAMSIL, सिएरा लियोन 2000

www.nareshswaminimbark.in
nareshkumarswami741964@gmail.com

जय श्रीहरि, जय जवान, जय सनातन, जय हिन्द

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