"18 साल, 14 किताबें, 190 देश — कैसे एक पूर्व सैनिक ने भारत का खोया इतिहास फिर से लिखा"

"पूर्व सैनिक नरेश दास वैष्णव निम्बार्क ने 18 वर्षों की खोज से सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा पर 14 पुस्तकें लिखीं — अब 190 देशों में उपलब्ध। पढ़ें भारत का भूला इतिहास।"

Vaishnav Bairagi History4 min read

भावेश और दिव्यांशी बड़े होकर पढ़ेंगे वह इतिहास जो उनके दादा ने खुद लिखा

14 किताबें, 190 देश
एक तस्वीर होती है जो केवल आँखों से नहीं, हृदय से देखी जाती है। यह वही तस्वीर है — एक दादा की गोद में उसका पोता भावेश स्वामी, और पीछे खड़ी हैं वे 14 किताबें, जिन्हें लिखने में इस दादा ने अपने जीवन के 18 वर्ष लगा दिए। यह कोई साधारण फोटो नहीं है, यह एक संकल्प की तस्वीर है, एक यात्रा का प्रमाण है, और आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ी गई एक अमूल्य धरोहर है — यह धरोहर जितनी भावेश की है, उतनी ही अपनी पोती दिव्यांशी स्वामी की भी है।

कहानी शुरू होती है हरियाणा के एक छोटे से गाँव रामनगर, गन्नौर, सोनीपत से। एक साधारण किसान परिवार में जन्मे नरेश दास वैष्णव निम्बार्क ने भारतीय सेना की आर्मी सर्विस कोर (ASC) में अपनी सेवाएँ दीं, जहाँ उन्होंने सेना की रसद एवं आपूर्ति (लॉजिस्टिक) व्यवस्था संभाली। 1999 में उन्होंने ऑपरेशन विजय में अपना योगदान दिया। वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के अंतर्गत सिएरा लियोन, पश्चिम अफ्रीका में सेवा करते हुए उन्हें प्रत्यक्ष गोलीबारी का सामना करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ, जहाँ से लौटकर उन्हें मानद नायब सूबेदार की उपाधि से सम्मानित किया गया। लेकिन असली परीक्षा तब शुरू हुई जब वर्दी उतार दी गई — क्योंकि अधिकतर लोग विश्राम की सोचते हैं,

इस पूर्व सैनिक ने एक नई लड़ाई छेड़ दी — इतिहास की गुमनामी के विरुद्ध लड़ाई।
सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा — भारत की सबसे प्राचीन, सबसे वीरतापूर्ण, परंतु सबसे कम चर्चित परंपराओं में से एक। वे संत जिन्होंने एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में तलवार थामी। जिन्होंने मंदिरों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए, जिन्होंने सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया, और जिनका बलिदान इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में कभी दर्ज ही नहीं हुआ। यह अन्याय था — और इस अन्याय को मिटाने का बीड़ा उठाया एक अनुशासित पूर्व सैनिक-इतिहासकार ने।

18 वर्षों तक, बिना किसी संस्थागत सहायता के, बिना किसी बड़े प्रकाशक के सहारे के, गाँव-गाँव घूमकर, पुराने दस्तावेज़ खंगालकर, पुरातात्विक साक्ष्य जुटाकर, एक-एक पन्ना लिखा गया। परिणाम आज हमारे सामने है — 14 पुस्तकें, जिनमें 6 हिंदी में और 8 अंग्रेज़ी में, जो आज भारत से निकलकर अमेरिका, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया समेत 190 से अधिक देशों में पढ़ी जा रही हैं।

पर इस पूरी यात्रा का सबसे सुंदर हिस्सा वह नहीं है जो किताबों के पन्नों में लिखा है — वह है जो इस तस्वीर में कैद है। भावेश स्वामी, जो अभी बहुत छोटा है, जिसे शायद अभी यह समझ भी न आए कि उसका दादा क्या कर रहा है, वह एक दिन बड़ा होगा। और जब वह बड़ा होगा, तब उसके हाथ में कोई पराई किताब नहीं होगी — उसके हाथ में वह इतिहास होगा जो खुद उसके दादा ने, अपने खून-पसीने से, अपनी स्याही से लिखा होगा। वह पढ़ेगा कि कैसे उसका दादा एक अनुशासित सैनिक था, कैसे उसने वर्दी उतारने के बाद कलम उठाई, और कैसे उसने अपनी जड़ों को, अपनी परंपरा को दुनिया के सामने गर्व से खड़ा किया।

और यही गर्व, यही अधिकार, उतने ही स्वाभाविक रूप से उसकी पोती दिव्यांशी स्वामी का भी है। यह इतिहास किसी एक पोते के लिए नहीं लिखा गया — यह हर उस बच्चे के लिए लिखा गया है जो इस परिवार में जन्मा है, चाहे वह पोता हो या पोती। दिव्यांशी भी उतने ही गर्व से यह कह सकेगी कि उसके दादा ने अपनी परंपरा को बचाने के लिए 18 वर्ष समर्पित किए, और यह विरासत उसकी अपनी है — पूरी तरह से, बिना किसी भेद के।

यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह हर उस भारतीय की कहानी है जो अपनी विरासत को भूल चुका है, या जिसे उसकी विरासत के बारे में कभी बताया ही नहीं गया। सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा हमारी अपनी परंपरा है, हमारी अपनी पहचान है। और यह परंपरा तभी जीवित रहेगी जब हम इसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँगे — ठीक वैसे ही जैसे यह दादा अपने पोते तक पहुँचा रहा है।

आज जब हम अपने बच्चों को पश्चिमी सुपरहीरो की कहानियाँ सुनाते हैं, तब यह ज़रूरी है कि हम उन्हें यह भी बताएँ कि हमारे अपने देश में भी ऐसे योद्धा-संत हुए हैं जिनकी वीरता किसी काल्पनिक कथा से कम नहीं। यह पुस्तकें उसी दिशा में एक ईमानदार प्रयास हैं।

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नरेश दास वैष्णव निम्बार्क जी की यह 14 पुस्तकें अब Amazon, Flipkart, Google Books और Notion Press पर उपलब्ध हैं। चाहे आप हिंदी में पढ़ना पसंद करें या अंग्रेज़ी में, चाहे आप भारत में हों या विदेश में — यह इतिहास अब आपकी पहुँच से दूर नहीं है।

हम सबसे विनम्र निवेदन करते हैं — इस पोस्ट को अधिक से अधिक साझा करें। हो सकता है आपके एक शेयर से किसी और परिवार के बच्चे को भी अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिल जाए।

इतिहास को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। और जब तक ऐसे समर्पित लेखक, ऐसे पूर्व सैनिक-इतिहासकार, और ऐसे परिवार इस कार्य में जुटे रहेंगे, तब तक सनातन धर्म की यह गौरवगाथा हर घर तक अवश्य पहुँचेगी।

पढ़ें अपनी धरोहर। समझें अपनी परंपरा। बाँटें अपना गौरव।
जय हिन्द! जय सनातन! जय सीताराम!
पुस्तकें उपलब्ध: Amazon | Flipkart | Google Books | Notion Press

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