प्रमाण संख्या–56
राजा मोहगाँव और नांदगाँव बैरागी रियासत : ऐतिहासिक पहचान, परगना व्यवस्था और दस्तावेज़ी प्रमाण
शोधकर्ता: नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
परिचय: लेखक | शोधकर्ता | इतिहासकार
सेवा: सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना
वेबसाइट: https://www.nareshswaminimbark.in
1. शोध का उद्देश्य
वैष्णव बैरागी परंपरा का इतिहास केवल धार्मिक आख्यानों या मौखिक परंपराओं तक सीमित नहीं है। इस परंपरा से जुड़े महंतों, राजकीय पदों, भूमि-अनुदानों, परगनों और रियासतों के इतिहास को समझने के लिए सरकारी अभिलेखों, ऐतिहासिक गजेटियर, सनद, पट्टों और जनगणना पुस्तकों का अध्ययन आवश्यक है।
प्रमाण संख्या–56 का उद्देश्य राजा मोहगाँव से संबंधित ऐतिहासिक पहचान और नांदगाँव बैरागी रियासत के साथ उसके संबंधों की उपलब्ध दस्तावेज़ों के आधार पर जाँच करना है।
हमारा शोध-सिद्धांत है:
“दस्तावेज़ पहले बोलेंगे, उसके बाद हम लिखेंगे। झूठ को कभी सच नहीं बनाएँगे।”
2. ऐतिहासिक गजेटियर में नांदगाँव बैरागी रियासत
The Imperial Gazetteer of India, द्वितीय संस्करण, खंड 10, पृष्ठ 190 में नांदगाँव का विवरण दिया गया है। इस विवरण में नांदगाँव को मध्य प्रांत की एक अधीनस्थ रियासत (Feudatory Chiefship) के रूप में दर्ज किया गया है।
गजेटियर के अनुसार, नांदगाँव को मूल अनुदान 1723 में नागपुर के राजा के पारिवारिक पुरोहित को मिला था। बाद में 1765 और 1818 में उसके क्षेत्र में और विस्तार हुआ। इसी विवरण में नांदगाँव के मुखिया को बैरागी धार्मिक परंपरा से संबंधित बताया गया है।
यह विवरण नांदगाँव रियासत के इतिहास और उसके बैरागी संबंध को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
मूल पुस्तक का पृष्ठ खोलें:
The Imperial Gazetteer of India — खंड 10, पृष्ठ 190
3. मोहगाँव का उल्लेख : स्वतंत्र रियासत या परगना?
उसी गजेटियर में मोहगाँव के लिए ये शब्द दर्ज हैं:
“Mohgaon, about 50 miles to the north, a very fertile pargana…”
अर्थात मोहगाँव नांदगाँव से लगभग 50 मील उत्तर में स्थित एक उपजाऊ परगना था।
यह उल्लेख ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उपलब्ध गजेटियर मोहगाँव को नांदगाँव के परगनों में शामिल करता है। उद्धृत विवरण में मोहगाँव को अलग स्वतंत्र रियासत घोषित नहीं किया गया है।
मूल दस्तावेज़ यहाँ पढ़ें:
The Imperial Gazetteer — मोहगाँव और नांदगाँव का विवरण
इसलिए वर्तमान शोध में दो बातों का अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है:
दस्तावेज़ में दर्ज तथ्य: मोहगाँव का उल्लेख नांदगाँव के परगने के रूप में मिलता है।
अलग प्रमाण की आवश्यकता वाला दावा: मोहगाँव स्वयं एक स्वतंत्र बैरागी रियासत था।
किसी अन्य काल में मोहगाँव की स्वतंत्र राजकीय स्थिति रही हो, तो उसके समर्थन में उस काल की अलग सनद, पट्टा या समकालीन राजकीय अभिलेख आवश्यक होगा।
4. भारत की जनगणना 2011 : राजनांदगाँव जिला जनगणना पुस्तिका
Census of India 2011 — District Census Handbook, Rajnandgaon में नांदगाँव और छुईखदान के इतिहास से संबंधित विवरण उपलब्ध हैं।
इस सरकारी प्रकाशन के ऐतिहासिक विवरण में नांदगाँव के क्षेत्रीय विस्तार का उल्लेख मिलता है। भाग B में उपलब्ध विवरण के अनुसार, पांडादाह, नांदगाँव, मोहगाँव और डोंगरगाँव जैसे अधिग्रहित क्षेत्रों ने मिलकर 1865 में नांदगाँव की अधीनस्थ रियासत का स्वरूप बनाया।
इससे स्पष्ट होता है कि मोहगाँव का इतिहास नांदगाँव रियासत के क्षेत्रीय विकास के अध्ययन से जुड़ा हुआ है।
सरकारी पुस्तकें सीधे खोलें:
राजनांदगाँव जिला जनगणना पुस्तिका — Part XII-A PDF
राजनांदगाँव जिला जनगणना पुस्तिका — Part XII-B PDF
Part XII-A का सरकारी कैटलॉग
Part XII-B का सरकारी कैटलॉग
शोध करते समय पुस्तक में दिए गए मुद्रित पृष्ठ क्रमांक और PDF के पृष्ठ क्रमांक का अंतर ध्यान में रखें।
5. नांदगाँव की सनद और राजकीय अभिलेख
सी. यू. एचिसन द्वारा संकलित A Collection of Treaties, Engagements and Sanads के खंड II में नांदगाँव के मुखिया से संबंधित 20 मई 1865 की Adoption Sanad और 4 जनवरी 1866 के निष्ठा-संबंधी दस्तावेज़ का संदर्भ मिलता है।
यह स्रोत नांदगाँव के राजकीय इतिहास और ब्रिटिशकालीन प्रशासनिक संबंधों की जाँच के लिए उपयोगी है।
पूरी पुस्तक खोलें:
A Collection of Treaties, Engagements and Sanads — Volume II
यहाँ एक आवश्यक अंतर समझना चाहिए: नांदगाँव के मुखिया से संबंधित सनद का संदर्भ मिलना, मोहगाँव की स्वतंत्र रियासत के पक्ष में अलग सनद मिल जाने के समान नहीं है।
6. मूल सनद, पट्टा और पुराने भूमि-अभिलेखों की खोज
मोहगाँव की ऐतिहासिक स्थिति की आगे जाँच के लिए निम्न सरकारी पोर्टल उपयोगी हैं:
छत्तीसगढ़ राजस्व विभाग — मिसल रिकॉर्ड खोज
भारत का राष्ट्रीय अभिलेखागार — Abhilekh Patal
इन अभिलेखों में मोहगाँव, नांदगाँव, पुराने भूमि-अनुदान, बंदोबस्त, राजस्व अधिकार और संबंधित शासकों के नामों से खोज की जा सकती है। पुराने दस्तावेज़ों में नामों की वर्तनी अलग हो सकती है, इसलिए Mohgaon, Mohgaun और Nandgaon जैसे वैकल्पिक रूप भी उपयोगी हो सकते हैं।
7. ऐतिहासिक दावों की पुष्टि कैसे हो?
किसी स्थान को स्वतंत्र रियासत घोषित करने से पहले निम्न दस्तावेज़ विशेष रूप से उपयोगी होंगे:
मूल सनद या राजकीय पट्टा।
भूमि-अनुदान या राजस्व अधिकारों का अभिलेख।
स्वतंत्र शासक की मान्यता या नियुक्ति का दस्तावेज़।
समकालीन गजेटियर अथवा प्रशासनिक रिपोर्ट।
प्रमाणित वंशावली, जिसमें मूल पोथी, तिथि और पीढ़ियों का क्रम स्पष्ट हो।
पारिवारिक परंपरा, तस्वीर या मौखिक जानकारी शोध के लिए महत्त्वपूर्ण संकेत हो सकती है, लेकिन स्वतंत्र राजकीय शासन सिद्ध करने के लिए उन्हें ऐतिहासिक दस्तावेज़ों से मिलाना आवश्यक है।
8. शोध का निष्कर्ष
उपलब्ध ऐतिहासिक गजेटियर और राजनांदगाँव जिला जनगणना पुस्तिका से नांदगाँव बैरागी रियासत तथा उसके क्षेत्रीय विकास के संबंध में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। गजेटियर मोहगाँव को नांदगाँव के परगने के रूप में दर्ज करता है, जबकि जनगणना पुस्तिका नांदगाँव के क्षेत्रीय विस्तार में मोहगाँव का उल्लेख करती है।
अतः उपलब्ध उद्धृत दस्तावेज़ों के आधार पर मोहगाँव का नांदगाँव रियासत के परगने के रूप में उल्लेख समर्थित है। मोहगाँव को अलग स्वतंत्र बैरागी रियासत घोषित करने के लिए अभी पृथक राजकीय प्रमाण आवश्यक होगा।
यह निष्कर्ष जाँचे गए स्रोतों तक सीमित है। यदि किसी अन्य काल की मूल सनद, पट्टा या स्वतंत्र राजकीय अभिलेख सामने आता है, तो उसका परीक्षण कर शोध में संशोधन किया जा सकता है।
9. वैष्णव बैरागी इतिहास के प्रति हमारा दायित्व
वैष्णव बैरागी परंपरा का इतिहास श्रद्धा, सम्मान और दस्तावेज़ी प्रमाणों के आधार पर लिखा जाना चाहिए। ऐतिहासिक प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए अपुष्ट दावों को दोहराने की अपेक्षा मूल अभिलेखों को सामने लाना अधिक उपयोगी है।
इस शोध का उद्देश्य किसी व्यक्ति, परिवार या परंपरा का अपमान करना नहीं है। इसका उद्देश्य उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों और अप्रमाणित दावों के बीच अंतर स्पष्ट करना तथा भविष्य के शोधकर्ताओं के लिए प्रमाण-आधारित दिशा प्रस्तुत करना है।
शोधकर्ता:
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
लेखक | शोधकर्ता | इतिहासकार
सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना
https://www.nareshswaminimbark.in
शोध-सिद्धांत:
“दस्तावेज़ पहले बोलेंगे, उसके बाद हम लिखेंगे। झूठ को कभी सच नहीं बनाएँगे।”
जय श्री राधे-राधे। जय सीताराम।
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