**प्रमाण संख्या–45**
**क्या बैरागी परंपरा नई है? 1892 का ऐतिहासिक दस्तावेज़ सीतामाई के रामानंदी बैरागियों का प्रमाण देता है**
निमावत से निम्बार्क तक: पुराने दस्तावेज़ों में दर्ज बैरागी परंपराओं की ऐतिहासिक कड़ी
जय सीताराम।
सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा के इतिहास की खोज में इस बार 1892 के Karnal District Gazetteer के मूल पृष्ठों से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण सामने आया है।

**1. 1892: Karnal District Gazetteer, पृष्ठ 123**
Chapter III, The People, शीर्षक "Bairagia" के अंतर्गत तीन अलग-अलग बैरागी परंपराओं और उनसे जुड़े गाँवों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है:
> "The Nimawat Bairagis of Goli, Waisri, and Harsinghpur, the Rama Nandi Bairagis of Sita Mai and Bhandari, and the Radha Balabhi Bairagis of Barana and Matnauli own a good deal of land."
अर्थात:
- Nimawat Bairagis: Goli, Waisri और Harsinghpur
- Rama Nandi Bairagis: Sita Mai और Bhandari
- Radha Balabhi Bairagis: Barana और Matnauli
इसी अनुच्छेद में मठ (asthal), साधु (sadhu), शिष्य (chela) तथा गृहस्थ बैरागियों और उनके वंशजों का भी विवरण मिलता है।
**2. सीतामाई का सीधा प्रमाण**
सबसे महत्वपूर्ण शब्द हैं:
> "the Rama Nandi Bairagis of Sita Mai and Bhandari"
अर्थात 1892 के ऐतिहासिक जिला गजेटियर में सीतामाई के रामानंदी बैरागियों का स्पष्ट उल्लेख मौजूद था।
यहाँ हम इतना ही कहेंगे। इस पृष्ठ पर पूजा-पाठ की जिम्मेदारी का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, इसलिए वह बात इस प्रमाण में नहीं जोड़ेंगे।
**3. निमावत और निम्बार्क की महत्वपूर्ण कड़ी**
1892 के करनाल गजेटियर में मूल शब्द "Nimawat Bairagis" है।
हमारे पहले के शोध में William Crooke की पुस्तक The Tribes and Castes of the North-Western Provinces and Oudh में "Nîmâwat, or Nimbârak" का उल्लेख मिला था और उसे बैरागियों की प्रमुख परंपराओं में रखा गया है।
इसलिए दोनों स्रोतों को मिलाकर एक शोध-कड़ी सामने आती है:
Karnal Gazetteer (1892): "Nimawat Bairagis"
↓
Crooke: "Nîmâwat, or Nimbârak"
लेकिन निष्पक्षता के लिए स्पष्ट रहे कि 1892 के करनाल गजेटियर के पृष्ठ 123 पर "Nimbark" शब्द नहीं है। इसलिए वहाँ हम अपनी ओर से Nimbark नहीं लिख रहे। Crooke के स्वतंत्र स्रोत से उस नाम-संबंध को पुष्ट करने की कोशिश की जा रही है।
Crooke की पुस्तक आपने पहले ही मँगवा रखी है। मूल पुस्तक आने पर उसके पृष्ठ से इसका अंतिम सत्यापन किया जाएगा।
**4. 1842 का पुराना बैरागी मठ: पृष्ठ 164**
इसी 1892 Gazetteer में 1842 के पुराने रिकॉर्ड का उल्लेख मिलता है:
> "…the two villages of Goli and Waisri, which were assigned at a fixed demand to a Bairagia monastery in the former, and its branch in the latter village."
अर्थात Goli और Waisri दो गाँव एक Bairagia monastery और उसकी शाखा से जुड़े हुए दर्ज थे।
यहाँ भी हम कोई अतिरिक्त दावा नहीं करेंगे।
**5. 1709: Banda Bairagi: पृष्ठ 36–37**
इसी पुस्तक के इतिहास भाग में लिखा है:
> "In 1709 Banda Bairagi, some time the chosen disciple of Guru Govind, raised his standard in these parts…"
आगे Karnal क्षेत्र में उसकी गतिविधियों और उस समय की घटनाओं का वर्णन मिलता है।
इससे पता चलता है कि Bairagi नाम का ऐतिहासिक उल्लेख Karnal क्षेत्र के इतिहास में 18वीं शताब्दी तक जाता है।
**6. 1883: सीतामाई का प्राचीन Shrine**
D. C. J. Ibbetson की 1883 की Report on the Revision of Settlement of the Panipat Tahsil & Karnal Parganah of the Karnal District के पृष्ठ 226 में Sita Mai के पुराने shrine का ऐतिहासिक विवरण दर्ज है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण शोध-सावधानी है: 1883 के पृष्ठ 226 पर Bairagi या Ramanandi शब्द नहीं है।
इसलिए इसे हम केवल सीतामाई के प्राचीन धार्मिक स्थल का स्वतंत्र प्रमाण मानेंगे।
**चार ऐतिहासिक कड़ियाँ**
- 1709, Karnal Gazetteer, pp. 36–37: Banda Bairagi का Karnal क्षेत्र में ऐतिहासिक उल्लेख।
- 1842, Karnal Gazetteer, p. 164 में उद्धृत रिकॉर्ड: Goli और Waisri में Bairagia monastery तथा उसकी शाखा।
- 1883, Ibbetson, p. 226: Sita Mai के पुराने shrine का विवरण।
- 1892, Karnal Gazetteer, p. 123: Sita Mai के Rama Nandi Bairagis तथा Nimawat Bairagis सहित अलग-अलग बैरागी परंपराओं का उल्लेख।
**निष्कर्ष**
1892 के Karnal District Gazetteer में बैरागियों की अलग-अलग परंपराएँ उनके नाम और संबंधित गाँवों सहित दर्ज हैं। इनमें "Rama Nandi Bairagis of Sita Mai and Bhandari" का स्पष्ट उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
साथ ही "Nimawat Bairagis" का उल्लेख मिलता है, जिसकी "Nîmâwat, or Nimbârak" वाली कड़ी William Crooke के स्वतंत्र ऐतिहासिक स्रोत में मिलती है। Crooke की मूल पुस्तक आपके पास आने के बाद हम उसके पृष्ठ को भी मूल प्रति से मिलाएँगे।
हम किसी एक स्रोत की बात दूसरे स्रोत में डालकर नहीं लिखेंगे। जो 1892 में है, उसे 1892 का प्रमाण कहेंगे। जो Crooke में है, उसे Crooke का प्रमाण कहेंगे।
यही हमारी शोध-पद्धति है:
दस्तावेज़ पहले, निष्कर्ष बाद में।
जो सिद्ध है वही लिखा जाएगा। न बात बढ़ेगी, न घटेगी।
**स्रोत**
1. Karnal District Gazetteer, 1892, pp. 36–37, 123, 164
2. D. C. J. Ibbetson, Report on the Revision of Settlement of the Panipat Tahsil & Karnal Parganah of the Karnal District, 1872–1880, 1883, p. 226
3. William Crooke, The Tribes and Castes of the North-Western Provinces and Oudh, Nîmâwat / Nimbârak संबंध (मूल पुस्तक प्राप्त होने पर पृष्ठ से अंतिम सत्यापन)
**लेखक**
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना | इतिहासकार | शोधकर्ता | लेखक
www.nareshswaminimbark.in
जन्मस्थान: ग्राम रामनगर, गन्नौर, सोनीपत, हरियाणा।
शोध-सिद्धांत: "दस्तावेज़ पहले, निष्कर्ष बाद में। जो सिद्ध है वही लिखा जाएगा, न बात बढ़ाई जाएगी, न घटाई जाएगी।"
जय सीताराम। जय श्री राधे-राधे।
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