**जय श्री सीताराम!**
**‘प्रहुति’ — एक दादा ने अपनी 13 माह की पोती के लिए पूरी किताब लिख दी**
॥ जय श्री सीताराम ॥
॥ जय श्री राधे-राधे ॥
**क्या एक नन्ही-सी बच्ची किसी परिवार की पूरी दुनिया बदल सकती है?**
क्या एक दादा अपने जीवन के अनुभवों, संघर्षों, आस्था और हृदय में उमड़ते अथाह प्रेम को एक पुस्तक के रूप में अपनी पौत्री के नाम समर्पित कर सकता है?
जी हाँ! ऐसी ही भावनाओं से जन्मी है एक आत्मीय पुस्तक — **‘प्रहुति’।**
**‘प्रहुति’ — एक दादा के हृदय से निकली अपनी पौत्री के नाम प्रेमगाथा।**
पुस्तक के लेखक प्रमोद रामावत ‘प्रमोद’ ने अपनी मात्र 13 माह की पौत्री प्रहुति के लिए अपने जीवन की अनुभूतियों को शब्दों में पिरोया है। यह केवल एक बच्ची के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन के संघर्षों, आध्यात्मिक अनुभूतियों, पारिवारिक संबंधों और मानवीय संवेदनाओं की एक आत्मीय यात्रा है।
## आखिर ‘प्रहुति’ इतनी विशेष क्यों है?
लेखक अपने आत्मकथ्य में लिखते हैं—
*“उसके जन्म से पहले हम तीनों की दुनिया, बिना सीमाओं की दिशा विहीन अनन्त विस्तार वाली दुनिया थी, जो उसके जन्म के साथ ही उसे केन्द्र में रखकर बस उसके आस-पास की परिधि में सिमट आई है।”*
इन शब्दों में एक दादा के हृदय की वह अनुभूति छिपी है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं।
लेखक ने अपने जीवन में संन्यास के प्रति आकर्षण से लेकर संघर्षपूर्ण यात्राओं तक अनेक अनुभवों का सामना किया। जीवन के उतार-चढ़ाव ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया, लेकिन उनकी पौत्री प्रहुति के आगमन ने उनके भीतर सोई हुई कोमल भावनाओं को फिर से जीवंत कर दिया।
उनके अनुसार, प्रहुति के स्नेहिल स्पर्श से उनके बचपन के अहसास का वह हिस्सा भी लौट आया, जो उनकी चेतना में कहीं विलुप्त हो चुका था। एक नन्ही-सी बच्ची ने पूरे परिवार के जीवन को प्रेम और आत्मीयता के नए केंद्र से जोड़ दिया।
**यही ‘प्रहुति’ की आत्मा है — ऐसा प्रेम, जिसे केवल महसूस नहीं किया जाता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए शब्दों में सहेज भी लिया जाता है।**
## इस पुस्तक में पाठकों को क्या मिलेगा?
- जीवन के संघर्षों और अनुभवों का आत्मकथ्यात्मक चित्रण।
- एक दादा और पौत्री के बीच निष्कलुष स्नेह की अभिव्यक्ति।
- आस्था, आध्यात्मिकता और परम सत्ता के प्रति विश्वास की अनुभूतियाँ।
- परिवार, संस्कार और रिश्तों के बदलते अर्थों पर आत्मीय चिंतन।
- ऐसी भावनाएँ, जिनमें पाठक अपने जीवन और अपने प्रियजनों की झलक अनुभव कर सकते हैं।
## एक पुस्तक, जो आने वाले समय के लिए स्मृति बनेगी
लेखक की इच्छा है कि जब प्रहुति बड़ी होकर महाविद्यालय में पढ़ने जाए, जीवन में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त करे या अपने नए जीवन की शुरुआत करे, तब यह पुस्तक उसके हाथों में हो। तब वह इन पन्नों को पढ़कर अनुभव कर सके कि उसके दादाजी ने उसे कितना प्यार किया था।
यह पुस्तक एक दादा की ओर से अपनी पौत्री को दिया जाने वाला ऐसा उपहार है, जिसकी वास्तविक कीमत रुपयों में नहीं, बल्कि उसमें संजोए गए प्रेम और संवेदनाओं में है।
**‘प्रहुति’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक दादा के हृदय की भावनाओं का दस्तावेज़ और अपनी पौत्री के लिए प्रेम की अमूल्य धरोहर है।**
## पुस्तक शीघ्र प्रकाशित होगी
**लेखक: प्रमोद रामावत ‘प्रमोद’**
पुस्तक के मूल रचनाकार, जिन्होंने अपने जीवन के अनुभवों, पारिवारिक संवेदनाओं और अपनी पौत्री के प्रति प्रेम को आत्मकथ्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।
**संपादक: नरेश दास वैष्णव निम्बार्क**
पुस्तक की भाषा, अभिव्यक्ति, साहित्यिक प्रवाह और प्रस्तुति को बेहतर बनाने की संपादकीय जिम्मेदारी निभाते हुए, लेखक की मूल भावनाओं एवं रचनात्मक दृष्टि को यथासंभव सुरक्षित रखना संपादन का उद्देश्य है।
**ई-पुस्तक निःशुल्क उपलब्ध कराने की योजना है**, ताकि यह रचना अधिकाधिक पाठकों तक पहुँच सके।
प्रस्तावित मंच: Google Books | Pothi.com | Internet Archive | Zenodo | Academia.edu | Scribd
पेपरबैक एवं हार्ड केस संस्करण सशुल्क उपलब्ध रहेंगे। प्रकाशन और उपलब्धता की जानकारी समयानुसार साझा की जाएगी।
## अब आपसे एक सवाल
यदि आपको अपने जीवन की सबसे अनमोल स्मृति को एक पुस्तक में सहेजने का अवसर मिले, तो आप वह पुस्तक किसके नाम समर्पित करेंगे — अपने माता-पिता, जीवनसाथी, संतान या पोते-पोती के?
अपने विचार टिप्पणी में अवश्य लिखिए।
इस पोस्ट को अपने परिवार, मित्रों और साहित्य-प्रेमियों तक पहुँचाइए। संभव है, आपके साझा करने से किसी परिवार में प्रेम और संवेदनाओं की एक नई कहानी जन्म ले।
**‘प्रहुति’ — एक दादा का प्रेम, एक परिवार की भावनाएँ और आने वाली पीढ़ी के लिए सहेजी गई अनमोल स्मृति।**
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**नरेश दास वैष्णव निम्बार्क**
लेखक | शोधकर्ता | इतिहासकार
**जन्मस्थान:** ग्राम रामनगर, गन्नौर, सोनीपत, हरियाणा।
**वेबसाइट:** www.nareshswaminimbark.in
॥ जय श्री सीताराम ॥
॥ जय श्री राधे-राधे ॥
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