रामनगर गन्नौर से लेबनान तक — सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा की यात्रा
'बंदूक से कलम तक' शृंखला में 'अखाड़े से शहादत तक' — शहीद संजय कुमार वैष्णव की अमर गाथा
प्रारंभिक जीवन: जोनमाना की माटी का लाल
उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद की उर्वर माटी ने समय-समय पर ऐसे वीरों को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी रगों में बहते रक्त से इतिहास की धारा बदली है। इसी जनपद के ग्राम जोनमाना में सन् 1971 में एक ऐसे ही जांबाज़ का उदय हुआ, जिन्हें दुनिया संजय कुमार वैष्णव टीलावत के नाम से जानती है। एक प्रतिष्ठित आयुर्वेदिक एवं एलोपैथिक चिकित्सक श्री श्याम दास वैष्णव और ममतामयी माता श्रीमती ओमवती देवी के आँगन में जन्मे संजय जी का बचपन सामान्य बालकों जैसा नहीं था। मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में, जहाँ बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, संजय ने अखाड़े की धूल को माथे से लगाकर पहलवानी के गुर सीखना प्रारंभ कर दिया था। उनके शरीर की स्फूर्ति और भुजाओं का बल देख क्षेत्र के लोग जान गए थे कि यह बालक एक दिन कुल का नाम रोशन करेगा।
ऐतिहासिक दंगल: जब दिग्गज ने टेके घुटने
संजय कुमार वैष्णव की वीरता और दांव-पेंच का एक किस्सा आज भी जोनमाना की चौपालों पर बड़े चाव से सुनाया जाता है। गाँव में आयोजित एक विशाल दंगल में हरियाणा के एक अति-प्रतिष्ठित और नामी पहलवान से उनका मुकाबला हुआ। अखाड़े में चारों तरफ प्रतिद्वंद्वी का खौफ था, किंतु संजय की आँखों में विजय का अटूट विश्वास था। अपनी चपलता और तकनीकी श्रेष्ठता का परिचय देते हुए उन्होंने 'निकाल वाला दांव' लगाया और पलक झपकते ही उस दिग्गज पहलवान को आसमान दिखा दिया। वह विजय केवल संजय की नहीं, पूरे गाँव के गौरव की विजय थी। उस शाम ग्रामीणों ने उन्हें घोड़ी पर बैठाकर, गाजे-बाजे के साथ पूरे गाँव में घुमाया; वह दृश्य आज भी बुजुर्गों की आँखों में सजीव है।
सैन्य सेवा और सर्वोच्च बलिदान
अखाड़े के उसी जज़्बे और अनुशासन ने उन्हें मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रेरित किया। सन् 1987 में मेरठ की भर्ती रैली में उनकी प्रतिभा और शौर्य को देखते हुए उनका चयन सेना की प्रतिष्ठित 'नाइन पैरा' (9 Para) यूनिट में हुआ। आगरा के पैरा ट्रेनिंग स्कूल में कठोर प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, सन् 1989 में उनकी तैनाती बेंगलुरु में हुई। एक समर्पित सैनिक के रूप में वे कर्तव्य पथ पर अडिग रहे। किंतु नियति का विधान कुछ और ही था; अपनी ड्यूटी के दौरान परेड करते समय वे वीरगति को प्राप्त हुए। जिस जवान ने अखाड़े में बड़े-बड़े योद्धाओं को हराया था, वह भारत माता की गोद में चिरनिद्रा में सो गया।
त्याग और अमिट विरासत
शहीद संजय कुमार वैष्णव अपने पाँच भाइयों (अजय कुमार, वैष्णव देव, वैष्णव प्रदीप, वैष्णव और सहदेव) में सबसे ज्येष्ठ थे। उनके बलिदान के बाद, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रेखा वैष्णव (निवासी भैंसवाल, शामली) ने बड़े धैर्य और गरिमा के साथ उनके गौरव को संजोया। यद्यपि उनकी कोई संतान नहीं हुई, किंतु आज पूरा जोनमाना गाँव उन्हें अपनी संतान मानकर पूजता है। उनके पूज्य पिता का स्वर्गवास भी लगभग 33 वर्ष पूर्व हो गया था, और पत्नी रेखा वैष्णव जी भी सन् 2019 में अनंत यात्रा पर प्रस्थान कर गईं, किंतु इस परिवार का त्याग इतिहास में अमर हो गया।
अपने वीर सपूत की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए ग्राम जोनमाना में उनकी एक भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। यह प्रतिमा केवल पाषाण खंड नहीं, बल्कि उस साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति की गवाह है जो संजय कुमार वैष्णव ने जी थी — आने वाली पीढ़ियों के लिए एक 'जीवंत पाठशाला', जो सदैव यह संदेश देती रहेगी कि मातृभूमि की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है।
पूरी गाथा पढ़ें — "यात्रा: बंदूक से कलम तक" (अध्याय 30, पृष्ठ 80-82)
लेखक: नरेश दास वैष्णव 'निम्बार्क' (लेखक, पत्रकार, शोधकर्ता एवं पूर्व सैनिक — 18 पुस्तकें, 190 देशों में उपलब्ध)
www.nareshswaminimbark.in
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