वीर बंदा बैरागी : 356 वर्षों का अनसुना सत्य एक सैनिक-इतिहासकार की 18 वर्षों की शोध यात्रा

वीर बंदा बैरागी पर 356 वर्षों का अनसुना सत्य। सेवानिवृत्त सैनिक-इतिहासकार नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की 18 वर्षों की शोध यात्रा। मुगल अभिलेख, ब्रिटिश दस्तावेज़ और सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा के प्रामाणिक तथ्यों पर आधारित भारत की 14वीं पुस्तक।

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वीर बंदा बैरागी : 356 वर्षों का अनसुना सत्य
एक सैनिक-इतिहासकार की 18 वर्षों की शोध यात्रा
— नरेश दास वैष्णव निम्बार्क | 9 जून 2026 | 310वाँ बलिदान दिवस

घोषणा — 7 जून 2026, ग्राम लूम्ब
7 जून 2026 को ग्राम लूम्ब, तहसील बड़ौत, जिला बागपत, उत्तर प्रदेश में 310वें बलिदान दिवस के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में मैंने घोषणा की थी कि यह पुस्तक लिखी जाएगी। और 9 जून 2026 को — वीर बंदा बैरागी के बलिदान दिवस पर — मैंने कलम उठा ली।
यह मेरी 14वीं पुस्तक है। परन्तु यह किसी भी पुस्तक से भिन्न है। क्योंकि इसमें 356 वर्षों का वह इतिहास है जो अब तक किसी पुस्तक में नहीं आया।

356 वर्षों से दबा हुआ प्रश्न
राजपूत कहते हैं — वे हमारे थे। बैरागी कहते हैं — वे हमारे थे। सरदार कहते हैं — वे हमारे थे। और इसीलिए 356 वर्षों से उनका सच्चा इतिहास दबा हुआ है।
3 नवम्बर 1709 को सोनीपत का मुगल खजाना लूटकर पूरा धन सैनिकों में बाँट देने वाला — जो अपने लिए एक कौड़ी नहीं रखता — वह किसी एक जाति का कैसे हो सकता है? वह सनातन के सच्चे सेवक थे। उन्हें किसी एक जाति से बाँधना उनके साथ अन्याय होगा।
"एक हाथ में माला — दूसरे हाथ में भाला। वह किसी एक के नहीं थे — वह सनातन के वीर योद्धा थे।"

यह पुस्तक क्यों भिन्न है
इस पुस्तक में एक भी बनावटी बात नहीं है। जो सिद्ध नहीं — वह नहीं लिखा। जो Google पर है, सरकारी दस्तावेज में है, ब्रिटिश अभिलेखों में है — वही लिखा।
ब्रिटिश अधिकारी John Surman और Edward Stephenson का 10 मार्च 1716 का सरकारी पत्र — जो Madras Diary and Consultation Book 1715-1719 में दर्ज है — लिखता है कि एक भी व्यक्ति ने अपना धर्म नहीं त्यागा। यह दुश्मन की कलम से लिखा सत्य है।
मुगल इतिहासकार खाफी खान ने अपनी 'मुंतखाब-उल-लुबाब' में उन्हें 'बागी बैरागी' कहा। हरियाणा सरकार ने 26 दिसम्बर 2024 की आधिकारिक अधिसूचना में 9 जून को 'वीर बंदा बैरागी बलिदान दिवस' घोषित किया।
1935 से पहले गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 'बंदी वीर' लिखा, वीर सावरकर ने 'अमर मृत' लिखा, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने हिन्दी में लिखा। किसी ने उन्हें 'Singh Bahadur' नहीं कहा।

18 वर्षों की शोध यात्रा
यह पुस्तक किसी पुस्तकालय में बैठकर नहीं लिखी गई। 18 वर्षों तक मैं उन स्थानों पर गया जहाँ बंदा बैरागी लड़े, जहाँ उन्होंने तपस्या की, जहाँ उनके साथियों ने बलिदान दिया।
रेआसी गया — जहाँ उनके वंशज आज भी हैं। छप्पर चिड़िया गया — जहाँ मुगलों की अजेयता का भ्रम टूटा। सरहिंद गया — जहाँ न्याय हुआ। लोहगढ़ गया — जो उनकी राजधानी थी। नान्देड़ गया — जहाँ गोदावरी के किनारे उन्होंने वर्षों तपस्या की।
और 1988 एवं 1994 में जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना में तैनाती के दौरान अखनूर में चिनाब नदी के किनारे मैंने स्वयं अपनी आँखों से 'बंदा बैरागी मंदिर' देखा — जिसमें राम दरबार था, राधा-कृष्ण की मूर्तियाँ थीं और 'बांदा मेरा' लिखा हुआ था। 9 जून 2026 को नगर पालिका अखनूर ने पुष्टि की कि वह मंदिर आज भी विद्यमान है।

एक सैनिक का प्रण
24 वर्ष देश की सेवा में बंदूक उठाए रहा। संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में विदेश भी गया। जब बंदूक रखी — तो कलम उठानी पड़ी। क्योंकि जब मैंने देखा कि राम जन्मभूमि की रक्षा में 500 वर्षों तक लड़ने वाले हजारों बैरागी साधुओं का कहीं कोई नाम नहीं — तब मन में एक बेचैनी जन्मी जो आज तक शांत नहीं हुई।
बुढ़ापे में न प्रसिद्धि की चाह है, न धन की इच्छा। केवल यह सोचता हूँ कि जब मैं नहीं रहूँगा — तो यह पुस्तक रहेगी। और वे अनाम शहीद — जिनके पीछे नाम लेने वाला कोई नहीं था — इतिहास में अमर हो जाएंगे।
"जो इतिहास सत्ता नहीं सुनती — वह जनता सुनती है।"

जय श्री राधे-कृष्ण
जय सनातन | जय भारत

— नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
भारतीय सेना (से.नि. नायब सूबेदार) | UN Peacekeeper
सनातन वैष्णव बैरागी इतिहासकार

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