वीर बंदा बैरागी 310वाँ शहीदी दिवस — लूम्ब बागपत 2026 में 9 पुस्तकों का लोकार्पण

7 जून 2026 को ग्राम लूम्ब, तहसील बड़ौत, जिला बागपत में वीर बंदा बैरागी का 310वाँ शहीदी दिवस मनाया गया। पूर्व नायब सूबेदार एवं अन्तर्राष्ट्रीय लेखक नरेश दास वैष्णव निम्बार्क की 9 पुस्तकों का लोकार्पण। 6 राज्यों से 700 से अधिक श्रद्धालु उपस्थित।

वीर बंदा बैरागी4 min read

जब मुख्य अतिथि ने खुद उठाई पुस्तकें — और आँखों में आ गए आँसू
वीर बंदा बैरागी 310वाँ शहीदी दिवस | लूम्ब, बागपत | 7 जून 2026
7 जून 2026 का वह रविवार ग्राम लूम्ब, तहसील बड़ौत, जिला बागपत के इतिहास में सदा के लिए अंकित हो गया। वीर बंदा बैरागी चतुःसम्प्रदाय स्वामी समाज की जिला कार्यकारिणी बागपत के तत्वावधान में महायोद्धा वीर बंदा बैरागी का 310वाँ शहीदी दिवस अत्यन्त भव्यता एवं श्रद्धा के साथ मनाया गया। हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, चण्डीगढ़, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड से 700 से अधिक संत, विद्वान, समाजसेवी एवं श्रद्धालु एकत्रित हुए।

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च पर पूर्व विधायक सहेंद्र सिंह चौहान, छपरौली सहित अनेक गणमान्य अतिथि विराजमान थे। किन्तु उस दिन की सबसे हृदयस्पर्शी घटना मंच पर नहीं, बल्कि मंच के ठीक सामने घटी।
वह क्षण जो सबके मन में बस गया
मुख्य अतिथि की कुर्सी पर बैठते ही उनके मन में एक सहज विचार आया — "210 पुस्तकें लाया हूँ जो मेधावी बच्चों को निःशुल्क देनी हैं। खाली टेबल पर रख देता हूँ।" वे कुर्सी से उठे और स्वयं पुस्तकें उठाकर रखने लगे।
तभी कार्यक्रम के समन्वयक श्री आर.डी. उपाध्याय आगे आए और धीरे से बोले — "श्रीमान, आप आज मुख्य अतिथि हैं। प्रोटोकॉल को समझें। किसी बच्चे से रखवा देता हूँ — आप कृपया विराजें।"
वे रुक गए। आँखें झुक गईं। मन में एक ही प्रश्न उठा — क्या सच में मैं इस काबिल हूँ?
यह थे भारतीय सेना के पूर्व नायब सूबेदार, अन्तर्राष्ट्रीय लेखक एवं शोधकर्ता नरेश दास वैष्णव निम्बार्क — जो 24 वर्ष सीमा पर देश की रक्षा करने के पश्चात् 18 वर्षों से सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा के इतिहास को पुनर्जीवित करने में समर्पित हैं।


जब शॉल कंधे पर पड़ी और हाथ काँप उठे
कार्यक्रम के प्रमुख सूत्रधार एवं जिलाध्यक्ष ठेकेदार सत्यप्रकाश वैष्णव जी ने जब अपने हाथों से शॉल उनके कंधों पर रखी, तो जिस हाथ में स्मृति चिह्न था — वह काँपने लगा। आँखों में आँसू आ गए। खुशी के, कृतज्ञता के, अविश्वास के।
मन में एक ही विचार था — दूसरे प्रदेश में, जहाँ लोग मुझे जानते भी नहीं, इतना बड़ा सम्मान? यह मैंने जीवन में कभी सोचा भी नहीं था।
एक साधारण किसान परिवार में जन्मे इस पूर्व सैनिक की पेंशन जब 2008 में सेवानिवृत्ति हुई तो मात्र 3,529 रुपये मासिक थी। आज वे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले लेखक एवं शोधकर्ता हैं।
18 वर्षों की वह तपस्या
यह सम्मान एक दिन में नहीं आया। इसके पीछे है 18 वर्षों की अथक साधना। मारुति वैगनर लगभग 5 लाख किलोमीटर चली। टाटा नेक्सन अब तक 85,000 किलोमीटर। पैदल यात्रा, हवाई यात्रा, समुद्री जहाज — 7 देशों की यात्रा। संयुक्त राष्ट्र में सहभागिता। और इस सबके फलस्वरूप Amazon पर 11, Google Books पर 13 तथा Notion Press पर 5 पुस्तकें आज विश्व के पाठकों तक पहुँच रही हैं।
9 पुस्तकों का भव्य लोकार्पण
इस पावन अवसर पर उनकी 9 पुस्तकों का भव्य लोकार्पण सम्पन्न हुआ —
1. Jagatguru Nimbarkacharyaji: Sanatan Ke Surya
2. रामनगर: 422 वर्षों का अनसुना इतिहास
3. Ramnagar: 422 Years of Untold History
4. यात्रा बन्दूक से कलम तक
5. महन्त बने महाराजा
6. Nimbark Sampraday: Sanatan Vaishnav Bairagi Tradition
7. Sanatan Vaishnav Bairagi: Forgotten Warriors and Soldiers
8. Jagatguru Nimbarkacharya (Notion Press)
9. VBK Preview — Nimbark Bairagi Raja
साथ ही 31,000 रुपये मूल्य की 210 पुस्तकें मेधावी बच्चों को निःशुल्क भेंट की गईं।
तीन अखबारों ने किया इतिहास अंकित
अगले दिन धारा न्यूज़, जनवाणी एवं समाज जागरण — तीनों प्रमुख समाचारपत्रों ने इस ऐतिहासिक कार्यक्रम को अपने पृष्ठों पर स्थान दिया।
धारा न्यूज़ — "लूम्ब में वीर बन्दा बैरागी की शहादत को सलाम — वैष्णव समाज ने प्रतिभाओं को किया सम्मानित"
जनवाणी — "प्रतिभाओं को किया सम्मानित — वीर बन्दा बैरागी के शहादत दिवस पर वैष्णव समाज सम्मेलन का आयोजन"
समाज जागरण — "शिक्षा और संस्कार से ही बनेगा विकसित भारत"
तीन अखबार। एक सन्देश। एक पूर्व फौजी की निःस्वार्थ साधना को समाज का सलाम।
हृदय की बात
मुख्य अतिथि ने मंच से कहा — "यह सम्मान मेरा नहीं है। यह सम्मान है सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा का। यह सम्मान है वीर बंदा बैरागी के उन बलिदानों का। यह सम्मान है उन माता-पिता का जिन्होंने गरीबी में भी संस्कार दिए। परमात्मा से यही दुआ है — हे प्रभु, इतना धन मत देना कि मैं तुम्हें ही भूल जाऊँ।"
लूम्ब की वह धरती उस दिन धन्य हो गई। वह मंच धन्य हुआ। वह शॉल धन्य हुई। और वे आँसू — जो एक पूर्व फौजी की आँखों से छलके — वे इतिहास के पन्नों पर सदा के लिए अंकित हो गए।
जय वीर बंदा बैरागी
जय श्री सीताराम | राधे राधे
जय हिन्द | जय भारत
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
पूर्व नायब सूबेदार, भारतीय सेना | अन्तर्राष्ट्रीय लेखक एवं शोधकर्ता
www.nareshswaminimbark.in

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