"वैष्णव बैरागी सेना का जन्म कब हुआ? — रामानंदाचार्य से बालानंदाचार्य तक 18 अखाड़ों की अनकही कहानी (प्रमाण–22)"

संवत् 1536 में अनुभवानंदाचार्य से लेकर बालानंदाचार्य तक — वैष्णव बैरागी सेना, अणी-अखाड़ा व्यवस्था और 18 उप-अखाड़ों के संगठन की प्रमाण-आधारित कहानी। जानें रामजन्मभूमि से इसका ऐतिहासिक जुड़ाव।

वैष्णव बैरागी सेना एवं इतिहास4 min read

**प्रमाण–22**

**रामानंदाचार्य से बालानंदाचार्य तक वैष्णव बैरागी अखाड़ों के संगठन की अनकही कहानी**

भारतीय धार्मिक इतिहास में वैष्णव बैरागी परंपरा केवल भक्ति और साधना की परंपरा नहीं है। उपलब्ध सामग्री में इसके साथ धर्मरक्षा, संगठन, अनुशासन, शस्त्र-विद्या, अणी और अखाड़ा व्यवस्था का भी उल्लेख मिलता है।

Article image

लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न है—

वैष्णव बैरागी सेना का जन्म कब हुआ?

इसका उत्तर किसी एक इतिहासकार के मत से नहीं, बल्कि उपलब्ध स्रोतों में दर्ज घटनाओं को क्रम से देखने पर ही समझ में आता है।

हमारे पास उपलब्ध 'चतुःसम्प्रदायदिग्दर्शन' में इस परंपरा से जुड़े अनेक आचार्यों और घटनाओं का उल्लेख है।

PDF की टाइमलाइन के अनुसार संवत् 1535 में श्रीभावानन्दाचार्य के साकेत-प्रयाण के बाद उनके गुरु के गढ़मुक्तेश्वर छोड़कर तीर्थयात्रा पर जाने तथा साधुओं, तांत्रिकों, विद्वानों और सिद्धों से संबंधित घटनाओं का वर्णन मिलता है।

इसके अगले ही वर्ष—

**संवत् 1536**

श्रीअनुभवानन्दाचार्य द्वारा कुछ नवयुवक संतों को राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए प्रेरित करने तथा उन्हें अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देकर संगठित करने का उल्लेख मिलता है।

यही हमारे शोध का अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है।

अर्थात उपलब्ध PDF के अनुसार वैष्णव बैरागी सेना के गठन का उल्लेख अनुभवानन्दाचार्य के समय से मिलता है।

इसके बाद आचार्य-परंपरा में श्रीकमलानन्दाचार्य, श्रीविमलानन्दाचार्य, श्रीरामसुरीनन्दाचार्य, श्रीविचित्रानन्दाचार्य, श्रीविठ्ठलानन्दाचार्य, श्रीविट्ठलमानन्दाचार्य और श्रीब्रह्मानन्दाचार्य जैसे नाम सामने आते हैं।

PDF में संवत् 1610 के आसपास विमलानन्दाचार्य के समय वैष्णव साधुओं और दर्शनियों के युद्ध का उल्लेख है। आगे विभिन्न कालखंडों में वैष्णव बैरागियों और अन्य साधु-समूहों के संघर्षों का भी वर्णन मिलता है।

PDF में संवत् 1662, ईस्वी 1760, 1772 और 1807 जैसी तिथियों से जुड़ी संघर्ष की घटनाएँ भी वर्णित हैं। इनमें मृतकों की संख्याओं के संबंध में बड़े दावे किए गए हैं। इन संख्याओं को हम स्वतंत्र ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि PDF में वर्णित विवरण के रूप में ही प्रस्तुत करेंगे।

---

**फिर आया बालानंदाचार्य का महत्वपूर्ण काल**

PDF में श्रीबालानन्दाचार्य का जन्म संवत् 1710, गंगा तट स्थित गढ़मुक्तेश्वर में पं. श्रीबालेश्वर मिश्र के घर बताया गया है।

आगे संवत् 1729 को एक अत्यंत महत्वपूर्ण संगठनात्मक पड़ाव के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

**संवत् 1729**

श्रीबालानन्दाचार्य की अध्यक्षता में चतु:सम्प्रदाय के वैष्णवों की 52 द्वार/गद्दियों को मान्यता देने तथा आगे अणी-अखाड़ों के गठन का उल्लेख मिलता है।

PDF में अणी के अर्थ को "सेना" बताया गया है और बालानन्दाचार्य द्वारा वैष्णवों की रक्षा के लिए अणी को संगठित एवं विभाजित करने का वर्णन मिलता है।

तीन प्रमुख अणियाँ बताई गई हैं—

दिगंबर • निर्मोही • निर्वाणी

और यही आगे वैष्णव बैरागी अखाड़ा व्यवस्था का महत्वपूर्ण संगठनात्मक स्वरूप बनता दिखाई देता है।

---

**3 मुख्य अखाड़े और 18 उप-अखाड़े**

हमारे प्रमाण-अध्ययन में तीन मुख्य अखाड़ों के अंतर्गत—

निर्मोही — 7 उप-अखाड़े

निर्वाणी — 9 उप-अखाड़े

दिगंबर — 2 उप-अखाड़े

अर्थात—

7 + 9 + 2 = 18 उप-अखाड़े

PDF में इन अखाड़ों के नामों का विस्तृत विवरण भी दिया गया है। निर्वाणी अणी के अंतर्गत सात अखाड़ों की सूची तथा निर्मोही अणी के अंतर्गत नौ अखाड़ों की सूची अलग-अलग दी गई है।

यहाँ एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है—"सात अखाड़े" और "18 उप-अखाड़े" एक ही बात नहीं हैं। हमारे अध्ययन में तीन मुख्य अखाड़ों के अंतर्गत कुल 18 उप-अखाड़ों की संरचना सामने आती है।

---

**संगठन का उद्देश्य क्या था?**

PDF में वैष्णव बैरागी अखाड़ों के साधुओं के कर्तव्यों में धर्म की रक्षा, मठ-मंदिरों की सुरक्षा, वैष्णव साधुओं की रक्षा, नियमों का पालन तथा शस्त्र एवं शास्त्र की विद्या में दक्षता जैसे विषयों का उल्लेख है।

अर्थात उपलब्ध स्रोत में यह संगठन केवल शस्त्रधारण तक सीमित नहीं बताया गया, बल्कि धार्मिक और संगठनात्मक अनुशासन से भी जोड़ा गया है।

---

**आगे की यात्रा**

PDF में आगे संवत् 1746 नासिक सिंहस्थ, संवत् 1770 रामकुण्ड स्नान, संवत् 1774–1802 श्रीविरजानन्दाचार्य, संवत् 1800 जयपुर प्रवास, संवत् 1808 बालानन्दजी को उत्तराधिकारी बनाए जाने, और संवत् 1809 श्रीविरजानन्दाचार्य के साकेतवास जैसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है।

इसके बाद संवत् 1837 में बालानन्द परंपरा से संबंधित ग्रंथ का उल्लेख तथा 1907 और 1925 अयोध्या से संबंधित सामग्री भी सामने आती है।

विशेष रूप से 1925 के अखिल भारतीय श्रीवैष्णव सम्मेलन, अयोध्या का उल्लेख हमारे आगे के शोध के लिए महत्वपूर्ण है।

---

**अब सबसे बड़ा प्रश्न—रामजन्मभूमि**

यहाँ हमारी शोध यात्रा समाप्त नहीं होती, बल्कि यहीं से अगला प्रश्न शुरू होता है।

निर्मोही, निर्वाणी और दिगंबर—इन तीन मुख्य वैष्णव बैरागी अखाड़ों का रामजन्मभूमि की रक्षा में वास्तविक योगदान क्या रहा?

किसने संघर्ष किया?

कब किया?

किसके नेतृत्व में किया?

और न्यायालयीन अभिलेखों में उसका क्या प्रमाण मिलता है?

इन प्रश्नों का उत्तर हम अनुमान से नहीं देंगे।

किसी इतिहासकार की बात को अंतिम प्रमाण नहीं मानेंगे।
किसी ग्रंथ के वर्णन को उसी ग्रंथ का वर्णन कहेंगे।
न्यायालयीन दावे को दावा और न्यायालय के निष्कर्ष को निष्कर्ष ही कहेंगे।

जहाँ स्वतंत्र प्रमाण नहीं मिलेगा, वहाँ साफ लिखा जाएगा—

"उपलब्ध प्रमाणों से इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती।"

क्योंकि हमारा उद्देश्य किसी को बड़ा या छोटा करना नहीं है।

हमारा उद्देश्य है—प्रमाणों के आधार पर वैष्णव बैरागी इतिहास को सामने रखना।

शोध जारी है… प्रमाण जुड़ते जाएँगे, इतिहास की कड़ियाँ स्पष्ट होती जाएँगी।

नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार, भारतीय सेना | इतिहासकार | शोधकर्ता | लेखक

www.nareshswaminimbark.in

जय हिंद • जय भारत
जय श्री राधे राधे

Internal linking suggestions
Related posts