निम्बार्क संप्रदाय का वह भुला हुआ अध्याय: हरिव्यासदेवाचार्य के ज्येष्ठ शिष्य स्वभूरामदेवाचार्य की अटूट गुरु-परंपरा
बुढ़िया बनी — एक भूली हुई भूमि, एक जीवित सत्य
हरियाणा के यमुनानगर जनपद में, जगाधरी नगर से मात्र तीन किलोमीटर उत्तर, यमुना नदी के तट पर एक छोटा-सा ग्राम है — बुढ़िया बनी। आज यहाँ की भूमि उपेक्षित है, समाधि जर्जर है, स्थानीय लोगों को भी शायद स्मरण नहीं कि यह भूमि किसी साधारण संत की नहीं, अपितु निम्बार्क संप्रदाय के जगद्गुरु हरिव्यासदेवाचार्य के आशीर्वाद से जन्मे उनके ज्येष्ठ एवं परम शिष्य — स्वामी स्वभूरामदेवाचार्य — की जन्मभूमि, कर्मभूमि तथा समाधि-स्थल है।
कथा अत्यंत मार्मिक है। स्वभूरामदेवाचार्य के माता-पिता निःसंतान थे। एक बार सूर्यग्रहण के पावन पर्व पर वे कुरुक्षेत्र गए, जहाँ संयोगवश स्वयं हरिव्यासदेवाचार्यजी अपनी शिष्य-मंडली सहित विराजमान थे। दंपति ने विनयपूर्वक पुत्र-प्राप्ति की प्रार्थना की। आचार्यवर्य ने आशीर्वाद दिया कि उन्हें एक प्रतापी पुत्र प्राप्त होगा, जो नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए उनके पश्चात् अनादि संप्रदाय का प्रचारक बनेगा। इसी दिव्य आशीर्वाद के फलस्वरूप स्वभूरामदेवाचार्य का जन्म हुआ। आठ वर्ष की अवस्था में माता-पिता उन्हें लेकर धुवटीला, मथुरा में हरिव्यासदेवाचार्यजी के पास पहुँचे, जहाँ विधिपूर्वक उपनयन-संस्कार तथा वैष्णवी दीक्षा संपन्न हुई। यह तथ्य अब केवल हिंदी स्रोतों में नहीं, अपितु अंग्रेज़ी विकिपीडिया पर भी शब्दशः दर्ज है — फिर भी हरियाणा के अपने ही लोग इससे अनभिज्ञ हैं।
बाल्यकाल की तपस्या और कनफटे नाथों से संघर्ष
बाल्यावस्था में पढ़ाई में असावधान रहने पर पिता ने कठोर भर्त्सना की। व्याकुल होकर बालक ने रात्रि में भगवान श्री सर्वेश्वर से प्रार्थना की, और दैवी कृपा से अल्पकाल में ही संपूर्ण पाणिनीय व्याकरण-शास्त्र कंठस्थ हो गया। वृद्धावस्था के निकट पहुँचने पर स्वयं हरिव्यासदेवाचार्यजी ने प्रसन्न होकर श्रीसर्वेश्वरजी की सेवा का भार इन्हीं को सौंप दिया।
गुरु-आज्ञा से स्वभूरामदेवाचार्यजी अपनी जन्मभूमि लौटे और वहाँ “वनी” में आश्रम स्थापित कर निवास करने लगे। लोक-समुदाय बड़ी संख्या में उनके पास आकर वैष्णवी दीक्षा ग्रहण करने लगा। यह देखकर उस क्षेत्र में प्रभुत्व रखने वाले कनफटे नाथ योगी तथा दस-नामी गुसाईं ईर्ष्यावश उग्र हो उठे और गुप्त-प्रकट रूप से उपद्रव करने लगे। एक रात्रि उन्होंने आश्रम की कुटी में अग्नि लगा दी और भयंकर हुड़दंग मचाया। स्वभूरामदेवाचार्यजी ने कुटी से बाहर आकर भगवान श्रीसुदर्शन का आवाहन किया — और सुदर्शन चक्र भगवान ने उन दुष्टों पर प्रलयंकारी अग्नि-वर्षा की, कुटी की आग स्वतः शांत हो गई। यह देखकर समस्त नाथ योगी भयभीत हुए और उनके ही शिष्य बन गए। इसी अद्भुत घटना से इस शाखा का नाम “स्वभूसागर” पड़ा। विक्रम संवत 1420 से 1545 तक, अर्थात 125 वर्ष की दीर्घायु भोगकर, स्वभूरामदेवाचार्यजी ने अर्चिरादि गति से परम पद प्राप्त किया।
दो शिष्य, एक साझा गुरु-परंपरा
हरिव्यासदेवाचार्यजी के बारह प्रमुख शिष्यों में स्वभूरामदेवाचार्य ज्येष्ठ थे। इन्हीं बारह में छठे स्थान पर परशुरामदेवाचार्य थे, जिन्होंने राजस्थान के सलेमाबाद में अखिल भारतीय निम्बार्काचार्यपीठ की स्थापना की। आज वहाँ जगद्गुरु श्री श्यामशरण देवाचार्यजी 49वें आचार्य के रूप में गद्दी पर विराजमान हैं, तथा संप्रदाय के धर्म-प्रचार कार्य में सतत संलग्न हैं। यह शाखा निरंतर, अटूट रूप से आज तक चली आ रही है — इसके लिए यह लेख उन्हें यथोचित सम्मान अर्पित करता है।
परन्तु इसी गुरु के ज्येष्ठ शिष्य स्वभूरामदेवाचार्य की शाखा, जो इतिहास-क्रम में प्रथम थी, कालांतर में कागज़ों के पन्नों के नीचे दबती चली गई — यद्यपि वह भी उतनी ही समृद्ध, उतनी ही अटूट परंपरा है, जो आज काठिया बाबा विरासत के रूप में जीवित है।
स्वभूरामदेवाचार्य से आगे — अटूट गुरु-शिष्य परंपरा (35 से 56 तक)
वृंदावन के काठिया बाबा मंदिर की मूल पट्टिका पर यह सम्पूर्ण, अटूट शृंखला अंकित है:
35. श्री हरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज — रसिकराज राजेश्वर, महावाणीकार, जगद्गुरु, समाधि नारदटीला मथुरा।
36. श्री स्वभूरामदेव — जन्म एवं प्रधान पीठ: बुढ़िया बनी, जगाधरी, यमुना तट।
37. श्री कर्णहर (कन्हर) देव 38. श्री परमानन्द देव 39. श्री ब्रजदूलह चतुर चिंतामणि देवाचार्य (नागा) जी महाराज
40. श्री मोहनदेव 41. श्री जगन्नाथदेव 42. श्री मासनदेव 43. श्री हरिदेव 44. श्री मथुरादेव
45. श्री श्यामलदास जी महाराज 46. श्री हंसदास जी 47. श्री हीरादास जी 48. श्री मोहनदास जी
49. श्री नैनादास जी महाराज, ब्रजविदेही
50. काठकौपीन प्रवर्तक श्री इन्द्रदास जी काठिया बाबा — यहीं से “काठिया बाबा” उपाधि का प्रारंभ हुआ, काष्ठ-करधनी धारण करने की प्रथा के साथ।
51. श्री वज्रंगदास जी 52. श्री गोपालदास जी 53. श्री देवादास जी 54. श्री रामदास जी 55. श्री संतदास जी काठिया बाबा
56. श्री महंत धनंजय दास जी काठियाबाबा, प्रतिष्ठाता — वृंदावन के “काठियाबाबा का स्थान” के संस्थापक।
इसके पश्चात् वर्तमान 57वें आचार्य स्वामी रासबिहारीदास काठियाबाबा आज संपूर्ण विश्व के काठिया बाबा आश्रमों का नेतृत्व कर रहे हैं।
पश्चिम बंगाल — परंपरा का द्वितीय केंद्र
धनंजय दास (56वें) तथा उनसे पूर्व संतदास (55वें) — दोनों बंगाल के भक्त थे, दोनों “निम्बार्क संप्रदाय के बंगाली महंत” कहलाए। धनंजय दास का जन्म बांकुड़ा जिले के भरा गाँव में हुआ, जहाँ आज तीन संस्थाएँ उनके नाम पर संचालित हैं — स्वामी धनंजय दास काठियाबाबा महाविद्यालय (स्थापना 2009), स्वामी धनंजय दास काठिया बाबा मिशन स्कूल, तथा श्री रामदास काठिया बाबा संस्कृत विद्यालय। पूर्वोत्तर भारत तथा वृंदावन में भी उन्होंने अनेक आश्रम एवं संस्कृत विद्यालय स्थापित किए।
विदेशों में विस्तार
हरिव्यासदेवाचार्य-परंपरा के ही एक अन्य शिष्य, स्वामी गोपाल शरण देवाचार्य, के प्रयासों से ग्लासगो (स्कॉटलैंड), ब्रैडफोर्ड (इंग्लैंड), नॉर्थरिज कैलिफोर्निया (अमेरिका), तथा ब्रैम्पटन (कनाडा) में मंदिर स्थापित हुए। निम्बार्क संप्रदाय आज सचमुच वैश्विक बन चुका है।
अस्थल तिरखू — जीवित परंपरा की साक्षी भूमि
पानीपत जिले के सिंक पाथरी ग्राम में अस्थल तिरखू तीर्थ आज भी विद्यमान है — वही भूमि, जहाँ महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर से यक्ष ने प्रश्न पूछे थे, जहाँ राधा-कृष्ण की युगल प्रतिमा आज भी विराजमान है, और जहाँ एकड़ों में फैला प्राचीन तालाब आज भी साक्षी बना खड़ा है। खानपुर कलां (सोनीपत) में माधवदेवजी (स्वभूरामदेवाचार्यजी के लघु भ्राता) के वंशज आज भी सक्रिय हैं, जहाँ आज भी उनके नाम की एक चौपाल विद्यमान है।
अंतिम आह्वान
35 से 56 तक की यह इक्कीस-कड़ी अटूट शृंखला प्रमाणित करती है — स्वभूरामदेवाचार्य की परंपरा कभी समाप्त नहीं हुई, वह केवल नाम बदलकर काठिया बाबा विरासत में परिवर्तित होकर आज भी वृंदावन से संपूर्ण विश्व तक प्रवाहित है।
जिस निम्बार्क संप्रदाय के लिए गुरुदेव ने महान तपस्या की, वह आज कागज़ों के नीचे दबा है — दबे हुए इतिहास को बाहर निकालना ही अब हमारा कर्तव्य है। बुढ़िया बनी को अपना गौरव लौटना चाहिए। यह किसी एक व्यक्ति की माँग नहीं — यह इतिहास का ऋण है, जिसे आज चुकाया जाना शेष है।
जय हिन्द। जय भारत। जय सनातन। जय स्वभूरामदेवाचार्य।
लेखक परिचय
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क — सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी, कारगिल युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी योद्धा, संयुक्त राष्ट्र शांति-मिशन के अनुभवी सैनिक, तथा सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा एवं निम्बार्क संप्रदाय के गंभीर इतिहासकार। 24 वर्षों की सैन्य सेवा के पश्चात, विगत 18 वर्षों से वे इस विस्मृत इतिहास के पुनरुद्धार हेतु देश के कोने-कोने में क्षेत्र-शोध कर रहे हैं।
उनकी अब तक कुल चौदह पुस्तकें — छह हिंदी तथा आठ अंग्रेज़ी भाषा में — प्रकाशित हो चुकी हैं (विभिन्न संस्करणों सहित यह Amazon, Google Books तथा Notion Press पर उपलब्ध हैं), जो विश्व के 195 से अधिक देशों एवं दक्षिण कोरिया के Yes24 बुकस्टोर तक पहुँच चुकी हैं। वे प्रतिमाह निःशुल्क पत्रिका “सनातन भारत नया सवेरा” का भी संपादन करते हैं।
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