श्रीउद्धवदेवाचार्य जी (श्रीघमंडदेव) | निंबार्क संप्रदाय के महान वैष्णव बैरागी संत

निंबार्क संप्रदाय की आचार्य परंपरा के महान वैष्णव बैरागी संत श्रीउद्धवदेवाचार्य जी (श्रीघमंडदेव जी) श्रीकृष्ण-नाम में अटूट विश्वास के अद्वितीय प्रतीक थे। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि कलियुग में केवल श्रीनाम ही परम आश्रय है। नाम-महिमा के प्रचार, अखंड नाम-स्मरण और दृढ़ भक्ति के कारण वे निंबार्क संप्रदाय में विशेष श्रद्धा से स्मरण किए जाते हैं।

निंबार्क संप्रदाय के आचार्य एवं वैष्णव बैरागी संत3 min read2/26/2026

🟡 श्रीउद्धवदेवाचार्य जी (श्रीघमंडदेव जी) – श्रीनाम में अटल विश्वास की अद्भुत कथा
निंबार्क संप्रदाय की दिव्य आचार्य परंपरा में श्रीउद्धवदेवाचार्य जी, जिन्हें श्रद्धापूर्वक श्रीघमंडदेव जी कहा जाता है, एक अद्वितीय वैष्णव बैरागी संत के रूप में स्मरण किए जाते हैं। उनका जीवन श्रीराधा-कृष्ण युगल सरकार की अनन्य भक्ति और श्रीकृष्ण-नाम में अटूट विश्वास का तेजस्वी उदाहरण है।
उनकी साधना यह सिद्ध करती है कि कलियुग में यदि कोई साधन सर्वश्रेष्ठ है, तो वह है—श्रीभगवान का नाम-स्मरण।
🔶 जन्म एवं प्रमुख स्थली
परंपरागत विवरण के अनुसार श्रीउद्धवदेवाचार्य जी का जन्म दुबरदु (जयपुर रियासत) के समीप भीमाटोड़ा क्षेत्र में हुआ। आगे चलकर उनका प्रमुख साधना-स्थान हरियाणा में स्थित “कुंडल” (सोनीपत) माना गया।
गोली (करनाल) तथा खानपुर (सोनीपत) में भी उनके स्मृति-स्थल और मंदिर प्रतिष्ठित हैं। इन स्थानों पर आज भी निंबार्क संप्रदाय की वैष्णव बैरागी परंपरा की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
🔶 गुरु कृपा और “घमंडदेव” नाम की महिमा
श्रीउद्धवदेवाचार्य जी निरंतर “कृष्ण-कृष्ण” नाम का जप करते रहते थे। उनकी प्रत्येक श्वास में श्रीनाम का कंपन अनुभव होता था। वे कहा करते थे—
“मेरे लिए केवल श्रीकृष्ण-नाम ही सहारा है, उसी का भरोसा है।”
उनके गुरुदेव श्रीहरिव्यासदेवाचार्य जी ने एक दिन उन्हें श्रीराधा-कृष्ण युगल सरकार के समक्ष तपस्या और नाम-स्मरण में लीन देखा। वे बार-बार प्रेमावेश में कह रहे थे—
“मुझे घमंड है तेरा, मुझे घमंड है तेरा।”
यह वचन अहंकार का नहीं, बल्कि श्रीनाम और युगल सरकार में परम विश्वास का था। गुरुदेव उनकी इस अटल नाम-निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हुए और आशीर्वाद देकर उनका नाम रखा—
“श्रीउद्धव घमंडदेवाचार्य”
यहाँ ‘घमंड’ शब्द दृढ़ श्रद्धा और अटूट भरोसे का प्रतीक है।
🔶 श्रीनाम-महिमा का व्यापक प्रचार
श्रीउद्धवदेवाचार्य जी तीर्थ-यात्राएँ करते हुए श्रीकृष्ण-नाम की महिमा का प्रचार करते थे। उनके साथ शिष्य-भक्तों की मंडली रहती थी। वे सभी को समझाते—
“हरि नाम का स्मरण ही पापों का नाश करता है और जीव को परम शांति प्रदान करता है।”
शास्त्रों में भी कहा गया है—
हरिरित्येव पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः।
अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः॥
अर्थात जैसे अग्नि अनजाने में छूने पर भी जला देती है, वैसे ही ‘हरि’ नाम अनजाने में भी स्मरण हो जाए तो पापों को भस्म कर देता है।
🔶 अखंड नाम-स्मरण की अवस्था
उनकी साधना ऐसी थी कि वे उठते-बैठते, चलते-फिरते निरंतर श्रीकृष्ण-नाम में लीन रहते। एक बार वे भावावस्था में इतने तल्लीन हो गए कि बाह्य चेतना लुप्त हो गई। यह देखकर गुरुदेव ने आशीर्वचन दिया कि—
“तुम्हारा श्रीनाम में विश्वास सदैव अटल रहे और भगवान की शक्ति तुम्हारे हृदय में प्रकट हो।”
यह आशीर्वाद उनके जीवन का आध्यात्मिक शिखर सिद्ध हुआ।
🔶 निंबार्क संप्रदाय में उनका स्थान
निंबार्क संप्रदाय श्रीराधा-कृष्ण युगल उपासना और द्वैताद्वैत सिद्धांत पर आधारित है। इस परंपरा में श्रीउद्धवदेवाचार्य जी का स्थान एक ऐसे संत के रूप में है जिन्होंने नाम-भक्ति को जीवन का केंद्र बना दिया।
वे वैष्णव बैरागी परंपरा के उन संतों में गिने जाते हैं जिन्होंने भक्ति, त्याग और तपस्या के माध्यम से समाज को आध्यात्मिक दिशा प्रदान की।
🔶 कलियुग में नाम ही आधार
वे बार-बार यही उपदेश देते थे कि—
“कलियुग में भगवद्प्राप्ति का सरल और सर्वोत्तम साधन केवल श्रीकृष्ण-नाम है।”
न यज्ञ की जटिलता, न कठिन तपस्या—
केवल श्रद्धा से लिया गया श्रीनाम ही जीव को भवसागर से पार करता है।
🔸 निष्कर्ष
श्रीउद्धवदेवाचार्य जी (श्रीघमंडदेव जी) का जीवन यह संदेश देता है कि अटूट विश्वास ही सच्ची साधना है। जो साधक पूर्ण श्रद्धा से श्रीनाम का आश्रय लेता है, वही निंबार्क संप्रदाय और सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा का वास्तविक आभूषण बनता है।
उनकी नाम-निष्ठा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-स्रोत है।
✍️ लेखक
नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
संस्थापक, शोधकर्ता एवं सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा प्रचारक
निंबार्क संप्रदाय, श्रीराधा-कृष्ण भक्ति एवं श्रीनाम महिमा के प्रचार हेतु समर्पित।
🌐 www.nareshswaminimbark.in⁠�
📿 मिशन: सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा का संरक्षण एवं प्रचार

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