बंदूक से कलम तक: पूर्व नायब सूबेदार नरेश दास ने स्कूली बच्चों में जगाई देशभक्ति और सड़क सुरक्षा की अलख

24 वर्ष सेना में देश सेवा के बाद अब कलम से समाज सुधार की राह पर। पूर्व नायब सूबेदार नरेश दास वैष्णव निंबार्क ने गन्नौर के रामनगर स्थित राजकीय उच्च विद्यालय में बच्चों को शिक्षा, संस्कार और सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूक किया। जानिए कैसे एक पूर्व सैनिक की प्रेरणा से 21 मेधावी छात्र हुए सम्मानित और युवाओं में जागी देशभक्ति की अलख।"

प्रेरणादायक / व्यक्तित्व विकास: एक पूर्व सैनिक द्वारा छात्रों का मार्गदर्शन।2 min read

24 साल सरहद की सुरक्षा, अब शिक्षा और संस्कारों से समाज की रक्षा: पूर्व सैनिक की अनूठी पहल
​[स्थान: रामनगर, सोनीपत | दिनांक: 21 अप्रैल 2026]
​क्या एक सैनिक कभी रिटायर होता है? वर्दी उतर सकती है, पर देश सेवा का जज्बा कभी कम नहीं होता। सोनीपत के रामनगर में आज कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहाँ अनुशासन और अनुभव का संगम भविष्य की पीढ़ी से हुआ।
​वर्दी से कलम तक का सफर
​24 साल तक भारतीय सेना में देश की सीमाओं की रक्षा करने के बाद, पूर्व नायब सूबेदार नरेश दास वैष्णव निंबार्क ने अब समाज सुधार की नई रणभेरी फूंक दी है। गन्नौर के राजकीय उच्च विद्यालय, रामनगर में आयोजित एक विशेष सत्र में उन्होंने बच्चों को 'शिक्षा, संस्कार और सड़क सुरक्षा' का मूल मंत्र दिया।
​"जब तक हमारे बच्चे अनुशासित और जागरूक नहीं होंगे, राष्ट्र पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकता।" – इन शब्दों के साथ उन्होंने स्कूल के प्रांगण में देशभक्ति की अलख जगा दी।
​मेधावी सितारों का सम्मान
​इस कार्यक्रम का सबसे प्रेरणादायक पल वह था, जब विद्यालय के 21 मेधावी छात्रों को उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया। इन बच्चों की आँखों में भविष्य के सपने थे और सामने एक फौजी का अनुभव, जिसने उन्हें सिखाया कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता, केवल 'कठोर अनुशासन' ही आपको लक्ष्य तक पहुँचाता है।
​शक्ति और संकल्प का अद्भुत उदाहरण
​अनुशासन और शारीरिक क्षमता की बात करें, तो यह केवल बातों तक सीमित नहीं है। संकल्प और निरंतर अभ्यास की शक्ति क्या कर सकती है, यह जानने के लिए आपको हमारा पिछला लेख जरूर पढ़ना चाहिए, जहाँ पिता-पुत्र की जोड़ी ने विश्व स्तर पर इतिहास रच दिया है:
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​सड़क सुरक्षा: एक जीवन, एक परिवार
​नरेश दास जी ने छात्रों को केवल किताबी ज्ञान नहीं दिया, बल्कि जीवन की हकीकत से रूबरू कराया। उन्होंने सड़क सुरक्षा के नियमों को 'जीवन का बीमा' बताते हुए युवाओं से अपील की कि वे स्वयं नियमों का पालन करें और अपने परिजनों को भी सुरक्षित ड्राइविंग के लिए प्रेरित करें।
​निष्कर्ष और आपकी राय
​आज के दौर में जहाँ युवा पीढ़ी को सही दिशा की आवश्यकता है, पूर्व सैनिकों का ऐसा मार्गदर्शन एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। क्या आपको लगता है कि हर विद्यालय में ऐसे अनुभव साझा करने वाले सत्र अनिवार्य होने चाहिए?
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​लेखक एवं शोधकर्ता:
नरेश दास वैष्णव 'निंबार्क'
(पूर्व नायब सूबेदार)
लेखक, स्वतंत्र शोधकर्ता एवं पत्रकार
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