कोमा से कलम तक
सनातन का एक अजेय सिपाही
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Category : सनातन जीवन-यात्रा | Tag : अजेय-सिपाही
"जो मैदान-ए-जंग में गोलियों से नहीं डरा, वह जीवन की मार से क्यों डरेगा?"
मित्रों, आज मैं आपके सामने अपनी वह कहानी रखना चाहता हूँ जो न किसी अखबार में पूरी छपी, न किसी टीवी चैनल पर पूरी दिखाई गई। यह कहानी है एक ऐसे इंसान की जो गरीब परिवार में पैदा हुआ, भारतीय सेना में देश की सेवा की, संयुक्त राष्ट्र शान्ति सेना में भारत का प्रतिनिधित्व किया, कोमा से वापस आया — और आज पाँच महाद्वीपों तक पहुँचने वाली पत्रिका का संस्थापक-सम्पादक है।
यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं। यह मेरी जीती-जागती जीवन-गाथा है।
पहला अध्याय — वर्दी का सम्मान
भारतीय सेना। यह केवल एक नौकरी नहीं होती — यह एक संस्कार होता है। जब आप वर्दी पहनते हैं, तब आपका अपना अस्तित्व छोटा हो जाता है और राष्ट्र बड़ा हो जाता है। मैंने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष इस वर्दी को समर्पित किए।
३० नवम्बर २००८ — वह दिन जब मैंने भारतीय सेना से सम्मानपूर्वक विदाई ली। उस दिन मन में एक अजीब भाव था — न पूर्ण प्रसन्नता, न दुःख। बस एक गहरी शान्ति। यह अनुभूति वही जानता है जिसने वर्षों तक देश की मिट्टी के लिए अपना सब कुछ अर्पित किया हो।
किन्तु एक फौजी कभी विश्राम नहीं करता। उसी ३० नवम्बर २००८ को — सेवानिवृत्ति के उसी दिन — अमेरिकन कम्पनी Praxair ने मुझे जॉइनिंग लेटर थमा दिया।
दूसरा अध्याय — संयुक्त राष्ट्र शान्ति सेना : भारत का गौरव
सन् २०००। परमात्मा की असीम कृपा से मुझे वह सम्मान मिला जो प्रत्येक फौजी का स्वप्न होता है।
UNAMSIL
United Nations Mission in Sierra Leone
पश्चिम अफ्रीका, सन् २०००
सिएरा लियोन — वह देश जो उस समय विश्व के सबसे भीषण गृहयुद्ध की आग में जल रहा था। निर्दोष नागरिक, टूटते परिवार, बिखरती मानवता। उस धरती पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए मैंने संयुक्त राष्ट्र शान्ति सेना में सेवा दी।
यह केवल एक सैन्य तैनाती नहीं थी — यह वसुधैव कुटुम्बकम् का व्यावहारिक रूप था। उस यात्रा ने मुझे यह सिखाया — सेवा की कोई सीमा नहीं होती। न भाषा की, न देश की, न धर्म की।
लेखक की टिप्पणी : जो फौजी अफ्रीका की उस धरती पर विश्व-शान्ति के लिए लड़ा, वही आज सनातन की शान्ति पाँच महाद्वीपों तक पहुँचा रहा है। यह संयोग नहीं — यह सनातन का विधान है।
तीसरा अध्याय — सेवानिवृत्ति के बाद भी ड्यूटी जारी
३० नवम्बर २००८ को सेवानिवृत्ति के उसी दिन Praxair कम्पनी में प्रशिक्षक के रूप में कार्य प्रारम्भ किया। ऑक्सीजन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन जैसी संवेदनशील गैसों के सुरक्षित परिवहन का प्रशिक्षण। पहली पोस्टिंग होस्पेट, कर्नाटक। जून २००९ में परिवार के लिए त्यागपत्र दे दिया।
जुलाई २००९ में दिल्ली के बुराड़ी स्थित ड्राइविंग लाइसेंस ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट — दिल्ली सरकार और अशोक लेलैंड का संयुक्त उपक्रम — में मुख्य प्रशिक्षक के पद पर नियुक्ति। सड़क सुरक्षा और ईंधन बचत — यह दो विषय मेरी विशेषता बने।
परिणाम — कई बार टीवी पर, कई बार समाचार-पत्रों में। एक पूर्व फौजी अब राष्ट्रीय मीडिया में चर्चित था। किन्तु न प्रसिद्धि का मोह, न धन का लोभ — केवल ईमानदारी से कर्तव्य।
चौथा अध्याय — वह काली रात : १५ मार्च २०१५
जीवन कभी-कभी बिना चेतावनी के ऐसा प्रहार करता है जो सब कुछ बदल देता है।
१५ मार्च २०१५। एक सामान्य दिन था। और फिर अचानक — सड़क दुर्घटना। मैं कोमा में चला गया।
न दर्द का अहसास, न प्रियजनों के आँसू दिखे। बस — घना अन्धकार। लगभग एक महीने तक।
फिर आँखें खुलीं। किन्तु गाड़ी उठाकर ससुराल के लिए निकला — रास्ता भूल गया। कभी दिल्ली बस अड्डा पहुँच जाता, कभी नरेला उतर जाता, कभी वापस आ जाता।
"जब ससुराल ही भूल गए, तो जीवन में बचा क्या है?"
इंस्टिट्यूट गया। त्यागपत्र दे दिया। प्रधानाचार्य जी ने कहा — "आप जैसा ईमानदार इंसान आज के युग में मिलना मुश्किल है। बस आया करें — पूरा वेतन मिलेगा।" किन्तु एक फौजी बिना काम के वेतन नहीं लेता।
एक फौजी हार नहीं मानता।
पाँचवाँ अध्याय — शोध-यात्राएँ : धर्मपत्नी के साथ
घर पर एक महीने विश्राम के पश्चात् धर्मपत्नी श्रीमती निर्मला वैष्णव जी के साथ शोध-यात्राओं का संकल्प लिया। मेरा शोध-कार्य तो २००८ से ही प्रारम्भ हो चुका था — सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा पर। अब ईश्वर ने अवसर दिया कि उस शोध को धरातल पर उतारूँ।
देश के कोने-कोने में गया। विदेश भी गया। ५० से अधिक बड़ी शोध-यात्राएँ। लोहागढ़ से महरौली तक, कुरुक्षेत्र से नांदेड़ तक। हर यात्रा में एक नई खोज। हर स्थान पर एक नया सत्य।
लेखक की प्रत्यक्ष साक्षी : डॉक्टर मना करते रहे — मैं चलता रहा। क्योंकि यह केवल मेरा काम नहीं था — यह सनातन का आदेश था।
छठा अध्याय — फरवरी २०१९ : असाधारण संकल्प
फरवरी २०१९ में दिमाग ने असाधारण गति पकड़ी। १५ दिन तक नींद नहीं आई। छोटे अनुज सुभाष नम्बरदार जी मुझे मेरठ ले गए। डॉ. विपुल त्यागी — मनोचिकित्सक, नारायण हॉस्पिटल — ने उसी दिन से दवाइयाँ प्रारम्भ कर दीं। आज भी १२ गोलियाँ प्रतिदिन।
किन्तु उसी अवस्था में — २८ अप्रैल २०१९ को — अपने गाँव रामनगर में वैष्णव बैरागी अलंकार समारोह आयोजित कर दिया। जहाज से, बस से, रेल से — पूरे भारतवर्ष से लोग उस छोटे से गाँव में आए। वह समारोह सफल हुआ।
क्योंकि जब संकल्प सच्चा हो — ईश्वर स्वयं व्यवस्था करता है।
सातवाँ अध्याय — "सनातन भारत नया सवेरा" : पाँच महाद्वीपों तक
मासिक पत्रिका : सनातन भारत नया सवेरा
संस्थापक और सम्पादक — स्वयं लेखक।
मूल्य — निःशुल्क।
उद्देश्य — सनातन धर्म का विश्व-व्यापी प्रचार।
पहुँच — ५ महाद्वीप, ८०० करोड़ लोग।
एक पूर्व फौजी जिसने सिएरा लियोन में संयुक्त राष्ट्र के लिए काम किया — वही आज सनातन के विश्व-दूत के रूप में पाँच महाद्वीपों तक पहुँच रहा है। यह संयोग नहीं — यह सनातन का विधान है।
आठवाँ अध्याय — कलम की विजय-यात्रा
१५ अगस्त २०२२ — स्वतंत्रता दिवस पर बैरागी धर्मशाला, कुरुक्षेत्र में पहली पुस्तक का भव्य लोकार्पण।
१९ दिसम्बर २०२५ — Amazon KDP पर प्रकाशन। उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा।
११ पुस्तकें — Amazon KDP पर
५ पुस्तकें — Notion Press, America पर
४ पुस्तकें — Google पर
कुल २० पुस्तकें — विश्व-स्तर पर प्रकाशित
उपसंहार — जीवन का सार
आज जब कहीं मुख्य अतिथि बनाते हैं तो कहता हूँ — भाई, मैं तो गरीब आदमी हूँ।
आज तक किसी से चंदा नहीं लिया। आगे भी नहीं लूँगा।
१२ गोलियाँ रोज़। डॉक्टर ने सब मना किया हुआ है। फिर भी — शोध-यात्राएँ जारी हैं। पुस्तकें जारी हैं। पत्रिका जारी है। क्योंकि यह मेरा काम नहीं — यह सनातन का आदेश है।
शायद इसीलिए कोमा से वापस आया। शायद इसीलिए सिएरा लियोन की उस धरती पर भेजा गया था। शायद यही ईश्वर का विधान है।
भक्ति से शक्ति। शक्ति से बलिदान। बलिदान से अमरत्व। यही सनातन है। यही भारत है।
— नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी | UN शान्ति सेना | इतिहासकार | लेखक
संस्थापक-सम्पादक — सनातन भारत नया सवेरा
www.nareshswaminimbark.in
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