वह सैनिक जिसने बन्दूक छोड़ी और कलम से लड़ा वह युद्ध — जो सरकारें हार गईं

एक गरीब किसान का बेटा। एक सैनिक जो कारगिल और संयुक्त राष्ट्र तक गया। और एक इतिहासकार जिसने वह लिखा — जो सदियों से किसी ने नहीं लिखा। सनातन वैष्णव बैरागी समाज के ७४५ शहीद — जिन्होंने १८५७ में प्राण दिए। जिनकी प्रतिमा किसी चौक पर नहीं। जिनका नाम किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं। नायब सूबेदार (रिटायर्ड) नरेश दास वैष्णव निम्बार्क ने वह युद्ध लड़ा — जो सरकारें हार गईं। प्रधानमन्त्री से रेल मन्त्रालय तक। RTI से Secretariat तक। और १० पुस्तकों से अमेरिका तक।

सैनिक एवं साधना5 min read

— "वह सैनिक जिसने बन्दूक छोड़ी और कलम से लड़ा वह युद्ध — जो सरकारें हार गईं"

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**एक गरीब किसान का बेटा — जो इतिहास बन गया**

रामनगर, ग्राम सनपेड़ा, तहसील गन्नौर, जिला सोनीपत, हरयाणा।

यह कोई बड़ा शहर नहीं। कोई प्रसिद्ध स्थान नहीं। एक साधारण गाँव — जहाँ एक साधारण किसान परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। अभाव था, संघर्ष था, किन्तु एक अदम्य जिज्ञासा भी थी — अपनी जड़ों को जानने की, अपने पूर्वजों को पहचानने की, उस इतिहास को खोजने की जो कहीं न कहीं दबा पड़ा था।

उस बालक का नाम था — नरेश कुमार। जो आगे चलकर बना — नायब सूबेदार नरेश दास वैष्णव निम्बार्क। सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी। इतिहासकार। अंतर्राष्ट्रीय लेखक।

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**सेना की वर्दी — कारगिल से सिएरा लियोन तक**

भारतीय सेना में २४ वर्षों की सेवा।

कारगिल युद्ध — जहाँ जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा बहुत पतली होती है। सन् २००० में संयुक्त राष्ट्र शान्ति सेना के साथ सिएरा लियोन, पश्चिम अफ्रीका। वहाँ उग्रवादियों को बन्दी बनाया। वहाँ देखा कि संसार में अन्याय केवल युद्धभूमि पर नहीं होता — वह इतिहास के पन्नों पर भी होता है। जब किसी समाज के वीरों को, उनके बलिदानों को जानबूझकर भुला दिया जाता है।

और उसी क्षण एक संकल्प जन्मा —

जब बन्दूक छूटेगी, कलम उठेगी।

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**वह इतिहास — जो सदियों से मिटाया गया**

सनातन वैष्णव बैरागी समाज।

भारत के इतिहास में एक ऐसा समाज जिसने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए। जिसने भक्ति और शक्ति को एक साथ जीया। जिसके महायोद्धाओं ने १८५७ की क्रान्ति में अंग्रेजों से लड़ते हुए प्राण न्यौछावर किए।

महन्त लक्ष्मी बाई — जिन्होंने झाँसी की रानी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध किया। जिनके आदेश पर बैरागी साधुओं ने झाँसी की रानी का दाह संस्कार करने के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी।

महंत रामप्रसाद बैरागी — जिन्होंने १८५७ में कसौली के क्रान्तिकारियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध जंग लड़ी। जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने अम्बाला जेल में फाँसी दे दी।

मंगल दास बैरागी — जो १९१९ में जलियाँवाला बाग में शहीद हुए।

बिरद दास स्वामी रोहनात — जो १८५७ में भिवानी, हरयाणा में अंग्रेजों से लड़े और तोप के मुँह पर बाँधकर उड़ा दिए गए।

इन वीरों के नाम पर आज कोई रेलवे स्टेशन नहीं। कोई राष्ट्रीय स्मारक नहीं। कोई चौक नहीं। कोई पाठ्यपुस्तक नहीं।

क्योंकि किसी ने लिखा ही नहीं।

७४५ बैरागी शहीद — इतिहास के पन्नों से गायब।

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**वह संकल्प — जो एक सैनिक ने निभाया**

सेवानिवृत्ति के बाद जब वर्दी उतरी — तब असली युद्ध आरम्भ हुआ।

पुरालेखागारों में बैठकर धूल भरे दस्तावेज़ खोजे। स्थानीय इतिहासकारों से सम्पर्क किया। गाँव-गाँव जाकर प्रमाण इकट्ठे किए। और जो तथ्य मिले — उन्हें तीन स्वतन्त्र ऐतिहासिक स्रोतों से प्रमाणित किया।

१८ वर्षों का अथक शोध।

परिणाम — वह इतिहास जो किसी ने नहीं लिखा — आज विश्व के सामने है।

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**प्रधानमन्त्री से रेल मन्त्रालय तक — एक सैनिक की लड़ाई**

केवल लिखना पर्याप्त नहीं था। न्याय माँगना भी आवश्यक था।

माननीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी को पत्र — वैष्णव बैरागी महायोद्धाओं, स्वतन्त्रता सेनानियों के नाम पर रेल, रेलवे स्टेशन, राष्ट्रीय स्मारक, विद्यालय, अस्पताल, सामुदायिक केन्द्र बनाने की माँग।

रेल मन्त्रालय को पत्र — दिनांक २४ अक्टूबर २०२३। Railway Board ने दिनांक १४ दिसम्बर २०२३ को प्राप्त किया।

उत्तर मध्य रेलवे, प्रयागराज का उत्तर — दिनांक १२ फरवरी २०२४। नीति के अनुसार रेलवे परिसर में राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिमा या स्मारक स्थापित नहीं किया जा सकता।

हिमाचल प्रदेश Secretariat — CM OSD से भेंट। Gate Pass सं. २३९७२७, दिनांक २४ अप्रैल २०२५। शहीद रामप्रसाद बैरागी की प्रतिमा सुबाथू के चौक बाज़ार में स्थापित करने की माँग।

हिमाचल प्रदेश सरकार, सुबाथू कैण्ट, जिला सोलन को पत्र — दिनांक २३ अप्रैल २०२५।

RTI — सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ के अन्तर्गत १८५७ के क्रान्तिकारी राम प्रसाद बैरागी से सम्बन्धित ऐतिहासिक अभिलेख माँगे। जिला कारागार मथुरा से उत्तर प्राप्त हुआ। प्रथम अपील दाखिल की — दिनांक १९ मार्च २०२६। हरयाणा कारागार महानिदेशालय, पंचकुला से अपील की सुनवाई हुई — दिनांक २० मार्च २०२६।

वैश्विक सनातन वैष्णव बैरागी सेवा संगठन (पंजीकृत) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में — माँग पत्र क्रमांक ०३२ — रेल मन्त्रालय को। माँग पत्र क्रमांक ०६५ — हिमाचल प्रदेश मुख्यमन्त्री को। माँग पत्र क्रमांक ०७१ — प्रधानमन्त्री कार्यालय को — दिनांक १६ मार्च २०२६।

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**RTI और अधूरे उत्तर — किन्तु संघर्ष जारी है**

सरकारी उत्तर आते रहे। कभी नीति का हवाला दिया गया। कभी विभाग बदलने का निर्देश दिया गया। कभी अपील खारिज हुई।

किन्तु एक सैनिक तब तक नहीं रुकता जब तक मिशन पूरा न हो।

हर अधूरे उत्तर के बाद अगला पत्र लिखा गया। हर अस्वीकृति के बाद अगली अपील दाखिल की गई। यह युद्ध अभी जारी है।

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**१० पुस्तकें — अमेरिका से विश्व मंच तक**

१८ वर्षों के शोध का फल — १० पुस्तकें।

हिंदी पुस्तकें —
यात्रा बंदूक से कलम तक
महन्त बने महाराजा — सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा, अमेरिका से प्रकाशित

अंग्रेजी पुस्तकें —
Nimbark Sampraday: Sanatan Vaishnav Bairagi Tradition
Sanatan Vaishnav Bairagi: Forgotten Warriors and Soldiers
एवं अन्य पुस्तकें

उपलब्धता —
Amazon पर ७ अंग्रेजी पुस्तकें
NotionPress, America पर ३ हिंदी पुस्तकें
Google Play Store पर ६ पुस्तकें

और सनातन भारत — नया सवेरा मासिक पत्रिका — जो ८०० करोड़ लोगों के डिजिटल मंच तक पहुँच चुकी है।

यह केवल पुस्तकें नहीं — यह उन शहीदों को दिया गया शब्द-तर्पण है जिन्हें इतिहास ने भुला दिया।

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**आगे की राह — मिशन अधूरा नहीं**

यह पुस्तकें, यह पत्राचार, यह RTI, यह संघर्ष — यह सब एक आरम्भ है, अन्त नहीं।

अभी और शोध होना है। अभी और दस्तावेज़ खुलने हैं। अभी उन ७४५ शहीदों के नाम पर स्मारक बनवाने हैं। अभी रेलवे स्टेशनों पर उनके नाम अंकित करवाने हैं। अभी पाठ्यपुस्तकों में उनका उल्लेख करवाना है।

और यह कार्य — जब तक श्वास है — जारी रहेगा।

क्योंकि एक सैनिक का धर्म है — मिशन पूरा करना।

सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा — अमर है। अजर है। अविनाशी है।

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जय श्री राधे-कृष्ण
जय सनातन वैष्णव बैरागी परम्परा
जय भारत माँ

**— नरेश दास वैष्णव निम्बार्क**
सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं इतिहासकार
हरिद्वार, २५ मई २०२६
www.nareshswaminimbark.in

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