"महाभारत का वह रहस्यमय सरोवर — जहाँ यक्ष ने पाण्डवों की परीक्षा ली | अस्थल तिरखु तीर्थ का अनसुना इतिहास"

महाभारत काल में जिस पावन सरोवर के तट पर यक्ष ने युधिष्ठिर से धर्म के प्रश्न पूछे थे — वह सरोवर आज भी जीवित है। हरियाणा की इस पुण्यभूमि पर सन् १७५० में छुई खदान के प्रथम बैरागी राजा रूप दास बैरागी ने दीक्षा ग्रहण की — और एक ऐसी परम्परा की नींव पड़ी जो आज भी अखण्ड है। जानिए अस्थल तिरखु तीर्थ का वह अनसुना इतिहास — जो तीन युगों को अपने भीतर समेटे हुए है।

तीर्थ-इतिहास / Tirth History4 min read



** अस्थल तिरखु तीर्थ**
**महाभारत कालीन यक्ष-सरोवर से निम्बार्क सम्प्रदाय तक**

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**वह पावन सरोवर जहाँ धर्म की परीक्षा हुई**

भारत की इस पुण्यभूमि पर एक ऐसा तीर्थ है — जिसका इतिहास महाभारत काल तक जाता है। अस्थल तिरखु तीर्थ वही पावन स्थान है जहाँ वनवास काल में यक्ष ने पाण्डवों की परीक्षा ली थी। महाभारत के वन-पर्व में वर्णित यह प्रसंग 'यक्ष-प्रश्न' अथवा 'धर्म-प्रश्न' के नाम से इतिहास में अमर है।

जब पाण्डव वनवास में थे, तब इस सरोवर के तट पर जल लेने गए। यक्ष — जो वस्तुतः धर्मराज का ही रूप थे — ने सरोवर का जल वर्जित कर दिया। नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम — चारों ने यक्ष की आज्ञा की अवहेलना की और जल लेने का प्रयास किया। परन्तु यक्ष के प्रभाव से वे चेतनाशून्य होकर भूमि पर गिर पड़े।

तत्पश्चात् युधिष्ठिर वहाँ पहुँचे। उन्होंने शान्तचित्त एवं धर्मनिष्ठा से यक्ष के समस्त प्रश्नों का उत्तर दिया। युधिष्ठिर के सत्य-आश्रित उत्तरों से प्रसन्न होकर यक्ष ने उनके सभी भाइयों को पुनः चेतना प्रदान की। यह वही पावन सरोवर है — जो आज भी अस्थल तिरखु तीर्थ में विद्यमान है।

"यह वही सरोवर है जहाँ सत्य और धर्म की परीक्षा हुई थी। जहाँ असत्य पर चलने वाले गिरे — और धर्म पर चलने वाले ने सबको उठाया।"

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**यक्ष-सरोवर का वर्तमान स्वरूप**

इतिहास साक्षी है कि यह सरोवर एक समय लगभग पच्चीस एकड़ में विस्तृत था। प्रवासी पक्षी भी यहाँ आश्रय लेते थे — जो इस स्थान की दिव्यता और पवित्रता का प्रमाण है। कालक्रम में यह सरोवर सिमटता गया — और आज लगभग एक एकड़ में शेष है।

परन्तु इस तीर्थ की आत्मा आज भी जीवित है। यहाँ राधा-कृष्ण का मन्दिर है। पाण्डवों की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। वह सरोवर — भले ही आकार में छोटा हो गया हो — आज भी अपनी दिव्य स्मृतियों को अपने जल में समेटे हुए है।

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** : निम्बार्क सम्प्रदाय एवं छुई खदान रियासत**

**निम्बार्क सम्प्रदाय का यह जाग्रत केन्द्र**

महाभारत काल से पवित्र इस भूमि पर निम्बार्क सम्प्रदाय की वैष्णव बैरागी परम्परा ने अपनी साधना का केन्द्र स्थापित किया। इस तीर्थ के अन्तर्गत लगभग तीन सौ साठ मन्दिर आते थे — जिनकी सेवा-पूजा की सम्पूर्ण व्यवस्था वैष्णव बैरागी आचार्यों के अधीन थी।

**छुई खदान रियासत — प्रथम बैरागी राजा की दीक्षा**

सन् १७५० में छुई खदान रियासत के प्रथम बैरागी राजा रूप दास बैरागी ने इसी पावन तीर्थ पर दीक्षा ग्रहण की। उस समय तीर्थ के पीठाधीश्वर श्री परमानन्द देवाचार्य जी थे। यह ऐतिहासिक तथ्य डॉ. नारायण दत्त — M.A., Ph.D., आगरा विश्वविद्यालय — की पुस्तक 'निम्बार्क सम्प्रदाय — कृष्ण भक्ति हिन्दी काव्य' में प्रमाणित रूप से वर्णित है।

"सन् १७५० में छुई खदान के प्रथम बैरागी राजा रूप दास बैरागी ने अस्थल तिरखु तीर्थ में दीक्षा ली। उस समय पीठाधीश्वर श्री परमानन्द देवाचार्य जी थे।"

यह इस बात का साक्ष्य है कि वैष्णव बैरागी परम्परा का प्रभाव केवल साधु-समाज तक सीमित न था — राजपरिवार भी इसी परम्परा से दीक्षित होते थे।

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**अध्याय — ८ : डॉ. महन्त राजपाल दास बैरागी निम्बार्क**

**साधना, विद्वत्ता और सेवा का संगम**

इस तीर्थ को जिस महापुरुष ने अपनी साधना और विद्वत्ता से सुशोभित किया, वे हैं — डॉ. महन्त राजपाल दास बैरागी निम्बार्क। उनके पिताजी स्वतन्त्रता सेनानी थे — जो रवि रतन एवं धनपत नाम से भी जाने जाते थे। एक स्वतन्त्रता सेनानी के पुत्र ने साधना का मार्ग चुना — यह वैष्णव बैरागी परम्परा की त्याग-भावना का जीवन्त उदाहरण है।

सन् १९६० में बाल्यकाल से ही उन्होंने इस तीर्थ की सेवा में अपने को समर्पित किया। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से सन् १९८१ में निम्बार्क वेदान्त पर M.A. एवं Ph.D. सम्पन्न की। सन् १९८४ में वे इस तीर्थ के महन्त एवं पीठाधीश्वर के पद पर आसीन हुए। उनके संरक्षण में लगभग तीन सौ साठ मन्दिर एवं पाँच सौ बीघा तीर्थ-भूमि की सेवा-व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रही।

**स्वाभाविक भेदाभेद — निम्बार्क दर्शन की आत्मा**

डॉ. राजपाल दास जी ने अपने शोध में सिद्ध किया कि वैष्णव बैरागी परम्परा केवल भक्ति और सेवा की परम्परा नहीं — यह एक सुदृढ़ दार्शनिक एवं शास्त्रीय परम्परा भी है।

निम्बार्काचार्य का 'स्वाभाविक भेदाभेद' दर्शन — जिसे अंग्रेजी में Natural Difference in Non-Difference कहते हैं — इस परम्परा की दार्शनिक आत्मा है। जिस प्रकार एक सर्प कुण्डली मारकर बैठे तो उसकी पूर्ण लम्बाई दिखती नहीं — परन्तु जब वह कुण्डली खोलता है तो पूर्ण स्वरूप प्रकट होता है — उसी प्रकार जीव और ब्रह्म का भेद एवं अभेद दोनों स्वाभाविक हैं, आरोपित नहीं।

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**उपसंहार**

अस्थल तिरखु तीर्थ तीन युगों को अपने भीतर समेटे हुए है। महाभारत काल का यक्ष-सरोवर, निम्बार्क सम्प्रदाय की वैष्णव बैरागी साधना, और आधुनिक काल के विद्वान महन्त राजपाल दास जी की सेवा — यह त्रिवेणी इस तीर्थ को भारत के तीर्थ-इतिहास में अद्वितीय स्थान प्रदान करती है।

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जय श्रीराधे। जय निम्बार्क। जय हिन्द।

— नरेश दास वैष्णव निम्बार्क
सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं इतिहासकार
www.nareshswaminimbark.in

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